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किफायती स्वास्थ्य सेवाओं से मध्यम वर्ग को दीर्घकालिक राहत देगा बजट: डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि सस्ती दवाएं, वैक्सीन और जांच सुविधाएं — जिन्हें देश में ही बायो-मैन्युफैक्चरिंग के जरिए विकसित किया जाएगा — मध्यम वर्ग और कमजोर वर्गों के लिए बड़ी सामाजिक और आर्थिक राहत साबित होंगी।

बजट के बाद मीडिया से बातचीत में मंत्री ने कहा कि इस बजट का असर तुरंत नजर न आए, लेकिन यह एक स्पष्ट और क्रमबद्ध सोच को दर्शाता है, जिसमें संरचनात्मक सुधारों को अत्याधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है और आधुनिक तकनीकें अब तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित हो रही हैं।

मध्यम वर्ग को लेकर उठ रहे सवालों पर डॉ. सिंह ने कहा कि बजट का असली लाभ तात्कालिक आय गणनाओं में नहीं, बल्कि लंबे समय में बढ़ते इलाज और जीवन-यापन खर्च से मिलने वाली राहत में छिपा है।

उन्होंने कहा कि बायोफार्मा, डायग्नोस्टिक्स, वैक्सीन और जीन-आधारित उपचारों में बड़े स्तर पर निवेश से कैंसर, डायबिटीज और मेटाबॉलिक बीमारियों से जूझ रहे परिवारों पर आर्थिक बोझ काफी कम होगा।

डॉ. सिंह ने बताया कि देश में इस समय 11–12 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, लगभग 14 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक हैं और कैंसर के मामलों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है, जो 2030 तक सालाना 20 लाख तक पहुंच सकते हैं।

10,000 करोड़ रुपये की बायोफार्मा शक्ति पहल पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत पहले ही वैश्विक बायो-मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर चुका है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की प्रमुख बायो-इकोनॉमी में शामिल है। नया निवेश जैविक दवाओं, बायोसिमिलर, वैक्सीन, मेडिकल डिवाइस और जीन-आधारित तकनीकों में भारत की क्षमता को और मजबूत करेगा।

मंत्री ने बायोटेक्नोलॉजी को अगला बड़ा औद्योगिक इंजन बताते हुए कहा कि जैसे पिछली दशकों में आईटी ने भारत की अर्थव्यवस्था को दिशा दी, वैसे ही आने वाले समय में “बायो-रिवॉल्यूशन” औद्योगिक परिवर्तन का नेतृत्व करेगा, जिसमें रीसाइक्लिंग, रीजेनेरेशन, सर्कुलर इकोनॉमी और उन्नत जीवन-विज्ञान शामिल होंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि बजट में गैर-संचारी रोगों और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिन्हें पहले गंभीरता से नहीं लिया गया था। उत्तर भारत में मानसिक स्वास्थ्य के लिए नए सुपर-स्पेशियलिटी शैक्षणिक और क्लीनिकल संस्थान स्थापित किए जाएंगे, जिससे इलाज तक समान और व्यापक पहुंच सुनिश्चित होगी।

इसके अलावा, आयुर्वेद और फार्मास्युटिकल शिक्षा के नए संस्थानों की स्थापना से पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक शोध और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ने में मदद मिलेगी।