कितनी अद्भुत बात है कि होयसल राजवंश मूल रूप से गिरिवासी होते हुए भी कला और स्थापत्य के लिए जाना जाता है। इसका राज्य 1000 ई. से 1346 ई. तक रहा। ये वीर थे लेकिन उस से कहीं अधिक कला के पारखी थे। तभी इनके बनाए हुए मंदिर दक्षिण भारत के मंदिरों की स्थापत्य कला में अपनी जटिल नक्काशी के लिए एक अलग स्थान रखते हैं। तीन शताब्दियों के अल्पकाल में इस साम्राज्य के राजाओं ने संघर्ष के साथ कला की सेवा में कोई कसर नहीं रखी और सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों में तीन मंदिरों को होयसल स्थापत्यकला के प्रतीक रूप में 2023 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया।
अपने देश की सांस्कृतिक विरासत को स्थापत्य कला में खोजती हुई मेरी यात्रा उड़ीसा से शुरू होकर तमिलनाडु, केरल से होती हुई कर्णाटक पहुँच रही है। मैं इस समय बढ़ रही हूं होयसल साम्राज्य के उन सुंदर स्मारकों की ओर जो विश्व भर में अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के लिए जाने जाते हैं। यहां पहुंचने के लिए मैं नागरकोइल से बेंगलुरु तक ओवरनाइट जर्नी करके पहुंची। अगर आपको दक्षिण भारत के सुंदर स्थापत्य कलाओं को देखना है जो कि अलग-अलग राज्यों में फैले हुए हैं तो इनकी आपस की दूरी ओवरनाइट जर्नी में बड़ी आसानी से तय की जा सकती है, और कनेक्टिविटी के रूप में भारतीय रेल से बेहतर विकल्प कोई और नहीं है। दक्षिण भारत की रेलगाड़ियां में उत्तर भारत की रेलगाड़ी में जितनी भीड़ नहीं होती। आप बड़े आराम से अपनी यात्रा को पूरा कर सकते हैं। मैंने नागरकोइल से शाम के 6:00 बजे ट्रेन पकड़ी और सुबह बेंगलुरु पहुंच गई। बैंगलोर तो वैसा ही है जैसा की कोई भी महानगर होता है। भीड़ से खचाखच भरा हुआ।
भीड़ के समुद्र को पार करने में ही मुझे 2 घंटे लग गए और किसी तरह मैंने राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 373 की राह पकड़ी जो कि बेंगलुरु से हासन तक जाता है।
बेलूर शब्द कान में पढ़ते ही इसके मिलते-जुलते दो नगरों की ओर विचार जाता है एक – बेलूर जो अपने मठों के लिए प्रसिद्ध है जो कि कोलकाता पश्चिम बंगाल में स्थित है लेकिन मैं वहां नहीं जा रही हूं मैं जा रही हूं कर्नाटक राज्य के हसन जिले के एक उपनगर बेलूर में जो कि होयसल साम्राज्य की राजधानी रहा है। आज भले ही ये एक उपनगर है लेकिन इसका एक समृद्ध इतिहास है।
बेलूर का अपना कोई रेलवे स्टेशन नहीं है, बेलूर के लिए नजदीक रेलवे स्टेशन लगभग 15 किलोमीटर दूर हासन है। लेकिन बेलूर पहुंचने के लिए सबसे अच्छा साधन कर्नाटक रोडवेज की बसे हैं। जिसमें वोल्वो बस भी शामिल है, लेकिन इसकी बुकिंग केवल ऑनलाइन होती है, केएसआरटीसी के ऐप डाउनलोड कर, आप बड़े सहज भाव में बुकिंग को कर सकते हैं। और सबसे अच्छी बात यह है कि बेलूर एक बहुत छोटा सा शांत नगर है। यहाँ बस स्टैंड से मंदिर की दूरी मात्र 2 किलोमीटर की है।
बेंगलुरु के सड़कों पर वाहनों की धक्का मुक्की से थोड़ी सी बेहाल में जैस-जैसे राष्ट्रीय राजमार्ग पर आगे बढ़ती हूं नयनों को अभिराम देते हुए दृश्यावली मेरे सामने से होकर गुजरने लगती है।
इस राजमार्ग के दोनों और नारियल के बड़े-बड़े बाग़ नजर आते हैं साथ ही बीच-बीच में केले की खेती भी दिखाई देती है। हरियाली से भरा हुआ यह परिदृश्य इस जगह के उपजाऊ होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। जैसे-जैसे मैं बेलूर की ओर बढ़ रही हूं मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि होयसल राजवंश ने इस छोटे से स्थान को अपनी राजधानी के लिए क्यों चुना? होयसल शासक मूल रूप से पश्चिमी घाट के क्षेत्र मलेनाडु से आते थे वह वीर सरदार थे इसलिए उनकी वीरता ने उन्हें शासन की ऊंचाई तक पहुंचाया। 12वीं शताब्दी में कल्याणी के कलचुरियों और पश्चिमी चालुक्यों के साम्राज्य के बीच आंतरिक कलह अपनी चरम पर थी, जिसका लाभ उठाते हुए होयसल के वीर योद्धाओं ने कर्नाटक और तमिलनाडु तक पहले कावेरी नदी के डेल्टा की उपजाऊ क्षेत्र पर कब्जा किया और अपने वीरता और साहस के चलते उन्होंने अपने राज्य के लिए बड़े क्षेत्र को अपने हिस्से में लिया इनका विस्तार दक्कन के पठार और यहां तक के आंध्र प्रदेश तक फैलाया। 13वीं शताब्दी तक आते-आते यह एक बहुत बड़ा क्षेत्र बन गया था।
होयसल शासक अपनी वीरता के लिए जितना यश कमा रहा था उससे ज्यादा यश उसने अपनी कला, वास्तु कला और धर्म के विस्तार के लिए कमाए। कुछ शताब्दियों तक ही राज करने वाले होयसल राजवंश ने कर्नाटक में अनेकों मंदिरों का निर्माण कराया जिसमें से लगभग 100 से अधिक मंदिर आज तक जीवित है।
यह मंदिर इतने अद्भुत है कि 2023 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया। इन मंदिरों में से तीन मंदिरों को शामिल किया गया जो कि होयसल स्थापत्य कला के अग्रणी उदाहरण माने जाते हैं, जिसमें बेलूर स्थित चन्नाकेश्व मंदिर, जिसे मैं देखने जा रही हूं और और दूसरा मंदिर बेलूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर हलेबीडु नामक स्थान पर स्थित है। जिसका नाम हॉयसालेश्वर मंदिर है और तीसरा मंदिर यहां से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर मैसूर के पास सोमनाथपुर में स्थित है। इस मंदिर का नाम चन्नाकेश्व या केशव मंदिर है। यह तीनों ही मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में 2023 में शामिल हुए। मैं इतनी दूर इन्हीं मंदिरों को देखने आई हूं।
होलसेल राजवंश के योद्धाओं का संबंध कहां से था? इस बात को लेकर कई थ्योरी सुनाई देती है। यहां लगभग 11वीं शताब्दी में प्राप्त शिलालेखों में इनका उत्तर भारत के यादव वंश के साथ संबंध होने के कुछ संकेत देखने को मिलते हैं लेकिन वह बहुत प्रामाणिक नहीं है। उत्तर भारत की यादव समाज के साथ इनका कोई सीधा संबंध हो इसकी पुष्टि नहीं हुई है। वैसे इस राजवंश के संस्थापक नृप काम दुवतीय को माना जाता है । स्थानीय लोग इन्हें शाल भी कहते हैं। इनकी पहली राजधानी सोसावुर थी जोकि वर्तमान चिकमंगलूर जिले में स्थित थी, उसके बाद बेलूर राजधानी बनी फिर द्वारसमुद्र जोकि वर्तमान में हालेबिदु के नाम से जाना जाता है ।
होयसल साम्राज्य के विस्तार पर नज़र डालें तो नदियों की भूमिका विशेष रूप से देखने को मिलती है। यहाँ बेलूर का चुनाव भी यहाँ बहने वाली यागाची नदी को माना जाता है।
होयसल साम्राज्य की राजधानियों के चुनाव के पीछे जो भौगोलिक कारक है उसमें से सबसे प्रमुख कारक इस पूरे शेत्र में बहने वाली तीन प्रमुख नदियां हैं। जो की होयसल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार रही। यहां बहने वाली कृष्णा, तुगभद्रा और कावेरी नदी घाटियां बहुत उपजाऊ थी, जो कि कृषि, पशुपालन, एवं मसाले के रोपण के लिए बेगानों को के लिए उपयुक्त संशीतोषण जलवायु का एक ऐसा अनोखा वातावरण निर्मित करती थी, क्योंकि किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है। होयसल राज परिवारों के मुखिया क्योंकि शुरू में सरदार हुआ करते थे ने अपने बाहुबल का उचित उपयोग कर यहां की बंजर भूमि एवं जंगलों को काटकर खेती योग्य बनाया और पानी की प्रचुर मात्रा का भरपूर उपयोग कर अपने राज्य को मजबूती प्रदान की।
प्रकृति द्वारा प्रदत्त इन अद्भुत वरदानों के प्रति कृतज्ञता भाव होयसल साम्राज्य के सभी राजाओं में पर्याप्त मात्रा में देखा गया जो कि यहां पर मंदिरों के निर्माण के रूप में पर्यालक्षित हुआ।
यहाँ होयसल राजवंश के चौथे और सबसे शक्तिशाली राजा बिट्टीगा जिन्होंने जैन धर्म स्वीकार किया और अपना नाम विष्णुवर्धन रखा मंदिर निर्माण के लिए अग्रणी माने जाते हैं। उन्होंने वर्ष 1117 ई० में तालकड में हुए चोलों के साथ युद्ध और विजय के उत्सव के रूप में बेलूर स्थित चन्नाकेशव मंदिर का निर्माण करवाया।
यहां बेलूर स्थित चेन्ना केशव मंदिर विष्णु भगवान् को समर्पित है। चन्ना केशव का अर्थ होता है “विष्णु की सुंदर छवि” यह पुरा मंदिर ऐसी ही सुन्दर संरचना है, जिसमें द्रविड़ शैली में बना विशाल गोपुरम दूर से ही नजर आता है। इस मंदिर के केंद्र में सितारे के आकार का आधार है। उसके ऊपर मंदिर का निर्माण किया गया है। मुख्य मंदिर सहायक मंदिरों से घिरा हुआ है। मंदिर का प्रांगण एक आयताकार प्रांगण है। जिसके चारों ओर खम्बों से घिरे गलियारे स्थित हैं। मंदिर वर्तमान में एक तल का है। कहते हैं मंदिर की ऊपरी संरचना अब नहीं है। इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। इस मंदिर में तीन प्रवेश द्वार है। इसमें पूर्व की ओर जो द्वारा है। वह मुख्य द्वार है और जिस पर द्वारपाल पहरा देते दिखाई देते हैं, और साथ ही नजर आता है होयसल राजवंश का प्रतीक चिन्ह- एक योद्धा बाघ को मारता हुआ। इस चिन्ह में दिखाया है कि एक साल बाघ से लड़ रहा है। मैंने यहां स्थानीय व्यक्तियों से प्रतीक चिन्ह के बारे में जानने की कोशिश की उन्होंने मुझे एक कन्नड़ लोक कथा का विवरण सुनाया। कहते हैं इसमें युवक होयसल राजवंश के प्रतापी राजा विष्णुवर्धन का प्रतीक है जिन्होंने तलकडू में चोलो पर विजय प्राप्त की थी और जो बाघ है वह चोलो का प्रतीक है। जिसको मार कर राजा विष्णुवर्धन ने अपना राज्य स्थापित किया। यह प्रतीक चिन्ह होयसल राजवंश द्वारा बनाए गए थे सभी स्मारकों में कहीं ना कहीं दिखाई देता है।
राजवंश ने अपनी राजधानी जिसमें सबसे पहली राजधानी दोरासमुद्र (वर्तमान हलेबिड ) लगभग 1060 ईसवीं में बनाई उसके बाद 11वीं शताब्दी में बेलूर को राजधानी बनाया गया क्योंकि बेलूर के पास यागाछी नदी बहती है जो किस क्षेत्र को साल भर उपजाऊ बनाए रखती है साथ ही बेलूर ऊंचाई पर स्थित है जिससे यह सुरक्षा की दृष्टि से भी उत्तम था।
कैसे होलसेल राजवंश ने अपनी वीरता के दम पर चार शताब्दियों तक राज किया लेकिन वह पूरा समय संघर्षों से भरा रहा, दक्षिण में पांडेयों और उत्तर में यादवों से लगातार खतरा बना रहता था लेकिन सबके बावजूद कल और वास्तु कला के प्रति उनके संरक्षण पर कहीं कोई अंतर देखने को नहीं मिला हालांकि हौसला वास्तुकला द्रविड़ वास्तु कला का ही एक अंग है लेकिन अपने बारिक नक्काशी के कारण उसने अपनी विशेष एवं अनूठी पहचान बनाई और एक स्वतंत्र स्थापत्य परंपरा के रूप में भी जाना जाने लगा ऐसा लगता था मानो इन मंदिरों में शिल्पियों ने जान फूक दी है। मंदिर का एक एक खंड जटिल नक्काशी से इतनी नजाकत के साथ तैयार किए गए हैं कि उनका अलंकरण देखते ही ऐसे बनता है जैसे कि वह संजीव हों। इन मंदिरों का आधार तारा डिजाइन में बना हुआ है इस चबूतरे की ऊंचाई लगभग 5 फीट मानी जाती है। मंदिरों की बाहरी दीवारों को सुंदर मूर्ति कला से सजाया गया, जिसमें शिल्पियों ने सोप स्टोन पर अपने बारीक नक्काशी का बहुत सुंदर विवरण प्रस्तुत किया। बेलूर का चन्ना केशव मंदिर इसका अद्भुत उदाहरण है। फिर कहना मुश्किल है कि बेलूर का चन्ना केशव मंदिर ज्यादा सुंदर है या हालेबिदु का मंदिर जिसे होसलेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है ज्यादा सुंदर है। क्योंकि दोनों ही अपने आप में अद्भुत है। इन मंदिरों की बाहर की दीवारें जिसका परिक्रमा किया जाता है। जिसे प्रत्यक्षदा पथ के रूप में भी जाना जाता है। उन पर हिंदू महाकाव्य को शिल्पियों ने मूर्ति कला के माध्यम से उकेर कर रख दिया है। इस मंदिर के बाहरी हिस्से में सुंदर स्तंभ देखने को मिलते हैं जिनका शिल्पियों ने मूर्ति कला से भर दिया है, इसमें नृत्य करती हुई मूर्तियां, देवियाँ बहुत अद्भुत है। इस मंदिर में विष्णु भगवान की सुंदर मूर्ति स्थापित है। जिसके द्वारा पर दोनों और बहुत सुंदर भगवान की मूर्तियां हैं।
काले पत्थर पर उकेरी मूर्तियां और उनके अलंकरण उनके श्रृंगार इनके आभूषण इतनी बारीकी से किए गए हैं कि जिनके बीच से धागा होकर निकाला जा सकता है।
मंदिर स्थापित कला में पूरे भारत में इसके समान बारीक नक्काशी वाला कोई दूसरा मंदिर मैंने नहीं देखा। ये मंदिर आडम्बर रहित है।
बेलूर की सबसे अच्छी बात यह है कि बेलूर का चन्ना केशव मंदिर बहुत सरल और सहज भाव में देखा जा सकता है। मैं जैसे ही नगर में प्रवेश करती हूं तो बस स्टॉप से मंदिर की ओर जाने के लिए चौड़ी सड़क मंदिर तक लेकर जाती इस पूरे क्षेत्र में आवाजाही बहुत सरल है। एक इक्का-दुक्का प्रसाद की दुकानें हैं। कहीं कोई भीड़ नहीं है। हालांकि यहां इस मंदिर के दर्शन करने दिनभर बहुत सारे लोग आते हैं। आसपास के राज्यों से बसें भरकर लोग आते हैं। लेकिन सबके बावजूद यहां कोई अव्यवस्था देखने को नहीं मिलती बहुत सरल सहज भाव में लोग यहां आते हैं। मंदिरों के दर्शन करते हैं, इस कला को निहारत हैं। सराहते हैं। और चले जाते हैं।
कितना दुखद है कि इन सुन्दर संरचनाओं को मिटाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने दो बार आक्रमण किया। बेलूर का चन्नाकेश्व मंदिर दिल्ली सल्तनत के अक्रमंकारियों से इस लिए बच गया क्यूँ कि इसे मिटटी के टीले में छुपा दिया गया था।
यह आने वाले व्यक्ति भले ही एक-दो दिन यहां रहने के बाद यहां से वापस लौट जाते हैं लेकिन उनके मन मस्तिष्क में इन मंदिरों की छाप हमेशा उनके साथ रहती है। अगर आपने होयसल साम्राज्य के दौरान बने हुए सुंदर मंदिर नहीं देखे तो कुछ भी नहीं देखा है।
मेरा ठहरने का स्थान मंदिर से दस क़दम पर एक होम स्टे था जोकि कर्णाटक के पारंपरिक घरों की याद दिलाता है। ये स्थान मंदिर के इतना नजदीक है की भोर में ब्रम्ह महूरत में मंदिर से आने वाली ललिता सहस्त्रमम के जाप से मेरी आंख खुली। ये अनुभव अलौकिक था।
(Dr. Kaynat Kazi is a cultural conservationist, academician, author, documentary filmmaker, and photographer)