झारखंड के सिमडेगा, खूंटी और गुमला जिले दशकों से भारतीय हॉकी को प्रतिभाशाली खिलाड़ी देते आए हैं। मौजूदा भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सलीमा टेटे भी इसी विरासत की देन हैं। अब नई खेलो इंडिया योजना से राज्य के जमीनी स्तर के हॉकी ढांचे को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
झारखंड में हॉकी केवल खेल नहीं, बल्कि कई आदिवासी समुदायों के लिए जीवन और संस्कृति का हिस्सा है। 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण दिलाने वाली टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुई यह विरासत माइकल किंडो, सिल्वानुस डुंग डुंग, मनोहर टोपनो, निक्की प्रधान, सलीमा टेटे और दीपिका सोरेंग जैसे खिलाड़ियों तक पहुंची है।
आज राज्य में 5,000 से अधिक लड़के और लड़कियां आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए हॉकी की तैयारी कर रहे हैं। सिमडेगा में हॉकी रेजिडेंशियल सेंटर, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और कई प्रशिक्षण केंद्र संचालित हैं। खूंटी में भी लड़कों और लड़कियों के लिए आवासीय सुविधाओं के साथ 40-बेड वाला छात्रावास और कई कोचिंग सेंटर हैं। गुमला, रांची, हजारीबाग और अन्य जिलों में भी प्रशिक्षण नेटवर्क का विस्तार हुआ है।
इस व्यवस्था में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) की महत्वपूर्ण भूमिका है। रांची और हजारीबाग के केंद्रों में खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण के साथ फिटनेस, फिजियोथेरेपी, पोषण, मनोवैज्ञानिक तैयारी और प्रतियोगिताओं का अनुभव दिया जाता है। टाटा समूह ने भी ग्रामीण प्रशिक्षण केंद्रों और कोचिंग सुविधाओं के जरिए इस पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है।
अब नई खेलो इंडिया योजना 2026-31 इस विकास को और गति देने वाली है। योजना के तहत ₹36,441 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछली योजना से आठ गुना अधिक है। इसमें प्रतिभा पहचान, खेल बुनियादी ढांचे और खेल तकनीक पर विशेष जोर है।
पिछले 16 वर्षों में झारखंड ने हॉकी इंडिया राष्ट्रीय चैंपियनशिप की महिला प्रतियोगिताओं में 34 पदक, जिनमें 10 स्वर्ण, 11 रजत और 13 कांस्य शामिल हैं, जीते हैं।
हॉकी की इन नर्सरियों में हर दिन हजारों बच्चे अपने सपनों को आकार दे रहे हैं। इनमें से कुछ ही राष्ट्रीय टीम तक पहुंचेंगे, लेकिन झारखंड की हॉकी परंपरा को देखते हुए भारत का अगला बड़ा सितारा यहीं से निकलने की पूरी संभावना है।


