बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भी विपक्ष के रवैये में कोई बदलाव नज़र नहीं आता। चुनाव प्रक्रिया के दौरान कभी चुनाव आयोग पर सवाल, कभी सरकार पर आरोप और कभी वेलफेयर स्कीम्स को निशाना बनाने की जो आदत बनी थी, वह परिणाम आने के बाद भी जस की तस है। जनता ने जिस नरेटिव को पूरी तरह से खारिज कर दिया, विपक्ष उसी पर अड़ा हुआ दिखाई देता है। कथित ‘वोट चोरी’ जैसी दलीलों को बिहार के मतदाताओं ने न केवल नकारा बल्कि एनडीए को स्पष्ट और प्रचंड जनादेश देकर यह भी बता दिया कि चुनाव का विमर्श किस दिशा में बह रहा है। इसके बावजूद विपक्ष दिल्ली में बैठकें कर एसआईआर के खिलाफ रैली की बातें कर रहा है, मानो हार का विश्लेषण करने के बजाय उसी पुरानी भूल को दोहराना ही उनकी नियति बन गई हो।
कथनी और करनी में बड़ा फर्क क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर विपक्ष को एसआईआर पर इतना अविश्वास था तो क्या उन्होंने इस प्रक्रिया के दौरान सभी बूथों पर अपने बीएलए नियुक्त किए? जवाब है- नहीं। बिहार में कुल 90,712 पोलिंग बूथ थे लेकिन कांग्रेस ने एसआईआर की अवधि में मात्र 17,549 बीएलए तैनात किए। यह संख्या न केवल अपर्याप्त है बल्कि साफ दिखाती है कि कांग्रेस खुद भी उतनी गंभीर नहीं थी जितना वह अपने बयानबाज़ी में दिखने की कोशिश करती रही। जिस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष देशभर में भय का माहौल बनाने की कोशिश करता रहा, उसी प्रक्रिया की निगरानी के लिए उपलब्ध उनकी तैयारी न्यूनतम स्तर तक सीमित रही। यदि कांग्रेस वास्तव में मानती कि एसआईआर लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सबसे बड़ा खतरा है, तो उसकी पहली प्राथमिकता बूथ-स्तर पर मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करना होती। लेकिन यह न हो सका क्योंकि पार्टी के भीतर न तो संगठन की मजबूती है, न ही ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का वही नेटवर्क जिसे वे सार्वजनिक रूप से दावा करते हैं।
हार की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
बिहार चुनाव के दौरान लगातार आरोप लगाने के बावजूद कांग्रेस एक भी ठोस उदाहरण सामने नहीं रख सकी जो कथित ‘वोट चुनरी’ या वोटों में छेड़छाड़ को सिद्ध कर सके। ऐसे में एसआईआर का विरोध जारी रखना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि विपक्ष मुद्दों को समझने या जनता की नब्ज़ पकड़ने की बजाय पुराने ढर्रे पर चलने में ही सहज महसूस कर रहा है। इससे विपक्ष की गंभीरता पर ही प्रश्नचिह्न उठता है कि क्या वह वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर संघर्ष कर रहा है या महज़ राजनीतिक नैरेटिव गढ़कर हार की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
सच्चाई से कोसों दूर खयाली पुलाव?
विपक्ष की दुविधा यहीं खत्म नहीं होती। चुनाव परिणामों के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना जैसी वेलफेयर स्कीम्स पर भी सवाल उठाए, मानो उन्हें अभी भी यह विश्वास न हो कि बिहार के मतदाताओं ने हाल के वर्षों में हुए विकास, बेहतर शासन और योजनाओं के धरातलीय लाभ के आधार पर मतदान किया है। विपक्ष जिस ‘रातोंरात चमत्कार’ की कल्पना को चुनाव परिणामों का आधार बता रहा है, वह उसकी उस सोच को उजागर करता है जो जनता की वास्तविक आकांक्षाओं को समझने से कोसों दूर है। यह परिणाम किसी एक योजना या एक घोषणा का प्रभाव नहीं हैं बल्कि पिछले एक दशक में बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में हुए व्यापक बदलाव की अभिव्यक्ति हैं।
मतदाताओं का विश्वास और मजबूत हुआ
विपक्ष हार के बाद भी आत्ममंथन के बजाय आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता चुनता दिखा है, जबकि बिहार के जनादेश का गहरा अर्थ कुछ और है। एक ओर नीतीश कुमार का सुशासन मॉडल ‘जंगलराज’ से मुक्ति का स्थायी विकल्प बन चुका है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश जिस स्थिरता, विकास और विश्वसनीयता की राजनीति की ओर बढ़ा है, उसका सकारात्मक असर बिहार के समाज पर गहराई से दिखाई देता है। बीते वर्षों में बिहार ने ‘सबसे पिछड़े राज्य’ की छवि को पीछे छोड़ निर्माण, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, और सामाजिक कल्याण के नए मानक स्थापित किए हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि निरंतरता और सुचारू क्रियान्वयन की वजह से मतदाताओं का विश्वास और मजबूत हुआ है।
बिहार की बदलती राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव, संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व की निरंतरता- ये तीनों कारक निर्णायक रहे हैं। विपक्ष यदि अभी भी केवल नकारात्मक राजनीति, संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास और व्यक्तिगत हमलों के सहारे चुनावी लड़ाइयां लड़ना चाहता है तो परिणाम आने वाले वर्षों में और अधिक कठोर हो सकते हैं। भारतीय मतदाता अब पहले से कहीं अधिक सजग, विश्लेषणात्मक और विकास को लेकर केंद्रित हो चुका है। वह सिर्फ वैकल्पिक नारे नहीं चाहता बल्कि उसे ठोस दृष्टि, विश्वसनीय नेतृत्व और धरातलीय कामकाज चाहिए।
जिन विपक्षी नेताओं को यह लगता है कि एसआईआर या मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना या केंद्र की किसी वेलफेयर स्कीम ने अचानक अंतिम क्षण में चुनाव का रुख मोड़ दिया, उन्हें बिहार के गांवों में जाकर देखना चाहिए कि सड़क, बिजली, सिंचाई, डिजिटल व्यवस्था और आर्थिक गतिविधियां कैसे लोगों की जिंदगी बदल रही हैं। किसी समाज में परिवर्तन एक दिन में नहीं होता; यह लगातार किये गए प्रयासों का परिणाम होता है। एनडीए की जीत उसी विश्वास का प्रमाण है।
शिकायत नहीं समाधान पर फोकस्ड है मतदाता
समय है कि विपक्ष अपनी भूमिका को फिर से परिभाषित करे। मजबूत बनने के लिए विश्वसनीयता ज़रूरी है और यह विश्वसनीयता केवल तथ्यों, जनसंपर्क, जमीनी उपस्थिति और आत्ममंथन से ही मिल सकती है। यदि विपक्ष हर चुनाव के बाद वही पुरानी गलतियां दोहराता रहेगा, तो न केवल उसकी राजनीतिक जमीन सिकुड़ती जाएगी बल्कि भारत की नई विकास-प्रधान राजनीति का विस्तार और सहज रूप से होगा क्योंकि मतदाता अब सिर्फ शिकायतें सुनने के लिए तैयार नहीं है वह समाधान चाहता है और समाधान उसे वहीं दिख रहा है जहां विजन और क्रियान्वयन दोनों मौजूद हैं।
(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)


