नई दिल्ली से दुश्मनी मोल लेते तुर्किये और अज़रबैजान, इस्लामाबाद से करीबी पड़ रही है भारी

6 फरवरी 2023 के दिन तुर्किये में बड़ा भूकंप आया। तबाही और बदहवासी के माहौल के बीच नई दिल्ली ने अंकारा की मदद के लिए ‘ऑप्रेशन दोस्त’ लॉन्च किया गया। भारत से राहत सामग्री, मेडिकल किट्स, बचाव दल और डॉक्टरों की बड़ी टीम ने वहां शानदार काम किया। एहसान भूलाते हुए नई दिल्ली के खिलाफ खड़ा होकर इस्लामाबाद का साथ देते हुए राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने दुनिया के सामने अपनी एहसानफरामोशी साबित कर दी। इसका खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ा रहा है। भारत के साथ तुर्किये के हुए कई तालीमी समझौतों को अब रद्द कर दिया गया। वहां से होने वाले संगमरमर के इम्पोर्ट पर भी रोक लगा दी गयी। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने भी अंकारा के साथ तिजारती तालुक्कातों को खत्म करने का मन बना लिया है। भारी तादाद में हिंदुस्तानी टूरिस्टों ने तुर्किये की मजम्मत करते हुए वहां के सैरसपाटों की ट्रिप कैंसिल कर दी है। ग्राउंड हैंडलिंग और कार्गो सर्विसेज मुहैया करवाने वाली तुर्की की कंपनी सेलेबी के ऑप्रेशंस को फिलहाल रोक दिया गया। ऐसे में सदर एर्दोगन को अच्छे से समझ में आ गया होगा कि दुनिया भर में कटोरा लेकर भीख मांग रहे पाकिस्तान का साथ देकर उन्होंने कितनी भारी भूल की।

खतरनाक है अंकारा और इस्लामाबाद की जुगलबंदी
तुर्किये की शह पर ही टीबी-3 ड्रोन और बायरकतार टीबी-2 ड्रोन हिंदुस्तानी सरजमीं पर पाक सेना ने दागे। पाकिस्तानी सेना ने भारत में 36 अलग-अलग जगहों पर तुर्की में बने ड्रोन दागे। पश्चिमी मीडिया के हवाले से ये खब़रें भी सामने आ रही है कि ऑप्रेशन सिंदूर लॉन्च होने के ठीक पहले तुर्की वायु सेना का सी-130 हरक्यूलिस कार्गो प्लेन पाकिस्तान में उतरा था, खास बात ये भी है कि इस बीच कराची बंदरगाह पर तुर्की का एक जंगी जहाज भी पहुंचा था। गाहे बगाहे अंकारा रावलपिंडी के जंगी सिपहसालारों को फौजी साजोसमान देता रहा है। दोनों मुल्कों के बीच स्‍ट्रैटेजिक कॉर्पोरेशन काउंसिल बनाई गई है, जिसके तहत तुर्किये की सरकारी डिफेंस प्रोडक्शन कंपनी ने कई हथियार पड़ोसी मुल्क को दिए। साथ ही एर्दोगन की अगुवाई में जंगी युद्धपोत पाकिस्तान को दिए जाने को लेकर कवायदें तेज हुई। दोनों के बीच सैन्य सहयोग का लंबा इतिहास, पाकिस्तान को लगातार तुर्किये से मिलते हथियार और जंगी तकनीक, ऑप्रेशन सिंदूर से ठीक पहले तुर्किये के हरक्यूलिस का पड़ोसी मुल्क में उतरना और कराची में अंकारा के नौसैनिक युद्धपोत का आना काफी कुछ साफ कर देता है।

पाकिस्तानी एजेंडा चलाते एर्दोगन
बात यहीं तक आकर नहीं रूकती ऑप्रेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के पक्ष में नैरेटिव गढ़ने और गलत जानकारियां फैलाने के चलते तुर्किये के सरकारी प्रसारक टीआरटी वर्ल्ड के आधिकारिक एक्स अकाउंट को भारत में ब्लॉक कर दिया। जिस तरह से अंकारा पड़ोसी मुल्क का हिमायती बना फिर रहा है, उसका मुंहतोड़ जवाब नई दिल्ली ने कई मौकों पर रणनीतिक, कूटनीतिक और कारोबारी मंचों से दिया है। बता दे कि एर्दोगन ने कई बार अलग-अलग मंचों से कश्मीर मुद्दे का राग अलापा, खासतौर से संयुक्त राष्ट्र महासभा में। जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया तब तुर्किये का रूख़ भारत की ओर आलोचनात्मक रहा।

अंकारा के खिलाफ प्रो-एक्टिव नई दिल्ली
कश्मीर मसले पर एर्दोगन के गैरवाज़िब और नाजायज दखल से तुर्किये और भारत के रिश्ते खटास भरे है। रही सही कसर अंकारा ने ऑप्रेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ खड़े रहकर पूरी कर दी। नई दिल्ली ने इसका जवाब देने में आगे रही। तुर्किये के खिलाफ भारत ने उसके क्षेत्रीय विरोधियों से करीबियां बढ़ाकर उसका कूटनीतिक और रणनीतिक घेराव किया। मुस्लिम मुल्कों में अपनी साख, विश्वसनीयता और मजबूत विदेश नीति का प्रदर्शन करके भारत तुर्किये को चुनौती दे रहा है। सामरिकता से कहीं ज्यादा भू-राजनीतिक गलियारों के इस्तेमाल करके नई दिल्ली की रणनीति पहले से ज्यादा धारदार हुई। एर्दोगन के क्षेत्रीय विरोधियों साइप्रस, ग्रीस और आर्मेनिया से नई दिल्ली की साझेदारियां बढ़ी है। बीते साल भारतीय वायु सेना ने ग्रीस के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास किया। दूसरी ओर आर्मेनिया को नई दिल्ली से आकाश-1एस, ब्रह्मोस, हॉवित्जर गन और पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम मिले, जिससे एर्दोगन खार खाये बैठे है। साथ ही समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में भारत ने साइप्रस और ग्रीस को हर मुमकिन मदद का भरोसा दिया है। यहीं वज़ह है कि अंकारा का असर सीमित दायरों में सिमटकर रहा गया।

नई दिल्ली के नीति-नियंता तुर्किये के भारत विरोधी चेहरे को काफी पहले से पहचान गए थे, इसलिए बीते साल तुर्किये से जुड़ी एक डिफेंस कंपनी का सौदा रद्द कर दिया गया। ये कंपनी भारतीय नौसेना के लिए जहाज बनाने वाली थी। इस सौदे में कुछ जहाजों को अपग्रेड किया जाना भी शामिल था। एर्दोगन के भारत विरोधी रूख़ और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं की बुनियाद पर इस कॉन्ट्रैक्ट को रोक दिया गया। माना जा रहा था कि अगर वहां भारतीय नौसेना के लिए जहाज बनते तो उससे जुड़ी गुप्त और संवेदनशील जानकारियां रावलपिंडी में बैठे जनरलों तक आसानी से पहुंच जाती।

तुर्किए की आत्मघाती राह पर अज़रबैजान
अंकारा के तर्ज पर बाकू भी नई दिल्ली के खिलाफ मुखर रहा है। इस्लामाबाद को मजबूती देने के लिए उसने राजनयिक और सैन्य संबंधों को बढ़ाया। साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उसने पाकिस्तान की हिमायत करते हुए उसके लिए तकरीरें जारी की। इस्लामाबाद के हुक्मरानों के शह पर उसने कई बार कई अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से भारत विरोधी बयान दिए। नार्गोनो काराबाख संघर्ष में अजरबैजान को एर्दोगन से जंगी इमदाद मिल रही थी, जब साल 2022 आर्मेनिया ने हथियारों की खरीद के लिए भारत से रक्षा समझौता किया तो उसे भारी झटका लगा। इसके बाद वो और भी खुलकर अंकारा और इस्लामाबाद के खेमे में उनके साथ रणनीतिक और कूटनीतिक गलबाहियां करने लगा। पहलगाम नरसंहार के बाद वो नई दिल्ली की जवाबी कार्रवाई की मजम्मत करते हुए और पाकिस्तान के पक्ष को जायज ठहराता रहा। इससे भी चार कदम आगे बढ़कर अजरबैजान ने इस्लामिक मुल्कों से इस्लामाबाद के पक्ष में एकजुट होने की अपील की, जो कि खोखली साबित हुई। इसे प्रकरण से साफ हो गया कि वो पाकिस्तान के साथ वफादरी निभाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहता।

भारत की ओर से तुर्किये को मिलता कूटनीतिक जवाब
एर्दोगन को आईना दिखाने के लिए भारत ने हाल के सालों में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से करीबियां बढ़ाई। जिस मुस्लिम जगत का रहनुमा बनाने का ख्वाब तुर्की के सदर पाले बैठे है, उसे नई दिल्ली ने धक्का दे दिया। भारत के सऊदी और यूएई में निवेश एवं आत्मीय द्विपक्षीय संबंधों के चलते तुर्किये की मंशा अब ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है। मुस्लिम मुल्कों की ये दोनों बड़ी ताकतें आज नई दिल्ली के साथ खड़े होकर एर्दोगन के मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े इस्लामी आंदोलनों को मुंह चिढ़ा रही हैं। जिस तरह से भारत की पहल की चलते एर्दोगन का सपना मटियामेट हो चला है, उसकी खीझ और खुन्नस निकालने के लिए उसका पाकिस्तान के साथ खड़ा होकर शिकस्त खाना लाज़िमी है।

यूएई के साथ भारत की आर्थिक भागीदारी, ऊर्जा सहयोग, द्विपक्षीय कारोबार और रक्षा संबंध हाल के सालों में काफी बढ़े है। दोनों मुल्क के दरम्यान आंतक के खिलाफ तैयारियां और संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास में इज़ाफा हुआ है। दोनों के बीच बढ़ते साझा रणनीतिक हितों से अंकारा बौखलाया हुआ है। विकास और बेहतरी की राह पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की सोच लगभग एक जैसी है, जो कि खास किस्म की आत्मीय तारतम्यता पैदा करते है। आयात-निर्यात और निवेश में तेजी के चलते सऊदी आज भारत के अनन्य सहयोगियों में शुमार है। यानि की जिन्हें एर्दोगन अपने पाले में लाना चाह रहे थे, आज वो नई दिल्ली के मुरीद बन बैठे है।

गौरतलब है कि मुस्लिम ब्रदरहुड के झंडाबरदार एर्दोगन ने अरब ताकतों के साथ अपने रिश्ते पूरी तरह खराब कर लिए। सीरिया और लीबिया में तुर्किए के गैरमुनासिफ दखल और अब्राहम समझौते की नाफरमानी से अरब ताकतें अब अंकारा से दूरी बना चुकी है। नई दिल्ली को इन्हीं हालातों से कूटनीतिक माइलेज हासिल हुई। खाड़ी मुल्कों के अलावा पश्चिम एशिया में जिस तरह से मोदी सरकार ने खुद को स्थापित किया, उससे नई दिल्ली विश्वसनीय भागीदार के रूप में उभरा है, यही बात तुर्किये को रास नहीं आ रही। इसी कूटनीतिक नाकामी और वैचारिक बदहज़मी का असर है कि आज वो भिखारी मुल्क से साथ मिलकर नई दिल्ली के खिलाफ षड़यंत्र का इंद्रजाल रच रहा है। इसी के जवाब में रणनीतिक रूप से भारत तुर्किये के विरोधियों से जुड़ रहा है। क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाने के लिए पूर्वी भूमध्य सागर में भारतीय नौसेना की कवायदें बढ़ी है। फिलहाल भारत हर उस फॉम्यूले को आजमा रहा है, जिससे कि अंकारा की विस्तारवादी सोच के खिलाफ मजबूत क्षेत्रीय घेरेबंदी तैयार की जा सके। इसी सोच के साथ चलते हुए एर्दोगन के तिलिस्म को तोड़ जा सकेगा।

भले ही एर्दोगन ने पाकिस्तान को हथियार दिए लेकिन भारत ने उसका मुंहतोड़ जवाब काफी सोचे समझे ढंग से कूटनीतिक और रणनीतिक विकल्पों के साथ दिया। आज तुर्किए के विरोधी साइप्रस, ग्रीस और अर्मेनिया नई के साथ खड़े है। खाड़ी मुल्कों से गहरे होते नई दिल्ली के रिश्ते तुर्की के लिए भारी परेशानी का सब़ब है। साफ है कि अंकारा इस्लामाबाद के साथ खड़ा रहेगा। फिलहाल ये मौका एर्दोगन के लिए आत्ममंथन करने का है, जिस भिखारी मुल्क के लिए वो जंगी इमदाद दे रहे है, कहीं उसके साइड इफैक्ट के चलते उनकी हालात भी पाकिस्तान की तरह हाथ में कटोरा लिए घूमने वाली ना हो जाए। अंकारा के लिए बेहतर होगा कि वो इस्लामाबाद से परहेज करते हुए कश्मीर पर बयानबाज़ी करने से बचे।

(लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं)

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