देश में नए आपराधिक कानूनों के तहत लागू भारतीय न्याय संहिता को 1 जुलाई को दो वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1 जुलाई 2024 से लागू नई न्याय व्यवस्था ने देश में समयबद्ध, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित न्याय प्रणाली की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत की है। इन कानूनों का उद्देश्य आम नागरिकों को त्वरित और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना है।
नई न्याय संहिता में जांच पूरी करने, चार्जशीट दाखिल करने और न्यायालय द्वारा निर्णय देने के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की गई है। सरकार का लक्ष्य है कि इन कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद देश में किसी भी एफआईआर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक न्यायिक प्रक्रिया लगभग तीन वर्षों के भीतर पूरी हो सके।
नई व्यवस्था के तहत सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले सभी मामलों में फॉरेंसिक जांच अनिवार्य कर दी गई है, जिससे जांच की गुणवत्ता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।
पिछले दो वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर जांच पूरी करने के औसत समय में लगभग 25 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। भारतीय न्याय संहिता के तहत अब तक करीब 75 लाख एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं, जबकि लगभग 60 लाख मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई है।
समयबद्ध जांच के मामले में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने की अनुपालन दर 2024 में लगभग 51 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 67 प्रतिशत से अधिक हो गई है। वहीं, 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने की अनुपालन दर 39.5 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 61 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
यौन अपराधों से जुड़े मामलों में भी तेजी आई है। दो महीने के भीतर चार्जशीट दाखिल करने की अनुपालन दर, जो 2018 में 44 प्रतिशत थी, वर्ष 2025 में बढ़कर 75 प्रतिशत से अधिक हो गई है।
नई न्याय संहिता लागू होने के बाद जीरो एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया भी अधिक सरल और सुलभ हुई है। अब तक देशभर में 63 हजार 500 से अधिक जीरो एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं।
डिजिटल न्याय प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में भी तेजी से काम हुआ है। अब तक 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ई-साक्ष्य प्रणाली अधिसूचित की जा चुकी है तथा इसके माध्यम से 46 लाख 50 हजार से अधिक साक्ष्य आईडी तैयार की गई हैं। सरकार का लक्ष्य 1 जनवरी 2027 तक जांच और ट्रायल की प्रक्रिया को शत-प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संचालित करना है।
दो वर्षों में भारतीय न्याय संहिता के तहत हुए इन सुधारों को न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है


