केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई अन्य नेताओं ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को की पुष्पांजलि अर्पित

केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और अन्य नेताओं ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी 125वीं जयंती पर रविवार को नई दिल्ली में संविधान सदन के सेंट्रल हॉल में पुष्पांजलि अर्पित की।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विजन करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है

6 जुलाई 1901 को जन्मे श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता और आजादी के बाद भारत की राजनीति के एक प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। भारत की एकता और अखंडता की दिशा में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विजन करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज की भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक पूर्ववर्ती हैं। उनको को एक कट्टर राष्ट्रवादी, दूरदर्शी राजनीतिक नेता और भारत की संप्रभुता और प्रगति के लिए प्रतिबद्ध शिक्षाविद् के रूप में याद किया जाता है।

जेपी नड्डा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्म-जयंती पर उन्हें नमन किया

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्म-जयंती पर उन्हें नमन किया। जेपी नड्डा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा, “अपने प्रखर राष्ट्रवादी विचारों और कामों से मां भारती को गौरवान्वित करने वाले महान विचारक, करोड़ों कार्यकर्ताओं के प्रेरणापुंज, विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी के आधार स्तंभ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्म-जयंती पर उन्हें भावपूर्ण नमन करता हूं।”

जेपी नड्डा ने आगे लिखा, “जम्मू-कश्मीर से दो विधान, दो निशान और दो प्रधान समाप्त करने के लिए श्रद्धेय श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक संघर्षरत रहे। कश्मीर से धारा-370 हटाकर उनके स्वप्न को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने साकार किया है। मां भारती की एकता, अखंडता और सम्मान के लिए दिया गया आपका अमर बलिदान अनंतकाल तक देशवासियों को राष्ट्रसेवा और समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर कहा, “आजाद भारत के इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी एक ऐसे नाम हैं, जिनके लिए देश की एकता और अखंडता से बढ़कर कुछ भी नहीं था। उत्तर में कश्मीर से लेकर पूर्व में बंगाल तक, उन्होंने देश की इंच-इंच भूमि के लिए संघर्ष किया और जम्मू-कश्मीर से दो प्रधान, दो विधान, दो निशान समाप्त करने के संघर्ष में शहीद तक हो गए। जनसंघ की स्थापना से उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक विकल्प दिया, जिसके मूल में भारतीयता थी।

महान विचारक, हम सब के प्रेरणापुंज व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सच्चे उपासक श्रद्धेय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को उनकी जयंती पर नमन करता हूँ।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा-उनके चरणों में नमन करके हमें संतुष्टि मिलती है

वहीं, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर कहा, “प्रखर राष्ट्रवादी नेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चरणों में हम नमन करते हैं। डॉ. मुखर्जी ने ही भारतीय संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं के आधार पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक नए राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। जनसंघ का उद्घोष था कि एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे… उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया, आज उनके चरणों में नमन करके हमें संतुष्टि मिलती है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उनका संकल्प पूरा हुआ है। कश्मीर में आज तिरंगा लहरा रहा है”

श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे

दरअसल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। संसद में अपने भाषण में उन्होंने धारा-370 को खत्म करने की भी जोरदार वकालत की थी। उन्होंने कश्मीर को लेकर एक नारा दिया था, “नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान।”

अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर भारतीय संविधान की अधिकतर धाराएं लागू नहीं होती थीं। एक प्रावधान था कि किसी भी भारतीय नागरिक को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए विशेष परमिट लेना पड़ता था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके सख्त खिलाफ थे।

अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।”

श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिए 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े थे। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया था।(IANS, ANI)

 

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