जेएनयू पहुंचे उपराष्ट्रपति, युवाओं से किया राष्ट्र-निर्माण में योगदान का आह्वान

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन आज सोमवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) पहुंचे। यहां उन्होंने जेएनयू की लोकतांत्रिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वाद-विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के अनिवार्य तत्व हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन प्रक्रियाओं का अंततः किसी निष्कर्ष तक पहुंचना आवश्यक है। एक बार निर्णय हो जाने के बाद, उसके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सामूहिक सहयोग अनिवार्य है जिससे प्रशासन सुचारु और प्रभावी ढंग से संचालित हो सके। उपराष्ट्रपति ने इस बात पर बल दिया कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक मूल्यों का समानांतर विकास आवश्यक है।

उपराष्ट्रपति जेएनयू के 9वें दीक्षांत समारोह में शामिल हुए। उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि उपनिषदों और भगवद्गीता से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुक्कुरल तक, भारतीय शास्त्रों और ग्रंथों ने सदैव समाज और नैतिक जीवन के केंद्र में शिक्षा को स्थान दिया है। उपराष्ट्रपति ने स्नातक विद्यार्थियों को बधाई देते हुए उनसे अपने ज्ञान और कौशल को राष्ट्र सेवा में समर्पित करने का आह्वान किया। स्वामी विवेकानंद की जयंती का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल डिग्रियां प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, बौद्धिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होना चाहिए।

सी. पी. राधाकृष्णन ने रेखांकित किया कि शिक्षा और समुचित प्रशिक्षण के माध्यम से ही भारत का युवा वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन को साकार कर सकता है। भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षण केंद्रों का संदर्भ दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची शिक्षा आचरण और चरित्र का निर्माण करती है, न कि केवल उपाधियों का संचय। उपराष्ट्रपति ने जेएनयू के समावेशी वातावरण की सराहना की तथा छात्र प्रवेश और संकाय नियुक्तियों में समानता और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के विश्वविद्यालय के प्रयासों की प्रशंसा की।

उन्होंने विश्वविद्यालय नेतृत्व द्वारा उभरते और सभ्यतागत विषयों में हिंदू, जैन और बौद्ध अध्ययन के नए केंद्रों की स्थापना की भी प्रशंसा की। भारतीय भाषाओं के संवर्धन हेतु जेएनयू की पहल का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से तमिल अध्ययन के विशेष केंद्र तथा असमिया, उड़िया, मराठी और कन्नड़ में स्थापित चेयर्स और कार्यक्रमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप ज्ञान-सृजन को मातृभाषाओं में फलना फूलना चाहिए।

अपने संबोधन के दौरान, उपराष्ट्रपति ने यहां जेएनयू के छात्रों से तीन मूल दायित्वों को अपनाने का आग्रह किया, जिनमें सत्य की खोज में बौद्धिक ईमानदारी, असमानताओं को कम करने हेतु सामाजिक समावेशन और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान शामिल हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से संविधानिक मूल्यों और भारत की सभ्यतागत विरासत से मार्गदर्शन लेने, तथा अपने माता-पिता और शिक्षकों का सदैव सम्मान करने का आह्वान किया। विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की एकता और सामूहिक प्रगति के संकल्प को दोहराया। (इनपुट-आईएएनएस)