आजादी के कई वर्षों बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल था ये किसी से छिपा नहीं है। ख़ासकर देश के ग्रामीण क्षेत्रों ने वर्षों इसे एक अभिषाप की तरह झेला है। कुछ वर्षों पहले तक लोगों को सही समय पर इलाज मिलने की उम्मीद रखना तो मानिए आसमान से तारे तोड़ लाने जैसी ख्वाहिश कही जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। दवा तो दूर सामान्य जागरुकता भी नहीं थी ग्रामीण इलाकों में। समय से इलाज तो छोड़िए लोगों को अपनी बीमारी के चलते टूटती सांसों की डोर की भी भनक नहीं लग पाती थी। इसीके चलते कितनों ने अपने दोस्त, मां-बाप, भाई-बहन, पत्नी-बच्चे या किसी सबसे करीबी को खो दिया। इनमें से ज़्यादातर ने इस अभिषाप से हार मानकर इसे अपना नसीब मान लिया लेकिन मां भारती का एक सेवक भारत की बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था का भाग्य बदलने में वर्षों पहले ही चुपचाप जुट गया था। जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और दूरदर्शिता व संवेदनशीलता से इस देश के बीमार हेल्थ सिस्टम को न सिर्फ वेंटिलेटर से उतारा बल्कि इस देश के अंतिम पंक्ति में खड़े हर गरीब तक बेहतर इलाज की पहुंच बनाई है।
जब मोदी ने लिया बड़ा संकल्प
जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। देश में हेल्थ सिस्टम में हुए सुधार के पीछे नरेंद्र मोदी के बड़े विजन व अनवरत नए विचारों का समावेश करते हुए दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ लिए गए कई बड़े फैसले हैं। इस यात्रा को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा। भले ही भारत के स्वास्थ्य सिस्टम में सुधार की यात्रा अभी जारी है लेकिन इसकी पटकथा नरेंद्र मोदी ने गुजरात का सीएम रहते हुए ही लिख दी थी। हाल में एक किताब जिसका शीर्षक, ‘पीएचसी से एनमसी तक’ है, उसको पढ़ने का मौका मिला। इस किताब को पढ़ने के बाद हमेशा कठोर प्रशासक की भूमिका में दिखने वाले नरेंद्र मोदी की एक ऐसे संवेदनशील व्यक्तित्व के तौर पर पहचान हुई जो दिनरात, कई वर्षों से अनवरत इस देश के ग़रीब, किसान, मज़दूर, नौजवान व नौनिहाल के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए एक बड़े सपने को साकार करने के में जुटा हुआ है।
इस फिल्म के निर्देशक मोदी तो पात्र हर भारतीय
चूंकि इस किताब में जो भी तथ्य बतलाए गए हैं वो पेशे से चिकित्सक डॉ जेएल मीना के हवाले हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर वो भी एक ऐसे अनसंग वॉरियर को तौर नज़र आते हैं जो मोदी के विजन को साकार करने में पर्दे के पीछे से वर्षों से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी द्वारा देश के हेल्थ सिस्टम को दुरुस्त करने व ख़ासकर अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक इलाज पहुंचाने के लिए उठाए गए ‘आउट ऑफ वे’ कदम व डॉ जेएल मीना को पीएचसी से एनमसी तक पहुंचाने के पीछे का उनका विजन किसी एक ऐसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है जिसके निर्माता- निर्देशक तो पीएम मोदी हैं लेकिन पात्र हर भारतीय है।
पीएम बनने से पहले ही मोदी ने देखा था ये सपना
इसमें कोई शक नहीं कि पिछले 12 वर्षों में देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काफी बदलाव देखने को मिले हैं। देशवासियों के स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिये मोदी सरकार में कई महत्वपूर्ण योजनाएं न सिर्फ शुरु की गईं बल्कि जमीनी स्तर पर उनका व्यापक असर भी देखने को मिला लेकिन ये सफर काफी लंबा रहा है। इस पूरे सफर पर गौर करें तो ये यात्रा उम्मीद, भरोसे और दृढ़ इच्छाशक्ति से भरी हुई दिखती है। डॉ जेएल मीना के ऊपर लिखी गई किताब ‘पीएचसी से एनएमसी तक’ के पन्ने इस बात की तस्दीक करते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से भी पहले शुरु हुआ ये सफर आज भी देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में किस कदर मील के पत्थर स्थापित करते हुए अग्रसर है। ये सफर एक सुनहरे सपने की तरह है जिसमें देशवासियों को बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देना लक्ष्य है और इस सपने को पूरा करने का विजन नरेंद्र मोदी ने काफी पहले ही देख लिया था। इस विजन को साकार करने के लिए हेल्थ सिस्सटम के अनसंग वॉरियर डॉ. जेएल मीना ने नरेंद्र मोदी के गुजरात का सीएम रहते हुये उनकी स्वास्थ्य संबंधी कई योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई।
ऐसा रहा गुजरात में पहली ज्वॉइनिंग का अनुभव
डॉ मीना इस किताब में बताते हैं कि शुरुआती दौर में मेरे पास राजस्थान एवं गुजरात, दोनों जगह पर काम करने का मौका था. मैंने गुजरात जाने का मन बनाया, जहां शुरुआत संघर्ष से हुई। मुझे एक ऐसे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर भेजा गया, जहां से चार डॉक्टर पहले ही सस्पेंड हो चुके थे। उन पर गड़बड़ी करने का आरोप लग चुका था। मैं यहां गांव वालों की मदद से पीएचसी का हुलिया बदलने में जुट गया। जिस पीएचसी पर कोई आना नहीं चाहता था, वह पीएचसी अपने क्वालिटी केयर के लिए जाना जाने लगा। कई अखबारों के फ्रंट पेज पर हमारे पीएचसी की खबर छपी। यहीं से होते-होते ये चर्चा प्रदेश में फैल गई।
स्कूल हेल्थ प्रोग्राम की शुरुआत ने बदल दी तस्वीर
इसी दौरान गुजरात सरकार की तरफ से देश के नौनिहालों की चिंता करते हुए स्कूल हेल्थ प्रोग्राम की शुरुआत की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर बेहद संवेदनशील थे, इसलिए इस योजना को आगे बढ़ाने में कैसे एक नाटकीय मोड़ आया इस बात का भी खुलासा डॉ मीना की किताब में है। स्कूल हेल्थ प्रोग्राम के बारे में बताते हुए डॉ मीना कहते हैं, पीएचसी का मेडिकल ऑफिसर रहते हुये मैंने वहां पर मेडिकल चेकअप स्टार्ट कर दिया। स्कूल हेल्थ प्रोग्राम उस टाइम नया-नया आया था। इसकी शुरुआत के दौरान मां का दिया मंत्र मैं भूला नहीं था। ‘अर्ली डायग्नोसिस बेस्ट फॉर ट्रीटमेंट’ के मंत्र को मैंने हमेशा याद रखा। मैंने सोचा कि अगर स्कूलों में जाकर मैं पहले से ही डायग्नोसिस कर लूं तो मैं बेटर तरीके से उनका ट्रीटमेंट कर सकता हूं। इसलिए सभी स्कूलों में जाकर टीम बनाई, सभी स्कूलों में मैं खुद गया। सभी बच्चों की स्क्रीनिंग भी खुद की। डॉ मीना के मुताबिक जब उन्होंने यह अभियान शुरू किया, तब कम से कम 200 कंजेनिटल हार्ट डिजीज (जन्मजात हृदयरोग) के बच्चे मिले। उसी तरीके से कुछ क्लेफ्ट प्लेट एंड क्लेफ्ट लीप के थे तो कुछ बच्चों की आंखें खराब थीं और किसी को मेजर ट्यूमर जैसा था। उन्होंने 200-250 बच्चों को चिन्हित कर लिया था लेकिन इन बच्चों का जब ट्रीटमेंट करने की बात आई तो एक बड़ा चैलेंज ये था कि उनका मुफ्त उपचार कैसे हो।
बच्चों के इलाज के लिए मोदी ने उठाया बड़ा कदम
दरअसल इन बच्चों का इलाज पीएचसी पर नहीं बल्कि अहमदाबाद में होना था। डॉ मीना जब फर्स्ट टाइम इनमें से 20 बच्चों को लेकर ट्राइबल एरिया लीमडी से अहमदाबाद ले गये। तो वहां का अहमदाबाद कार्डियक इंस्टीट्यूट प्रबंधन अचंभित था। स्कूल हेल्थ प्रोग्राम अभी स्टार्ट ही हुआ था, 20 बच्चों को लाना अपने आप में बड़ा चैलेंज था और सबका फ्री में उपचार करना था। अस्पताल प्रबंधन आनाकानी करने लगा। इसी बीच डॉ मीना को पता चला कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री साहब उसी अस्पताल में किसी को देखने आये हैं। डॉ मीना ने उन्हें पूरे हालात से अवगत कराया, जिसके बाद बात तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंची। सीएम ऑफिस से कॉल आते ही पूरा परिदृश्य बदल गया और सभी बच्चों का उपचार फ्री में हुआ। उसके बाद यह 2000 से 2003 के दौरान डॉ मीना जब तक पीएचसी पर रहे, बच्चों को लेकर आते रहे और उनका उपचार फ्री में हुआ, उस दौरान तकरीबन 250 बच्चों का ऑपरेशन किया गया। मेहनत और लगन के चलते तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के संपर्क में आने के बाद शुरू हुई जेएल मीना की असली यात्रा, जिसने उन्हें पहुंचा दिया, ‘PHC से NMC तक’।
जब स्टेट कमिश्नर ने कराई मोदी से मुलाक़ात
केंद्र सरकार ने आर.सी.एच. (री-प्रोडक्टिव चाइल्ड हेल्थ) प्रोजेक्ट शुरु कर के डिस्ट्रिक्ट क्वालिटी हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर की पोस्ट समाप्त कर दी। ऐसे में डॉ. मीना के सामने धर्म-संकट की स्थिति आ गई। लेकिन DQAMO रहते हुये डॉ. मीना ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो काम किया था उसकी चर्चा चहुंओर होने लगी थी। दाहोद जिले में उन्होंने फिर से एक सबसे खराब हालत वाले पीएचसी का जीर्णोद्धार करना शुरु किया। महज 6 महीने में फर्स्ट पर लेकर आये। इसी बीच उन्हें भारत सरकार को एक प्रेजेंटेशन देने के लिये बुलाया गया। हेल्थ सेक्रेटरी चाहते थे कि डिस्ट्रिक्ट हेल्थ एश्योरेंस ऑफिसर पोस्ट के कारण जो बदलाव आए थे, उसे भारत सरकार को बताया जाए। प्रजेंटेशन के दौरान गुजरात स्टेट कमिश्नर अरमजीत सिंह, डॉ. मीना से काफी प्रभावित हुये और फिर नरेंद्र मोदी के कहने पर उन्हें डिस्ट्रिक्ट से स्टेट में लाया गया।
जब सरकार ने उठाया ऐतिहासिक कदम, 2200 पोस्ट का सृजन
स्वास्थ्य क्वालिटी पर पूरे राज्य के लिए बन रहे क्वालिटी प्रोजेक्ट में डॉ. मीना को जोड़ लिया गया। अब उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि राज्य स्तर पर एक टीम कैसे बनाई जाये। डॉ. मीना ने प्रत्येक जिले में कुछ पोस्ट क्रिएट करने का सुझाव दिया। डॉ. मीना की ये बात मान ली गई। साल 2007 में इस सुझाव पर सबसे पहले डिस्ट्रिक्ट हेल्थ क्वालिटी एश्योरेंस ऑफिसर की रेगुलर पोस्ट सृजित की गई और उसी में स्टेट हेल्थ क्वालिटी एश्योरेंस ऑफिसर की रेगुलर पोस्ट और बाकी के जो पीएचसी, सीएचसी, डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेजों में भी भर्ती निकाली गईं। काफी मंथन के बाद कुल 2200 पोस्ट सृजित की गईं। ये हेल्थ की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव का बीजारोपण था। भारत में ऐसा पहली बार हुआ था।
जब गुजरात में पीएचसी देने लगे प्राइवेट हॉस्पिटल को टक्कर
2007 में स्वास्थ्य क्षेत्र में क्वालिटी को लेकर एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस हुई। इस कॉन्फ्रेंस में डॉ मीना ने कहा कि मेरे अस्पताल एक्रिडेटेड होकर आएंगे। इस पर शुरुआत में किसी को भरोसा नहीं हुआ, कि पब्लिक हॉस्पिटल में एनएबीएच कैसे लेकर आएंगे। कॉन्फ्रेंस लौटने के बाद डॉ मीना ने इस बात को विस्तार से अपने कमिश्नर सर को बताया। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वास्थ्य सेवा को लेकर गंभीरता को देखते हुए फाइल तुरंत अप्रूवल हो गई। यही वजह रही कि गुजरात में पीएचसी भी एनएबीएच के स्टैंडर्ड के बनने लगे। इतना ही नहीं जस समय देश लचर स्वास्थ्य व्यवस्ता से करहा रहा था उसी समय सीएम मोदी के विजन व डॉ मीना का जुनून नए आयाम स्थापित कर रहा था। उस दौरान बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए सिर्फ गुजरात के तकरीबन 25,000 मैन पॉवर को प्रशिक्षित किया।
‘गुजरात इज द रोल मॉडल फॉर क्वालिटी’
अब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और डॉ मीना लगन व काबिलियत के चलते गुजरात में क्वालिटी केयर को लेकर एक कल्चर विकिसित हो चुका था। इसका फायदा सरकारी अस्पतालों को मिला। सात सरकारी अस्पतालों को एनएबीएच (National Accreditation Board for Hospitals & Healthcare Providers) के मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया गया। काफी प्रयासों के बाद इन सात सरकारी अस्पतालों में से दो को सबसे पहले एक्रीडिटेशन मिला। गांधीनगर सिविल हॉस्पिटल भारत का पहला सरकारी हॉस्पिटल था जिसे एनएबीएच का प्रमाण-पत्र मिला और बाद में सिविल हॉस्पिटल सोला, अहमदाबाद, सरकारी अस्पताल को एनएबीएच एक्रीडेशन मिला। गुजरात के स्वास्थ्य मॉडल की चर्चा क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपनी बुक में की, जिसका शीर्षक था- ‘‘गुजरात इज द रोल मॉडल फॉर क्वालिटी”। राष्ट्रीय स्तर से भी दूसरे स्टेट को हेल्थ केयर में बेस्ट प्रैक्टिस के रूप में गुजरात मॉडल को दिखाया-बताया जाने लगा।
जब तत्कालीन सीएम मोदी ने कहा- ‘इतने से काम नहीं चलेगा’
तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य के हेल्थ सिस्टम को लेकर इस कदर संजीदा थे कि स्वासथ्य विभाग को जब कोई अवार्ड मिलता था तो उसकी तारीफ वे ख़ुद करते थे। स्वास्थ्य क्षेत्र में अच्छा काम होने से स्वास्थ्य टीम को अलग-अलग समय पर अवार्ड मिलने शुरू हो चुके थे। सीएम नरेंद्र मोदी खुद इन उपलब्धियों पर नजर रखते थे। इससे काम करने वालों को प्रोत्साहन मिला, उन्हें यह लगने लगा कि अब उनके काम के बारे में सीएम साहब के साथ-साथ सभी मंत्रिपरिषद को पता चलता है। इतना ही नहीं इन्हें मिलने वाले अवार्ड को सीएम ऑफिस में बने अवार्ड गैलरी में लगा दिया जाता था, इससे अवार्ड पाने वालों को और खुशी होती थी। यह सिर्फ हेल्थ केयर का मामला नहीं है, यह एक गुड गवर्नेंस की मिसाल भी था। डॉ मीना कहते हैं कि जब हम कभी कोई अवार्ड लेकर सीएम मोदी के पास जाते तो वे बहुत खुश होते लेकिन घर के अभिभावक के रूप में वे कहते कि इतने से काम नहीं चलेगा और अच्छा काम कीजिए, और अवार्ड चाहिए। नरेंद्र मोदी अच्छे काम को लेकर हमेशा बहुत सपोर्टिव रहे।
गुजरात के बाद देश की स्वास्थ्य गुणवत्ता के लिए मोदी का विजन
आज निश्चित रूप से कई चीजों में बदलाव आया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो सबसे पहले स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, नई स्वास्थ्य नीति, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण का गठन, एनएमसी का गठन, राज्यों में भी एम्स खुलना, योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाना और अब आयुर्वेद के लिए वैश्विक मंच तैयार करने सहित स्वास्थ्य के तमाम मोर्चों पर नरेंद्र मोदी का विजन साफ-साफ दिखता है। डॉ मीना अपनी बुक में बताते हैं कि ‘हम लोगों ने गुजरात में एक चेक लिस्ट बनाई थी कि आखिर में स्वच्छ भारत मिशन कैसे क्रियान्वित हो? इसको लेकर एक पूरी गाइडलाइन पुस्तिका बनी। उसी गाइडलाइन पुस्तिका को रेफरेंस रखते हुए भारत सरकार के स्तर पर भी स्वच्छ भारत मिशन को लेकर एक गाइडलाइन पुस्तिका बनी, जिसमें बताया गया कि अनावश्यक स्क्रैप निकालना, बायोमेडिकल वेस्ट निकालना, इंफेक्शन कंट्रोल प्रैक्टिसेस सहित तमाम बातों को इस पुस्तिका में शामिल किया गया था। इसे स्वच्छता ऑडिट चेक लिस्ट में भी शामिल किया गया। इसलिए वहां का कल्चर और अच्छा होता चला गया।’
जब पीएम मोदी ने बुलाया दिल्ली
2018 में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को क्रियान्वित करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी, जो बाद में प्राधिकरण बना, जब उसका गठन हो रहा था डॉ मीना को इससे जुड़ने के लिये कहा गया। इसके बाद वे दिल्ली आ गए। यहां राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण में उन्होंने ज्वॉइन किया। डॉ मीना बताते हैं, ‘मेरे जिम्मे आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत देश के तमाम अस्पतालों को सूचीबद्ध करने से लेकर इसकी गाइडलाइन बनाने, समझाने से लेकर क्रियान्वित करवाने तक की जिम्मेदारी आ गई। अस्पतालों के पैकेज बनवाने की जिम्मेदारी भी मेरे पास थी। उस दौरान तकरीबन 25 हजार से ज्यादा अस्पतालों को सूचीबद्ध किया गया।’ 2020 की शुरुआत में जब कोविड आया, तब भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) ने बहुत काम किया।
एक साल में खोले गए सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज
डॉ मीना का एनएमसी जाना उनके लिए एक अप्रत्याशित था। एनएमसी जाने से पहले उनके पास एक एसाइनमेंट आया था। एक इंस्पेक्शन के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय में यह चर्चा चल रही थी कि किसे भेजा जाए? मंत्रालय से किसी ने डॉ मीना के नाम का सुझाव दे दिया। उनकी इंस्पेक्शन रिपोर्ट से सभी लोग संतुष्ट हुएृ फिर यहां से एनएमसी के लिए उनके नाम की चर्चा शुरू हो गई थी। फाइनली भारत सरकार का गजट नोटिफिकेशन आया, जिसके तहत डॉ मीना को एनएमसी के सदस्य के रूप में नई जिम्मेदारी मिली। यहां भी धीरे-धीरे डॉ मीना के कार्याों की चर्चा चारों तरफ होने लगी। मोदी सरकार की इच्छा शक्ति का ही नतीजा रहा कि एक साल में सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज इस दौरान खोले गए। यूजी एवं पीजी की सीटों में जो इजाफा हुआ, वह भी एक रिकॉर्ड था।
मोदी सरकार के इस फैसले ने खोले अमेरिका में मेडिकल प्रैक्टिस के द्वार
इतना ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने व विदेश में मेडिकल करियर बनाने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए भी बड़ा काम किया गया। वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन (डब्ल्यूएफएमई) मान्यता के लिए सफल अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और निरीक्षण किया गई। इसके बाद 10 वर्ष के लिए एनएमसी को वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन मान्यता मिली। नए नियमों के अनुसार, 2024 से आगे ईसीएफएमजी (एजुकेशन कमीशन फॉर फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स) प्रमाणीकरण और यूएसएमएलई (यूनाइटेड स्टेट्स मेडिकल लाइसेंसिंग एग्जामिनेशन) के लिए आवेदन करने वालों को डब्ल्यूएफएमई (वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन) द्वारा मान्यता प्राप्त एक एजेंसी द्वारा आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त मेडिकल स्कूल से स्नातक होना आवश्यक है। इस नियम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी मेडिकल स्नातकों को अमेरिका में मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए आवश्यक सर्टिफिकेशन और लाइसेंस प्राप्त करने के लिए एक मानकीकृत और मान्यता प्राप्त मेडिकल एजुकेशन मिले। एनएमसी को डब्ल्यूएफएमई द्वारा मान्यता प्राप्त करने के परिणामस्वरूप, एनएमसी द्वारा मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों से सभी मेडिकल छात्र ईसीएफएमजी प्रमाणीकरण और यूएसएमएलई के लिए आवेदन करने के लिए पात्र हो जाएंगे। यह निर्णय भारतीय मेडिकल छात्रों के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जो अमेरिका में मेडिकल प्रैक्टिस करना चाहते हैं।