‘श्रमेव जयते’ क्यों है स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सुधार?

स्वतंत्रता के बाद दशकों तक राष्ट्र निर्माण के असली आधार श्रमिक उनकी भूमिका के अनुरूप सम्मान और सुरक्षा पाने से वंचित रहे। लगभग सत्तर वर्षों तक देश के 50 करोड़ से अधिक श्रमिक संगठित और असंगठित क्षेत्रों में योगदान करते रहे लेकिन वास्तविकता यह थी कि इनमें से 90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित ढांचे में फंसे रहे, जहां न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन, मातृत्व लाभ और कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं भी अधिकांश के लिए उपलब्ध नहीं थीं। यह विडंबना रही कि उद्योग, अवसंरचना, परिवहन, निर्माण, खनन और कृषि की रीढ़ समझे जाने वाले श्रमिक आर्थिक प्रगति की कहानी में तो शामिल थे लेकिन अधिकारों और सम्मान की कहानी में नहीं।

2014 में इस मूल समस्या को मोदी सरकार ने सुधारने का निर्णय लिया और श्रम सुधारों को भारत के समग्र विकास और आत्मनिर्भरता अभियान का आधार बना दिया। आज स्थितियां बदल चुकी हैं। पहली बार किसी सरकार ने दोनों वर्गों संगठित और असंगठित श्रमिकों को समान महत्त्व, सुरक्षा और अधिकार प्रदान करने की दिशा में व्यवस्थित और क्रांतिकारी कदम उठाया है। यह कदम महज प्रशासनिक सुधार नहीं है बल्कि स्वतंत्र भारत की आर्थिक संरचना में श्रमिकों की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का सिद्धांत है। इसीलिए इस सुधार को सिर्फ नीतिगत परिवर्तन नहीं बल्कि श्रमिकों के लिए आजादी के बाद सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है।

2014 में पहली बार दिखी इच्छाशक्ति

वर्ष 2002 में द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि देश में फैले दर्जनों जटिल श्रम कानून श्रमिकों के हित सुरक्षित रखने के बजाय उलझन, भ्रष्टाचार और असमानता पैदा कर रहे हैं। आयोग ने सुझाव दिया था कि सभी कानूनों को समाहित करके चार या पांच कोड बनाए जाएं लेकिन यह प्रस्ताव 18 वर्षों तक फाइलों और चर्चाओं तक सीमित रहा। सुधारों की जरूरत और स्वीकार्यता तो सब मानते थे लेकिन इच्छाशक्ति की कमी के चलते निर्णायक समाधान नहीं हो पा रहा था।

2014 में मोदी सरकार आते ही यह योजना पहली बार निर्णायक नीति में परिवर्तित हुई। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के दर्शन के साथ सरकार ने श्रमिकों को आर्थिक व्यवस्था के केंद्र में रखते हुए राजनीतिक इच्छाशक्ति के विस्तार के रूप में श्रम सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 2015 से 2019 के बीच गहन त्रिपक्षीय विमर्श, ट्रेड यूनियनों, नियोक्ता संगठनों, उद्योग निकायों और राज्य सरकारों की भागीदारी के साथ सुधारों का खाका तैयार किया। प्रक्रिया में न तो जल्दबाजी की गई न एकतरफा निर्णय लिए गए बल्कि पहली बार श्रमिक केंद्रित आर्थिक संरचना के निर्माण के लिए राष्ट्रव्यापी सहमति पर ध्यान दिया गया।

श्रमिकों को राष्ट्रनिर्माता के रूप में देखने का दृष्टिकोण

अक्टूबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘श्रमेव जयते’ का आह्वान कर स्पषट संदेश दिया कि श्रमिकों का कल्याण दया या अनुग्रह नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। श्रमिकों को ‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा देकर मोदी सरकार ने सम्मान, सहूलियत और सुरक्षा को श्रम नीति का आधार बनाया। श्रमिकों को यूनिवर्सल अकाउंट नंबर के माध्यम से पोर्टबिलिटी देने से लेकर ‘इंस्पेक्टर राज’ की समाप्ति, डिजिटल पारदर्शिता और औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए जिम्मेदारियों की रीस्ट्रक्चरिंग यह सब इस सिद्धांत पर आधारित है कि श्रमिक जितना सम्मानित होगा, भारत उतना सशक्त होगा। यही विचार अंततः उस ऐतिहासिक निर्णय में परिणत हुआ, जिसने भारत के श्रम ढांचे को पूरी तरह नया स्वरूप दिया। 29 पुराने, जटिल और परस्पर विरोधी श्रम कानूनों को समाप्त करके चार व्यापक और आधुनिक श्रम कोड लागू किए गए।

कानूनों के जाल से मुक्ति के मायने?

नए श्रम कोडों का उद्देश्य सिर्फ कानून सरल करना नहीं बल्कि श्रमिकों को संगठित, असंगठित, प्रवासी, फिक्स्ड टर्म, कॉन्ट्रैक्ट, अप्लाइड प्लेटफॉर्म, गिग वर्कर्स, कृषि और औद्योगिक संकीर्ण सीमाओं से मुक्त करना है। पहली बार देश के सभी श्रमिक एक ही व्यवस्था के अंतर्गत समान अधिकार प्राप्त करेंगे। न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य रक्षा, कार्यस्थल सुरक्षा और औद्योगिक संबंध जैसे मुद्दे अब अलग-अलग कानूनों के अधीन संघर्ष का विषय नहीं बल्कि एकीकृत राष्ट्रीय श्रम ढांचे का हिस्सा हैं। न्यूनतम वेतन का अधिकार पहली बार सार्वभौमिक बनाया गया, जिससे असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ से अधिक श्रमिक उस अधिकार से जुड़े जो दशकों तक उनसे छिन रहा था। समय पर वेतन, समान वेतन, क्षेत्रीय असमानता को समाप्त करने के लिए फ्लोर वेज और मजदूरी निर्धारण का स्पष्ट मानक इन सबने श्रमिक अधिकारों को व्यावहारिक और लागू करने योग्य बनाया।
सामाजिक सुरक्षा कोड ने श्रमिकों को बीमा, पेंशन, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ और चिकित्सा व्यवस्था को स्थायी अधिकार में बदल दिया। वह श्रमिक जो उम्र के बाद गरीबी में धकेल दिए जाते थे अब सम्मान के साथ पेंशन और सुरक्षा प्रणाली से जुड़े रहेंगे।

ओएसएच कोड ने कार्यस्थल की सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को पहली बार कानूनी विवशता में बदला है। प्रवासी श्रमिकों की उपेक्षा समाप्त करते हुए राष्ट्रीय डेटाबेस, यात्रा भत्ता, वन नेशन वन राशन कार्ड, नियुक्ति पत्र, एनुअल हेल्थ चेकअप और शहर से गांव तक सुविधा की निरंतरता सुनिश्चित की गई। महिलाओं को सभी शिफ्टों में काम करने का अधिकार और सुरक्षा की जिम्मेदारी ने कार्यस्थल को एक समान अवसर वाला क्षेत्र बनाया।
आईआर कोड ने औद्योगिक विवादों को अंतहीन संघर्ष के बजाय समाधान आधारित व्यवस्था में परिवर्तित किया। संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए रोजगार खोने पर आर्थिक सुरक्षा, रिस्किलिंग सहायता, तेजी से न्याय और जिम्मेदार यूनियन व्यवस्था ने उद्योग को भी स्थिरता और श्रमिकों को सम्मानजनक सुरक्षा प्रदान की।

सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम

इन सुधारों का महत्व केवल कानून बदलने में नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही असमानता को समाप्त करने में है। भारत की प्रगति में श्रमिकों की भूमिका पर कोई विवाद नहीं है लेकिन अधिकारों की संरचना हमेशा असमान रही। नए श्रम कोड इस ऐतिहासिक विसंगति का समाधान हैं और यह सिद्धांत स्थापित करते हैं कि राष्ट्र की वृद्धि तभी सार्थक है, जब देश के श्रमिक उसके केंद्र में हों। यह सुधार न केवल श्रमिकों के जीवन स्तर को सुरक्षित करता है बल्कि भारत की आर्थिक क्षमता को भी मजबूत करता है। श्रमिकों की सुरक्षा और उद्योगों की स्पष्ट नीतियां निश्चित तौर पर रोजगार सृजन, श्रम उत्पादकता और निवेश बढ़ाती हैं।

इस सुधार का वास्तविक अर्थ ?

यदि स्वतंत्र भारत की आर्थिक यात्रा का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि मजदूर सबसे अधिक परिश्रम करने वाला वर्ग है लेकिन सबसे कम सुरक्षित रहा। यह सुधार उसी ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करता है। सत्यमेव जयते से श्रमेव जयते की यह यात्रा बताती है कि भारत आज उस मुकाम पर है जहां श्रमिक सिर्फ श्रम करने वाले नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की धुरी के रूप में पहचाने जाते हैं।

इस सुधार का वास्तविक अर्थ यही है कि देश का विकास श्रमिकों के विकास के बिना संभव नहीं और अब स्वतंत्र भारत पहली बार इस सत्य को नीतिगत रूप से स्वीकार कर चुका है। यही कारण है कि यह सुधार सिर्फ श्रम कानूनों का बदलाव नहीं, राष्ट्र के आर्थिक और नैतिक ढांचे की पुनर्संरचना है और इस मायने में यह स्वतंत्र भारत का अब तक का सबसे बड़ा सुधार है।

-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)

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