विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस : बुजुर्गों की झुर्रियों में बसता अनुभव, संघर्ष और मानवता का संदेश

किसी भी सभ्यता की परिपक्वता का आकलन केवल उसके आर्थिक विकास, वैज्ञानिक उपलब्धियों या तकनीकी प्रगति से नहीं किया जाता, बल्कि इस बात से किया जाता है कि वह अपने सबसे अनुभवी, निर्बल और आश्रित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। वृद्धजन किसी भी समाज की जीवित स्मृति, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक चेतना के संवाहक होते हैं। उनके अनुभवों में इतिहास की गहराई, संघर्षों की सीख और जीवन-दर्शन की परिपक्वता निहित होती है। वे केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच ज्ञान और मूल्यों के सेतु होते हैं।

विडंबना यह है कि जिन हाथों ने परिवारों को संवारने, बच्चों का भविष्य गढ़ने और समाज की नींव मजबूत करने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया, वही हाथ जीवन की संध्या बेला में अनेक बार उपेक्षा, तिरस्कार, आर्थिक शोषण और मानसिक प्रताड़ना का सामना करने को विवश हो जाते हैं। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता व्यक्तिवाद, संयुक्त परिवारों का विघटन और सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

इसी वैश्विक चुनौती की ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिवर्ष 15 जून को विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस (World Elder Abuse Awareness Day) मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता के अंतःकरण को झकझोरने वाला अवसर है। इसका उद्देश्य वृद्धजनों के विरुद्ध होने वाली हिंसा, उपेक्षा, आर्थिक शोषण और भावनात्मक उत्पीड़न के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके सम्मान, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। आज जब विश्व तेजी से वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहा है, तब वृद्धजनों के अधिकारों की रक्षा केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व और मानवीय उत्तरदायित्व भी बन गई है।

विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस : इतिहास और वैश्विक पृष्ठभूमि

विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी। इसका मूल उद्देश्य यह संदेश देना था कि वृद्धों के साथ होने वाला दुर्व्यवहार कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक मामला मात्र नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मानवाधिकार संबंधी समस्या है। वर्ष 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून को आधिकारिक रूप से विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की। इसके बाद से यह दिवस वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से मनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा नागरिक समाज संगठनों ने वृद्ध अधिकारों को मानवाधिकारों के व्यापक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह दिवस विश्व समुदाय को यह स्मरण कराता है कि वृद्धावस्था किसी व्यक्ति की उपयोगिता का अंत नहीं, बल्कि उसके जीवनानुभव की पराकाष्ठा है। इसलिए वृद्धजनों को सम्मान, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराना प्रत्येक सभ्य समाज का कर्तव्य है।

वृद्धावस्था : अनुभव का स्वर्णिम अध्याय

मानव जीवन को यदि ऋतुओं के रूपक में समझा जाए तो बाल्यावस्था वसंत है, युवावस्था ग्रीष्म है, प्रौढ़ावस्था शरद है और वृद्धावस्था जीवन की वह शांत गोधूलि है जिसमें अनुभवों का सूर्य अपनी स्वर्णिम आभा बिखेरता है। वृद्ध व्यक्ति वह पुस्तक है जिसके प्रत्येक पृष्ठ पर जीवन के संघर्ष, सफलताएं, असफलताएं, त्याग और धैर्य की कहानियां अंकित होती हैं। उनके सफेद बाल केवल आयु का संकेत नहीं, बल्कि अनुभव के चांदी जैसे मुकुट हैं। उनके चेहरे की झुर्रियां समय की मार नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा के मानचित्र हैं।

भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को सदैव सम्मान का स्थान प्राप्त रहा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है-“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥” अर्थात जो व्यक्ति बड़ों का सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। इस दृष्टि से वृद्धजनों का सम्मान केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्य भी है।

वृद्ध दुर्व्यवहार की अवधारणा और स्वरूप

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी विश्वासपूर्ण संबंध में किया गया ऐसा कार्य या उपेक्षा, जिससे वृद्ध व्यक्ति को हानि, पीड़ा अथवा कष्ट पहुंचे, वृद्ध दुर्व्यवहार कहलाता है। यह दुर्व्यवहार केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके अनेक रूप हैं जो अक्सर दिखाई भी नहीं देते। शारीरिक हिंसा: मारपीट करना, धक्का देना, चोट पहुंचाना, भोजन या दवाओं से वंचित रखना अथवा किसी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना देना।

मानसिक एवं भावनात्मक उत्पीड़न: अपमान करना, तिरस्कार करना, डराना, धमकाना, निर्णय प्रक्रिया से अलग रखना या निरंतर मानसिक दबाव बनाना। आर्थिक शोषण: वृद्ध व्यक्ति की संपत्ति, पेंशन, बैंक खाते या आर्थिक संसाधनों का उसकी इच्छा के विरुद्ध उपयोग करना। उपेक्षा: आवश्यक भोजन, दवा, स्वास्थ्य सेवाएं या भावनात्मक सहयोग न देना। यौन शोषण: वृद्ध व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध किसी भी प्रकार का यौन व्यवहार। डिजिटल एवं साइबर शोषण: ऑनलाइन धोखाधड़ी, बैंकिंग फ्रॉड, पहचान की चोरी और साइबर अपराधों के माध्यम से आर्थिक हानि पहुंचाना। इनमें से सबसे अधिक पीड़ादायक अक्सर वह दुर्व्यवहार होता है जो दिखाई नहीं देता,अर्थात उपेक्षा, अकेलापन और भावनात्मक तिरस्कार।

वैश्विक परिदृश्य : बढ़ती वृद्ध आबादी और नई चुनौतियां

विश्व तेजी से वृद्ध समाज की ओर अग्रसर है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, पोषण स्तर में वृद्धि और चिकित्सा प्रौद्योगिकी के विकास के कारण जीवन प्रत्याशा लगातार बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 2 अरब तक पहुंच सकती है। यह परिवर्तन अवसर भी है और चुनौती भी। एक ओर अनुभवी जनशक्ति और सामाजिक ज्ञान का विशाल भंडार उपलब्ध होगा, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल की मांग भी बढ़ेगी।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि विश्वभर में लगभग प्रत्येक छह वृद्ध व्यक्तियों में से एक किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का शिकार होता है। वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि अधिकांश मामले सामाजिक भय, पारिवारिक दबाव या निर्भरता के कारण सामने ही नहीं आते। कोविड-19 महामारी के दौरान सामाजिक अलगाव, आर्थिक संकट और स्वास्थ्य संबंधी असुरक्षाओं ने वृद्धजनों की समस्याओं को और अधिक गंभीर बना दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि वृद्धजनों की सुरक्षा और सम्मान के लिए केवल परिवार नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

भारत में वृद्धजनों की स्थिति : परंपरा और परिवर्तन के बीच

भारत परंपरागत रूप से बुजुर्गों के सम्मान की संस्कृति वाला देश रहा है। यहां माता-पिता और गुरु को देवतुल्य माना गया है। पर बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने वृद्धजनों के जीवन को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, रोजगार के लिए प्रवासन, एकल परिवारों का विस्तार तथा उपभोक्तावादी जीवन शैली ने पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं को प्रभावित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धजन स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और आर्थिक निर्भरता से जूझ रहे हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में अकेलापन, सामाजिक अलगाव और मानसिक तनाव बड़ी समस्याएं बनकर उभरे हैं। आज अनेक वृद्ध अपने ही घरों में स्वयं को अनावश्यक और उपेक्षित महसूस करते हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि भावनात्मक संकट का भी संकेत है।

वृद्ध दुर्व्यवहार के प्रमुख कारण

वृद्ध दुर्व्यवहार किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। इसके पीछे अनेक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारक कार्य करते हैं। पारिवारिक संरचना में परिवर्तन: संयुक्त परिवारों के विघटन ने वृद्धों के सामाजिक संरक्षण को कमजोर किया है। आर्थिक निर्भरता: जो वृद्ध आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होते हैं, उनके शोषण की संभावना अधिक होती है। संपत्ति और उत्तराधिकार विवाद: भूमि, मकान और संपत्ति संबंधी विवाद अनेक बार पारिवारिक तनाव और उत्पीड़न का कारण बनते हैं। पीढ़ीगत अंतराल: विचारों, जीवनशैली और तकनीकी समझ में अंतर संवादहीनता को जन्म देता है। भौतिकवादी दृष्टिकोण: जब रिश्तों का मूल्य उपयोगिता और लाभ से तय होने लगता है, तब वृद्धों को बोझ समझे जाने का खतरा बढ़ जाता है। सामाजिक अलगाव: अकेलापन वृद्धजनों को मानसिक रूप से कमजोर बना देता है और वे शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

वृद्ध दुर्व्यवहार के सामाजिक, मानसिक और स्वास्थ्यगत प्रभाव

वृद्ध दुर्व्यवहार का प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करता है। मानसिक प्रभाव: निरंतर अपमान और उपेक्षा अवसाद, चिंता, तनाव और मानसिक आघात को जन्म देती है। आत्मसम्मान में गिरावट: जब व्यक्ति स्वयं को परिवार और समाज के लिए अप्रासंगिक समझने लगता है, तब उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: तनाव और मानसिक दबाव उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। सामाजिक निष्क्रियता: दुर्व्यवहार का शिकार व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों से दूर होने लगता है। गंभीर परिणाम: कुछ परिस्थितियों में आत्महत्या, बेघरपन और सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।

वृद्ध महिलाएं : दोहरी संवेदनशीलता की चुनौती

वृद्ध महिलाओं की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। वे आयु और लिंग दोनों आधारों पर भेदभाव का सामना करती हैं। विधवा महिलाओं को अक्सर संपत्ति अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। कई बार उन्हें परिवार के निर्णयों से अलग कर दिया जाता है और आर्थिक संसाधनों पर उनका नियंत्रण समाप्त हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक रूढ़ियां उनकी समस्याओं को और बढ़ा देती हैं। इसलिए वृद्ध महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए विशेष नीतिगत उपायों की आवश्यकता है।

डिजिटल युग और वृद्धजन : नए खतरे, नई जिम्मेदारियां

डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन इसके साथ नए प्रकार के जोखिम भी सामने आए हैं। वृद्धजन अक्सर साइबर अपराधियों के आसान लक्ष्य बन जाते हैं। फर्जी निवेश योजनाएं, बैंकिंग धोखाधड़ी, केवाईसी अपडेट के नाम पर ठगी, ओटीपी फ्रॉड, पहचान की चोरी, सोशल मीडिया आधारित धोखाधड़ी, डिजिटल साक्षरता आज केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि वृद्ध सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है।

कानूनी और नीतिगत प्रयास

भारत में वृद्धजनों की सुरक्षा के लिए अनेक कानूनी और नीतिगत प्रावधान किए गए हैं। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 इस कानून के अंतर्गत संतान को माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मुख्य प्रावधान: भरण-पोषण का अधिकार, न्यायाधिकरणों की स्थापना, उपेक्षित वृद्धों के लिए कानूनी सहायता, संपत्ति हस्तांतरण से संबंधित सुरक्षा, राष्ट्रीय वृद्धजन नीति: इसका उद्देश्य वृद्धजनों के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी हितों की रक्षा करना है। हेल्पलाइन और सहायता सेवाएं: देश के विभिन्न राज्यों में वरिष्ठ नागरिक सहायता केंद्र और हेल्पलाइन सेवाएं संचालित की जा रही हैं।

सरकार, समाज और संस्थाओं की भूमिका

वृद्ध दुर्व्यवहार की समस्या का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। सरकार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाओं और जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार। गैर-सरकारी संगठन: कानूनी सहायता, परामर्श सेवाएं, हेल्पलाइन और सामुदायिक समर्थन। सामुदायिक संस्थाएं: स्थानीय स्तर पर सहयोग, सहभागिता और सामाजिक सुरक्षा का वातावरण। शैक्षणिक संस्थान: युवाओं में संवेदनशीलता और अंतर पीढ़ी संवाद को बढ़ावा देना।

परिवार : समाधान की पहली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई

वृद्धजनों की सुरक्षा और सम्मान का सबसे प्रभावी माध्यम परिवार है। परिवारों को चाहिए कि वे बुजुर्गों को सम्मानजनक वातावरण प्रदान करें। उनकी भावनाओं और आवश्यकताओं को समझें। निर्णय प्रक्रिया में उन्हें शामिल करें। नियमित संवाद बनाए रखें। उनके अनुभवों का सम्मान करें।जब परिवार में सम्मान और संवाद का वातावरण होता है, तब वृद्धावस्था बोझ नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बन जाती है।

सफल पहलें और प्रेरक उदाहरण

विश्व के अनेक देशों ने आयु-अनुकूल समाज की अवधारणा को सफलतापूर्वक विकसित किया है। सामुदायिक देखभाल मॉडल, वरिष्ठ नागरिक क्लब,डे-केयर केंद्र,टेलीमेडिसिन सेवाएं, आपातकालीन सहायता प्रणालियां, सक्रिय वृद्धावस्था कार्यक्रम। ये पहलें यह सिद्ध करती हैं कि यदि समाज इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता के साथ कार्य करे तो वृद्धावस्था को सुरक्षित, सम्मानजनक और सक्रिय बनाया जा सकता है।

भविष्य की चुनौतियां और आगे की राह

वर्ष 2050 तक भारत और विश्व दोनों में वृद्ध आबादी उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाएगी। ऐसे में निम्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा। सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएं, जराचिकित्सा (Geriatric Care) का विकास, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, आयु-अनुकूल शहरों का निर्माण, अंतरपीढ़ी संवाद को प्रोत्साहन, वृद्ध अधिकारों के प्रति सामाजिक जागरूकता। भविष्य का सफल समाज वही होगा जो अपने वृद्ध नागरिकों को विकास प्रक्रिया के केंद्र में स्थान देगा।

ढलती सांझ को सम्मान का प्रकाश

वृद्धजन किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति, नैतिक चेतना और जीवनानुभव के अमूल्य भंडार होते हैं। वे केवल अतीत की कहानियां नहीं, बल्कि भविष्य के लिए दिशा-सूचक दीपक हैं। जिस समाज में वृद्धों का सम्मान होता है, वहां संवेदनशीलता, करुणा और मानवीयता जीवित रहती है। विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि वृद्ध दुर्व्यवहार केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मानवाधिकार संबंधी प्रश्न है। इसके समाधान के लिए सरकार, समाज, परिवार और प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी।

जीवन की ढलती सांझ को अंधकार नहीं, बल्कि सम्मान और स्नेह के दीपों से आलोकित किया जाना चाहिए। यदि उगते सूरज को प्रणाम करना हमारी संस्कृति है, तो डूबते सूर्य की गरिमा को नमन करना भी हमारा कर्तव्य है। बुजुर्ग कोई ढहती हुई इमारत नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की वह नींव हैं जिस पर वर्तमान और भविष्य की पूरी संरचना खड़ी है।

आइए, इस विश्व वृद्ध दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस पर हम यह संकल्प लें कि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र में प्रत्येक वृद्धजन को सम्मान, सुरक्षा, आत्मीयता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर प्रदान करेंगे। क्योंकि वृद्धों का सम्मान केवल उनका अधिकार नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और मानवता की सबसे बड़ी पहचान है। यह आलेख पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता समरेंद्र कुमार झा से हुई विस्तृत बातचीत, उनके दशकों के विधिक अनुभव तथा ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’, भारतीय संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों, विधिक शोध एवं उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के गहन अध्ययन और विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।