विश्व भूगर्भ जल दिवस: पानी को संसाधन नहीं, विरासत माने और इसका उपयोग जिम्मेदारी की तरह करें

जरा कल्पना कीजिए कि एक ऐसी सुबह हो, जब आप नल खोलें और उसमें से पानी की एक बूंद भी न निकले और फिर आपको पता चले कि छत पर लगी टंकी में नहीं, आपके बोरवेल में ही पानी खत्म हो गया है। यह दिन उस वास्तविकता की आहट है जिसकी तरफ हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। धरती के गर्भ में सदियों से संचित वह अमूल्य जल, जिसने मानव सभ्यता को जीवन दिया, आज हमारे अनियंत्रित दोहन और लापरवाह विकास की कीमत चुका रहा है। यही कारण है कि हर वर्ष 10 जून को विश्व भूगर्भ जल दिवस मनाकर लोगों को इस अदृश्य संसाधन के महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाता है।

भूभर्ग जल जीवन का आधार

भूगर्भ जल केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। करोड़ों लोगों के लिए पीने योग्य जल का मुख्य स्रोत यही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई का बड़ा हिस्सा भी भूगर्भ जल पर निर्भर है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस संसाधन पर हमारा वर्तमान टिका है, उसके भविष्य को लेकर हम सबसे अधिक असंवेदनशील दिखाई देते हैं। अनियोजित औद्योगीकरण, बढ़ता प्रदूषण, अंधाधुंध शहरीकरण, नदियों के जलस्तर में गिरावट, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन ने भूगर्भ जल के भंडार को तेजी से घटाया है।

बोतलबंद और पैकेटबंद पानी आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक

आज के समय में बोतलबंद और पैकेटबंद पानी आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक हैं। यह केवल बाजार का विस्तार नहीं, बल्कि हमारे जल संसाधनों के प्रति बढ़ती लापरवाही का भी संकेत है। ध्यान देने वाली बात यह है कि हम अपनी मूलभूत आवश्यकता को धीरे-धीरे बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर रहे हैं।

दिख रहे हैं जल संकट के दुष्परिणाम

जल संकट के दुष्परिणाम हमारे आसपास अब दिखाई देने लगे हैं। जल बंटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच विवाद बढ़ रहे हैं। कई पड़ोसी देशों के संबंधों में भी पानी एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए हो सकता है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल सरकारी योजनाएं और औपचारिक आयोजन इस संकट का समाधान कर पाएंगे? शायद नहीं। आवश्यकता है कि जल संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए। वर्षा जल संचयन को अपनाना, पानी के अनावश्यक उपयोग को रोकना, पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना और स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन की पहल करना समय की मांग है।

हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की कला जानते थे

भारत के गांवों और कस्बों में कभी तालाब, कुएं, बावड़ियां और जोहड़ केवल जल स्रोत नहीं थे, बल्कि सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की कला जानते थे। आज यह जरूरी है कि आधुनिक तकनीक के साथ-साथ जल संरक्षण के इस पारंपरिक ज्ञान को भी पुनर्जीवित किया जाए।

धरती हर व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, लेकिन किसी एक के भी लोभ की नहीं

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि धरती हर व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, लेकिन किसी एक के भी लोभ की नहीं। यह कथन आज अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यदि हम अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करते रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट और गहरा होगा।

10 जून संकल्प लेने का दिन

दरअसल, विश्व भूगर्भ जल दिवस कैलेंडर की तारीख से कहीं बढ़कर आत्ममंथन का अवसर है कि हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें। यह संकल्प लेने का दिन है कि हम पानी को संसाधन नहीं, विरासत मानेंगे और इसका उपयोग जिम्मेदारी की तरह करेंगे, क्योंकि जब धरती के गर्भ में जल की अंतिम बूंद समाप्त हो जाएगी, तब हमारे पास पछताने के अलावा और कुछ नहीं होगा। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जागें, समझें और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य धरोहर को बचाने में अपना योगदान दें। (इनपुट-आईएएनएस)

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