UPSC के 100 साल: 1926 में शुरू हुआ सफर, संवैधानिक संस्था के रूप में बनी देश की प्रमुख भर्ती एजेंसी

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) 1 अक्टूबर 2026 को अपने 100 साल पूरे करेगा। आयोग की शुरुआत 1 अक्टूबर 1926 को भारत के पहले लोक सेवा आयोग के रूप में हुई थी। एक सलाहकारी संस्था से शुरू हुआ इसका सफर आगे चलकर एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में विकसित हुआ, जो आज केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं में भर्ती के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

लोक सेवा में नियुक्ति का आधार योग्यता बनाने की दिशा में औपचारिक कदम 1855 में उठाया गया, जब भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा शुरू हुई। उस समय परीक्षा लंदन में होती थी और अंग्रेजी के साथ ग्रीक तथा लैटिन जैसे विषयों पर जोर दिया जाता था। 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर परीक्षा पास करने वाले पहले भारतीय बने और 1864 में सेवा में शामिल हुए।

भारतीयों की लगातार मांग के बाद बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया गया। 1922 में पहली बार ICS परीक्षा भारत में इलाहाबाद में आयोजित की गई। 1924 में ली आयोग ने वैधानिक लोक सेवा आयोग की तत्काल स्थापना की सिफारिश की। इसके बाद 1926 में लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई और सर रॉस बार्कर इसके पहले अध्यक्ष बने। आयोग का कार्यालय दिल्ली के मेटकाफ हाउस में था।

स्वतंत्र भारत में आयोग को संवैधानिक आधार मिला। 22 अगस्त 1949 को डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से जुड़े प्रावधान पेश किए, जिन्हें संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 के रूप में शामिल किया गया। इन प्रावधानों में आयोग की नियुक्ति, सदस्यों की सुरक्षा, कार्यों और वित्तीय स्वतंत्रता से जुड़े नियम शामिल हैं।

संविधान के अनुच्छेद 320 के तहत UPSC संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है। इसके अलावा आयोग भर्ती के तरीकों, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में सरकार को सलाह देता है। सिविल सेवा परीक्षा, भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, संयुक्त चिकित्सा सेवा, NDA एवं नौसेना अकादमी, CDS और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सहायक कमांडेंट जैसी परीक्षाएं भी आयोग आयोजित करता है।

समय के साथ UPSC की कार्यप्रणाली में कई बदलाव हुए। 1950 में संघीय लोक सेवा आयोग का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग किया गया। 1979 में तीन चरणों वाली सिविल सेवा परीक्षा—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार—शुरू हुई। 1993 में मुख्य परीक्षा में निबंध पत्र जोड़ा गया और 2000 में ऑनलाइन भर्ती आवेदन प्रणाली की शुरुआत हुई।

2011 के बाद आयोग ने डिजिटल और तकनीकी सुधारों पर भी जोर दिया। सिविल सेवा अभिरुचि परीक्षा (CSAT) शुरू की गई। 2013 में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में बदलाव किए गए और कंप्यूटर आधारित भर्ती परीक्षाओं की शुरुआत हुई। 2015 में CSAT को 33 प्रतिशत अंकों के साथ केवल क्वालिफाइंग पेपर बनाया गया।

UPSC के काम का पैमाना भी पिछले दशकों में काफी बढ़ा है। आयोग के अनुसार, विभिन्न परीक्षाओं और चयन आधारित भर्तियों के लिए प्राप्त आवेदन 1950-51 में 42,727 से बढ़कर 2022-23 में 45,10,044 हो गए। 2022-23 में आयोग ने 15 परीक्षाएं आयोजित कीं और चयन आधारित भर्ती के लिए 4,411 पदों से जुड़े 233 मांगपत्र प्राप्त किए।

समावेशन के स्तर पर भी आयोग में बदलाव आया है। 1952 में सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या केवल 3 थी, जबकि 2025 में 958 अनुशंसित उम्मीदवारों में 299 महिलाएं थीं। 2025 में महिलाओं ने शीर्ष 25 रैंक में 11 स्थान हासिल किए। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दिव्यांग उम्मीदवारों की भागीदारी में भी समय के साथ वृद्धि हुई है।

आयोग ने परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया है। 2025 में चुनिंदा केंद्रों पर NDA और CDS परीक्षाओं के दौरान AI आधारित चेहरे की पहचान से उम्मीदवारों का सत्यापन शुरू किया गया। 24 मई 2026 को सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में करीब 5.50 लाख उम्मीदवारों के लिए यह प्रक्रिया बड़े स्तर पर लागू की गई। आयोग ने 15 वर्षों के उम्मीदवार डेटा की जांच के बाद अतिरिक्त प्रयास का गलत दावा करने वाले 569 आवेदकों को भी खारिज किया।

2025 और 2026 में UPSC ने कई नई डिजिटल सुविधाएं भी शुरू की हैं। मई 2025 में नया यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर शुरू किया गया। 2025 में साक्षात्कार बोर्ड के लिए यादृच्छिक चयन व्यवस्था लागू की गई। फरवरी 2026 से उम्मीदवारों के लिए 30-चैनल हेल्पडेस्क शुरू किया गया। 2026 में नए परीक्षा केंद्र जोड़े गए और सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा की अनंतिम उत्तर कुंजी जल्द प्रकाशित करने की व्यवस्था भी की गई।

UPSC के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार 15 मई 2025 से पद पर हैं। आयोग में आठ सदस्य हैं, जिनमें तीन महिलाएं हैं। 100 साल पूरे होने के मौके पर आयोग ने अपनी यात्रा को योग्यता, निष्पक्षता और अवसर की समान पहुंच से जोड़ते हुए कहा है कि आज उसकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक सेवा में जाने का अवसर हर योग्य भारतीय तक पहुंचे।

-(इनपुटः PIB)

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