पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा तो क्रूड ऑयल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है: रिपोर्ट

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर पूर्ण संघर्ष में बदल गया तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। नॉर्वे की प्रमुख ऊर्जा रिसर्च फर्म रयस्टैड एनर्जी की नई रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि ऐसी स्थिति में क्रूड ऑयल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।

1 करोड़ 18 लाख बैरल तेल उत्पादन बंद 

रिपोर्ट के अनुसार, हालिया तनाव ने अप्रैल में हुए युद्धविराम को सबसे कठिन स्थिति में पहुंचा दिया है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख उत्पादक देशों में प्रतिदिन 1 करोड़ 18 लाख बैरल तेल उत्पादन अभी भी बंद पड़ा है, जो आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधाओं में से एक है।

रयस्टैड एनर्जी का आकलन

रयस्टैड एनर्जी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और भू-राजनीतिक विश्लेषक जॉर्ज लियोन ने कहा, “अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा तनाव पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ रहा है या इसे अभी भी नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इस अनिश्चितता का असर तेल बाजार पर साफ दिख रहा है।”

उन्होंने बताया कि ब्रेंट क्रूड का भाव हाल में 94.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, हालांकि बाद में यह थोड़ा घटकर करीब 93 डॉलर पर आ गया। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 2% से अधिक की तेजी के साथ 95 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा था।

राहत के कुछ साधन भी मौजूद

रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बातें भी बताई गई हैं जो तत्काल संकट को कम कर सकती हैं:

– रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से रिकॉर्ड मात्रा में तेल जारी करना
– चीन का कम आयात
– सऊदी अरब का यनबू निर्यात मार्ग (होर्मुज जलडमरूमध्य को दरकिनार करने वाला)

कूटनीति पर टिकी है उम्मीद

जॉर्ज लियोन ने कहा कि आने वाले कुछ दिन बेहद अहम होने वाले हैं। इन्हीं दिनों में तय होगा कि कूटनीतिक प्रयास कामयाब होते हैं या स्थिति और बिगड़ती है। रिपोर्ट में कूटनीतिक समझौते की संभावना पहले से काफी कम बताई गई है।

पिछले तीन महीनों में पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार से कुल 100 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जो अमेरिका के पूरे रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से ढाई गुना ज्यादा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक युद्धविराम स्थिर होने या कूटनीतिक प्रगति के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की आशंका बनी रहेगी। यह स्थिति न सिर्फ भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए महंगाई का खतरा बढ़ाएगी, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगी। (इनपुट-एजेंसी)

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