भाषाई एकता के जरिए भारत को जोड़ने की सक्षम पहल, नए युग का संकेत

भारत 22 अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों का देश है। हर भाषा अपने साथ एक लोक परंपरा, साहित्य, दर्शन और इतिहास लेकर चलती है। वोट बैंक को लुभाने के चक्कर में कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा भाषाई विविधिता को सामाज में खाई पैदा करने के हथियार के तौर पर प्रयोग करने की कोशिश की जाती रही है। अब इस तरह की राजनीति का अंत नजर आ रहा है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में भारतीय भाषाओं के पुनर्जागरण का एक अद्भुत दौर शुरू हुआ है, जो न केवल भाषाई अस्मिता को संबल प्रदान कर रहा है बल्कि देश की एकता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन की दृष्टि को भी गति दे रहा है। 

भाषाएं केवल संवाद का साधन नहीं, संस्कृति की धड़कन भी हैं

हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा भाषा के महत्व को लेकर दिए गए बयानों से भारतीय भाषाओं के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का विमर्श एक बार फिर केंद्र में आ गया है। इस विमर्श को भारतीय भाषाओं के पुनर्जागरण के तौर पर देखा जाना चाहिए, जो न केवल भाषाई अस्मिता को संबल प्रदान कर रहा है बल्कि देश की एकता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समावेशन की दृष्टि को भी गति दे रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि क्यों भारतीय भाषाएं आज केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास की रीढ़ बन रही हैं। न सिर्फ साहित्यकारों को बल्कि आज की युवा पीढ़ी को भी यह समझने की जरूरत है कि भाषाएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और उनको समृद्ध साहित्यिक रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। तभी भारत अंग्रेज़ी प्रभुत्व से बाहर निकलकर अपनी भाषाओं में आत्मविश्वास की खोज कर सकेगा।

देश की आत्मा भाषाई विविधता में भी निहित

गृहमंत्री शाह द्वारा भारतीय भाषाओं को भारत को जोड़ने का सबसे शक्तिशाली माध्यम बताया जाना एक गहन सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण है क्योंकि भारत के संविधान, इसकी विविधता और इतिहास ने भी बार-बार यह सिद्ध किया है कि यहां की भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि आत्मा का प्रतीक हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस देश की आत्मा एक है, जो भाषाई विविधता में भी निहित है। 

मातृभाषा में शिक्षा क्यों आवश्यक है?

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में इस विचार को केंद्रीय स्थान दिया गया है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। तमाम रिसर्च भी यही कहते हैं – UNESCO की रिपोर्ट के मुताबिक जब बच्चे को उसकी प्रथम भाषा में पढ़ाया जाता है, तो उसकी सीखने की क्षमता बेहतर होती है। अंग्रेजी थोपने की जगह अगर ज्ञान मातृभाषा में दिया जाए तो न केवल शिक्षा में गुणात्मक सुधार होगा, बल्कि छात्रों का आत्मबल भी बढ़ेगा। 

भाषाओं का तकनीकी विकास और डिजिटलीकरण

एक युग में जहां तकनीक ने दुनिया को जोड़ा है, वहीं यह भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय भाषाएं डिजिटल स्पेस में कैसे स्थान पा रही हैं। आज भारत सरकार ‘भाषा इंडिया’, ‘नेशनल लैंग्वेज ट्रांसलेटर मिशन’ और AI आधारित भारतीय भाषाओं के अनुवाद मॉडल्स पर कार्य कर रही है। बीते कुछ वर्षों में सरकार ने मल्टीलिंग्वल कोर टेक्नोलॉजी का विकास किया है, जिससे 22 भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री का निर्माण किया जा सके। इससे डिजिटल साक्षरता में भी इजाफा होगा और स्थानीय नागरिकों को सरकारी योजनाओं का लाभ सरलता से मिलेगा।

भाषा और आत्मनिर्भर भारत का सपना

जब ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात होती है, तो इसमें केवल उत्पाद नहीं बल्कि भाषाएं भी आती हैं। भारत अगर आत्मनिर्भर बनना चाहता है तो उसे अपनी सोच तकनीक और संवाद को भी स्वदेशी बनाना होगा। अंग्रेजी के ज्ञान को नकारना उद्देश्य नहीं है बल्कि उसकी अनिवार्यता के भ्रम को तोड़ना भी जरूरी है। अगर प्रशासनिक, वैज्ञानिक और तकनीकी संवाद भारतीय भाषाओं में संभव हो जाएं तो इससे सामाजिक समावेशन को निश्चित ही गति मिलेगी।

भाषाई विविधता बनाम भाषाई एकता

भाषा में विमर्श के समय भारत के सामने एक प्रमुख चुनौती यह भी है कि कैसे वह विविध भाषाओं को सम्मान देते हुए एक ‘राष्ट्रीय संवाद की भाषा’ विकसित करे। हिंदी को एक सेतु भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन उसका लोपात्मक नहीं, समावेशी स्वरूप सामने आना चाहिए। जैसा कि बीते दिनों गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, ‘हिंदी किसी पर थोपने का माध्यम नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के पूरक के रूप में होनी चाहिए।’ भाषाई एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी एक भाषा बोलें बल्कि यह है कि सभी भाषाएं एक-दूसरे की राह को आसान बनाएं।

भाषा और रोजगार के अवसर

इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी परीक्षाएं, नौकरियां, और सेवाएं – यह सभी अगर क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हों तो एक बड़े वर्ग के लिए अवसरों के द्वार खुल सकते हैं। अब UGC ने क्षेत्रीय भाषाओं में उच्च शिक्षा की स्वीकृति दी है। इसके अलावा रेलवे, बैंकिंग, और SSC जैसी परीक्षाओं को भी क्षेत्रीय भाषाओं में देने का विकल्प मिला है, यह सिर्फ भाषा का सम्मान नहीं, बल्कि न्याय का प्रश्न है – भाषा आधारित भेदभाव से मुक्ति।

भाषा नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति

भारत में भाषाएं सदैव राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही हैं लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि केंद्र सरकार ने भाषाई अस्मिता को सांस्कृतिक उभार के साथ जोड़ा है। यह कोई चुनावी नीति नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक राष्ट्रनीति है। देश के गृहमंत्री का यह कथन कि ‘हमारी भाषाएं देश की आत्मा हैं और इनकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है,’ – केवल सांस्कृतिक भावुकता नहीं बल्कि प्रशासनिक दिशा का निर्धारण करता है।

साहित्य, रंगमंच और मीडिया में वापसी

यह बेहद सकारात्मक बदलाव है कि भारतीय भाषाओं का साहित्य फिर से लोकप्रिय हो रहा है। युवाओं में प्रेमचंद, टैगोर, नागार्जुन, विष्णु खरे और भक्ति युग के कवियों को लेकर नया आकर्षण है। OTT प्लेटफॉर्म्स पर क्षेत्रीय भाषाओं की वेब सीरीज़, स्थानीय सिनेमा और भाषा-आधारित रेडियो चैनल्स इस पुनर्जागरण को बल दे रहे हैं। कला, साहित्य और मीडिया, यह सभी अब भाषाई अस्मिता के नए वाहक बन रहे हैं।

भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय एकता का नया विमर्श

आज भारत जिस तेज़ी से विश्वमंच पर एक नेतृत्वकारी राष्ट्र बन रहा है, उसे अपने भीतर से भी मज़बूत होना होगा। यह मजबूती केवल आर्थिक या सैन्य नहीं बल्कि सांस्कृतिक होगी और इस सांस्कृतिक आत्मबल की धुरी है भाषा। भारतीय भाषाओं का सम्मान करना केवल अतीत का गौरव बखानना नहीं बल्कि भविष्य की दिशा तय करना है। जब बच्चा अपनी मातृभाषा में सोच सके, पढ़ सके, परीक्षा दे सके और काम कर सके तभी असली ‘सशक्त भारत’ संभव होगा।

भारतीय भाषाएं भारत को जोड़ने का सबसे शक्तिशाली माध्यम बनेंगी

यह परिवर्तन हो रहा है – धीरे-धीरे, पर ठोस रूप से और इसके केंद्र में है वह विचार जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया ‘भारतीय भाषाएं भारत को जोड़ने का सबसे शक्तिशाली माध्यम बनेंगी।’ यह केवल भाषाई आत्मविश्वास नहीं बल्कि भारत की आत्मा के पुनर्जागरण की घोषणा है।

 (वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)

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