अहोई अष्टमी : संतान के दीर्घायु, आरोग्य और उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना का पर्व

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव या पूजा-पाठ का नाम नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पारिवारिक रिश्तों, प्रेम और जीवन-मूल्यों को संबल देने का माध्यम हैं। इन्हीं पावन पर्वों में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला ‘अहोई अष्टमी’ का व्रत मातृत्व के उस सर्वोच्च और निस्वार्थ स्वरूप का प्रतीक है, जहां एक मां अपनी संतान के जीवन, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देती है। दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व उत्तर भारत के कोने-कोने में श्रद्धा के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं निर्जला उपवास रखकर ‘अहोई माता’ से यह प्रार्थना करती हैं कि उनकी संतान पर आने वाला हर संकट टल जाए और उनका जीवन सुख, शांति और दीर्घायु के प्रकाश से जगमगा उठे।

अहोई अष्टमी का अर्थ और धार्मिक मान्यता

‘अहोई’ शब्द को सामान्य रूप से अनहोनी को टालने और संकटों से रक्षा करने की भावना से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अहोई माता संतान की रक्षा करने वाली देवी हैं। उनकी पूजा से बच्चों के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और उन्हें सुखी एवं स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिलता है। यही वजह है कि माताएं इस दिन पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत रखती हैं।अहोई अष्टमी का पर्व करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पहले मनाया जाता है। करवा चौथ में महिलाएं पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अहोई अष्टमी संतान के कल्याण को समर्पित है। इस तरह ये दोनों पर्व भारतीय परिवार व्यवस्था में प्रेम, जिम्मेदारी और आपसी संबंधों के महत्व को दर्शाते हैं।

अहोई माता की पूजा और व्रत की परंपरा

अहोई अष्टमी पर महिलाएं सुबह स्नान कर निर्जला या फलाहार का संकल्प लेती हैं। पूजा के लिए घर की दीवार पर गेरू-रोली से या बाजार के कैलेंडर द्वारा अहोई माता, उनके बच्चों और सेई का चित्र स्थापित किया जाता है। जल से भरे कलश के साथ रोली, अक्षत, फूल, दीपक, हलवा-पूरी और मिठाई से माता की पूजा होती है। कई जगह चांदी की माला (अहोई) पूजने का विधान है। शाम को महिलाएं एकत्र होकर कथा सुनती हैं और आरती करती हैं। अंत में, आकाश में तारे (या कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा) को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार विधि में कुछ भिन्नता हो सकती है।

पौराणिक कथा में छिपा है करुणा और पश्चाताप का संदेश

अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा एक साहूकार की पत्नी से जुड़ी है, जिसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। दीपावली से पूर्व जंगल में मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी खुरपी से ‘स्याही’ (वन्य जीव) के बच्चे की मृत्यु हो गई। दुखी स्याही ने उसे श्राप दिया कि उसका भी गोद सूना हो जाएगा। श्राप के प्रभाव से सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। व्याकुल स्त्री ने महिलाओं की सलाह पर कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक अहोई माता का व्रत और पूजा की। उसकी सच्ची भक्ति व पश्चाताप से प्रसन्न होकर माता ने सातों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया। यह कथा धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, जीव-जंतुओं के प्रति करुणा, संवेदनशीलता और भूल स्वीकार करने का गहरा संदेश देती है।

तारों की पूजा और अर्घ्य देने की परंपरा

अहोई अष्टमी के व्रत में तारों के दर्शन का विशेष महत्व है। दिनभर उपवास रखने के बाद महिलाएं शाम को आकाश में तारों के निकलने की प्रतीक्षा करती हैं। तारे दिखाई देने पर उन्हें जल अर्पित किया जाता है और अहोई माता से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की प्रार्थना की जाती है। भारतीय परंपरा में प्रकृति के विभिन्न रूपों को जीवन का आधार और ईश्वर की अभिव्यक्ति माना गया है। सूर्य, चंद्रमा और तारों की पूजा इसी आस्था का हिस्सा है। अहोई अष्टमी में तारों को साक्षी मानकर की जाने वाली प्रार्थना मां की उस भावना को व्यक्त करती है, जिसमें वह अपनी संतान के वर्तमान के साथ-साथ उसके आने वाले कल को लेकर भी चिंतित रहती है। यही कारण है कि इस पर्व का भावनात्मक पक्ष बेहद गहरा है।

परिवार और सामाजिक जीवन में पर्व का महत्व

अहोई अष्टमी केवल मां-संतान के प्रेम का नहीं, बल्कि पारिवारिक एकजुटता और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का अवसर है। इस दिन महिलाएं एक साथ पूजा कर कथा सुनती हैं, जिससे बुजुर्गों के संस्कार और अनुभव नई पीढ़ी तक पहुंचते हैं। बदलती जीवनशैली और एकल परिवारों के दौर में ऐसे पर्व अपनों से जुड़ने का मौका देते हैं। साथ ही, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि बच्चों के लिए केवल लंबी उम्र की कामना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य देना भी माता-पिता की मुख्य जिम्मेदारी है।

बदलते दौर में भी कायम है आस्था

आधुनिक जीवनशैली के बावजूद अहोई अष्टमी के प्रति महिलाओं की श्रद्धा और विश्वास बना हुआ है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक यह पर्व पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। कहीं महिलाएं दीवारों पर पारंपरिक चित्र बनाती हैं तो कहीं अहोई माता के कैलेंडर और तस्वीरों के सामने पूजा करती हैं। पूजा की विधियों में बदलाव आया है, लेकिन संतान के कल्याण की मूल भावना आज भी वही है। हालांकि, व्रत के दौरान स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। निर्जला उपवास हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं होता। इसलिए महिलाओं को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। धार्मिक आस्था का वास्तविक उद्देश्य मन में श्रद्धा, संयम और सकारात्मकता बनाए रखना है।

मातृत्व की ममता और अटूट विश्वास का उत्सव

अहोई अष्टमी भारतीय संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जिसमें मां की ममता, त्याग, तपस्या और संतान के प्रति असीम प्रेम एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों की गहराई और माता-पिता की जिम्मेदारियों को समझने का अवसर भी है। इस पर्व की परंपराएं हमें जीव-जंतुओं के प्रति दया, प्रकृति के संरक्षण और परिवार के प्रति संवेदनशील रहने की सीख देती हैं। वास्तव में मां की सबसे बड़ी खुशी अपनी संतान को स्वस्थ, सुरक्षित, संस्कारी और जीवन में सफल देखना है। अहोई माता की आराधना के माध्यम से माताएं इसी भावना को व्यक्त करती हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी महिमा है। समय के साथ भले ही जीवनशैली बदल जाए, लेकिन मां के प्रेम, विश्वास और संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना का यह भाव हमेशा बना रहेगा।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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