भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का उत्सव होते हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) इस व्यवस्था की सफलता और विश्वसनीयता के पीछे सबसे बड़ा स्तंभ है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में धांधली के आरोप लगाए गए, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए। हालांकि, आयोग ने इस पर स्पष्ट रूप से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई और राहुल गांधी को ईमेल भेजकर उनके आरोपों पर तथ्यों की मांग की गई। आयोग ने जोर देकर कहा कि महाराष्ट्र सहित सभी चुनाव कानून सम्मत और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार कराए गए हैं। यह अवसर है कि हम भारत के चुनाव आयोग की भूमिका, उसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और वैश्विक मानकों पर उसके प्रदर्शन का विश्लेषण करें क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की विश्वसनीयता उसकी संस्थाओं में जनविश्वास से तय होती है।
एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित करता है जिसे संसद, राष्ट्रपति, विधानसभा और सभी निर्वाचित निकायों के चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संपन्न कराने का दायित्व दिया गया है। यह संस्था न तो कार्यपालिका के अधीन है और न ही किसी राजनीतिक दबाव में काम करती है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और उनका कार्यकाल एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं।
मतदान प्रक्रिया की निष्पक्षता के आधार
भारतीय निर्वाचन आयोग केवल एक प्रशासनिक निकाय नहीं बल्कि विवाद-निराकरण और मतदाता-विश्वास निर्माण की भी जिम्मेदारी निभाता है। आयोग मतदान प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए कई स्तर पर काम करता है।
EVM-VVPAT प्रणाली का उपयोग
2019 के लोकसभा चुनावों में 17 लाख से अधिक VVPAT मशीनों का उपयोग किया गया, जिससे हर मतदाता अपने वोट की पुष्टि कर सके। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार हर विधानसभा क्षेत्र में कम-से-कम 5 वीवीपैट पर्चियों का मिलान ईवीएम से किया गया, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
राजनीतिक दलों के खर्च की निगरानी
ECI द्वारा राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर निगरानी के लिए Expediture Monitoring Teams और Flying Squads की नियुक्ति की जाती है। 2019 में चुनाव आयोग ने लगभग 3,475 करोड़ रुपए की अवैध नकदी, शराब और गिफ्ट्स आदि जब्त किए जो पारदर्शी चुनाव के प्रति उसकी संकल्पशीलता को दर्शाता है।
SVEEP कार्यक्रम
Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP) जैसे अभियानों के जरिए आयोग ने ग्रामीण, शहरी और हाशिए पर मौजूद मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ा। नतीजतन, 2019 में भारत का मतदान प्रतिशत 67.4% रहा- जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक रिकॉर्ड था।
राजनीतिक आरोप बनाम संस्थागत सच्चाई
राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र में स्वाभाविक है लेकिन जब ऐसे आरोप किसी ठोस प्रमाण के बिना लगाए जाएं और चुनाव आयोग को सूचना तक न दी जाए जैसा कि महाराष्ट्र चुनावों के मामले में नेता विपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी के बयान से स्पष्ट होता है तब यह केवल राजनीतिक विमर्श नहीं बल्कि संस्थाओं पर अनावश्यक अविश्वास फैलाने का प्रयास बन जाता है। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से लिखित में तथ्यों की मांग की और चर्चा के लिए भी आमंत्रित किया है और अब यह दायित्व बनता है कि आरोप लगाने वाले नेता उन्हें उचित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तुत करें।
वैश्विक संदर्भ में भारत का चुनाव आयोग
बीते कुछ वर्षों में राजनीतिक तौर पर भले ही भारत की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने का चलन बन गया हो लेकिन भारत के चुनाव आयोग की प्रशंसा केवल देश के भीतर ही नहीं संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों और कई विदेशी सरकारों द्वारा भी की गई है। Harvard Kennedy School के 2020 के एक अध्ययन में भारत के चुनाव आयोग को ‘One of the most robust electoral institutions globally’ कहा गया। यही नहीं, 2014 और 2019 के आम चुनावों में भारत ने पूरी दुनिया को दिखाया कि तकनीक, प्रशिक्षण और जनता की भागीदारी के माध्यम से एक निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संभव है।
संवेदनशीलता, पारदर्शिता और तकनीकी दक्षता
चुनाव आयोग की तकनीकी पहलें जैसे कि cVIGIL ऐप, जो आम नागरिकों को आचार संहिता उल्लंघन की सूचना देने का अवसर देता है, या KYC आधारित वोटर रजिस्ट्रेशन सुधार, यह दर्शाते हैं कि आयोग हर स्तर पर नागरिक सहभागिता और पारदर्शिता को बढ़ावा दे रहा है।
लोकतंत्र में विश्वास नहीं?
भारत का लोकतंत्र केवल मतपेटियों या मशीनों से नहीं चलता -वह संस्थाओं की ईमानदारी और नागरिकों के विश्वास से पोषित होता है। चुनाव आयोग पर अनगिनत आरोप लगाना आसान है लेकिन उस पर भरोसा बनाए रखना यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। भारत के निर्वाचन आयोग ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि वह किसी भी राजनीतिक दबाव, मीडिया उन्माद या सार्वजनिक सनसनी से परे केवल संविधान और मतदाता के प्रति जवाबदेह है। इसलिए आज जरूरत है कि हम आलोचना करें लेकिन तथ्यों पर करें। सवाल उठाएं लेकिन समाधान के साथ और सबसे अहम – संस्थाओं का सम्मान बनाए रखें, ताकि लोकतंत्र मजबूत रहे।
-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)


