जलवायु परिवर्तन और हीटवेव: दक्षिण एशिया के लिए बना रोजमर्रा की जंग

दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर दोपहर की धूप भारी पड़ रही है, लेकिन 48 वर्षीय रिक्शा चालक रमेश के लिए काम रोकना कोई विकल्प नहीं है। करीब 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में वह ट्रैफिक के बीच पसीने से लथपथ पैडल चलाते हैं। हर कुछ मिनट में वह गले में लिपटे पुराने तौलिये से अपना चेहरा पोंछते हैं। फ्लाईओवर की छाया में कुछ पल रुकते हुए वह कहते हैं, “अगर मैं काम रोक दूं, तो मेरे बच्चों को परेशानी होगी।”

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में इस समय भीषण गर्मी का कहर जारी है, जहां कई इलाकों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण हीटवेव अब पहले से अधिक लंबी और कई बार जानलेवा हो रही हैं। यह भीषण और लंबी चलने वाली गर्मी लाखों लोगों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी को संघर्ष में बदल रही है। भीड़भाड़ वाले शहरों से लेकर सूखे से जूझते गांवों तक, बढ़ता तापमान मजदूरों, किसानों, बच्चों, बुजुर्गों और डिलीवरी कर्मियों पर गंभीर असर डाल रहे हैं।

कई भारतीय शहरों में दोपहर के समय सड़कें सूनी दिखाई देती हैं, क्योंकि लोग घरों में रहने को मजबूर हैं, हालांकि उनके पास जरूरी काम भी होते हैं। अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, हीट एक्सॉशन, चक्कर और सांस से जुड़ी समस्याओं के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। डॉक्टरों के अनुसार, खुले में काम करने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में हैं, क्योंकि वे लंबे समय तक सीधी धूप में रहते हैं।

सड़क किनारे काम करने वाले विक्रेताओं के लिए यह गर्मी आर्थिक संकट भी बन रही है। नोएडा एक्सटेंशन के फल विक्रेता रामधन बताते हैं कि दिन के समय ग्राहक कम हो जाते हैं। वह कहते हैं, “पहले भी गर्मी होती थी, लेकिन अब यह असहनीय लगती है। कई बार फल बिकने से पहले ही खराब हो जाते हैं, जिससे काम चलाना मुश्किल हो जाता है।”

हीटवेव का असर बिजली और पानी की आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। कई इलाकों में उसी समय बिजली कटौती हो रही है, जब पंखों और कूलरों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। गिरते भूजल स्तर के कारण कई क्षेत्रों में पानी के टैंकर आते- जाते देखे जा सकते हैं। पानी की कमी ने गर्मी को और भी असहनीय बना दिया है।

बढ़ते तापमान के बीच लोगों को न सिर्फ गर्मी बल्कि पीने के पानी की कमी से भी जूझना पड़ रहा है। सूखे नल, घटते जलाशय और बार-बार बिजली कटौती से खासकर गरीब, किसान और कमजोर वर्गों की परेशानियां बढ़ गई हैं।

ग्रामीण इलाकों में हालात उतने ही चिंताजनक हैं। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान बताते हैं कि तेज गर्मी और मिट्टी में नमी की कमी से फसलें तेजी से सूख रही हैं। कई किसानों को डर है कि मौसम की अनिश्चितता उन्हें कर्ज के बोझ में और धकेल सकती है।

दक्षिण एशिया के शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव भी जलवायु परिवर्तन के असर को बढ़ा रहा है। दिल्ली, जयपुर, कराची, ढाका और लाहौर जैसे शहरों में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट ढांचे, घटती हरियाली और बढ़ता प्रदूषण तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रहे हैं। इन शहरों में हीटवेव, पानी की कमी, वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं।

बच्चे और बुजुर्ग विशेष रूप से खतरे में हैं। कई क्षेत्रों में स्कूलों ने आउटडोर गतिविधियां कम कर दी हैं या गर्मी की छुट्टियां पहले ही घोषित कर दी हैं। डॉक्टर लोगों को दोपहर के समय बाहर न निकलने, अधिक पानी पीने और जितना हो सके घर के अंदर रहने की सलाह दे रहे हैं।

हालांकि, रोज कमाने-खाने वाले लाखों लोगों के लिए घर में रहना संभव नहीं है। शाम होते ही वे थोड़ी देर आराम के बाद फिर काम पर निकल पड़ते हैं। शाम की सड़कों पर भी गर्मी कम नहीं होती, गर्म हवाएं भट्टी जैसी महसूस होती हैं। फिर भी रिक्शा चालक और ठेले वाले काम पर लौटते हैं, क्योंकि एक दिन की कमाई का नुकसान उनके लिए संभव नहीं है। उनके लिए जलवायु परिवर्तन कोई दूर की बहस नहीं, बल्कि रोज की कड़वी सच्चाई बन चुका है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे गर्म मौसम का होना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। ग्रीन हाउस गैसों के कारण बढ़ता वैश्विक तापमान दुनिया भर में मौसम के पैटर्न को बदल रहा है। घनी आबादी और बड़ी संख्या में खुले में काम करने वाले लोगों के कारण दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। वहीं, शहरों में घटती हरियाली भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा रही है, जिससे मौसम का चरम पर गर्म होना और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटना और कठिन होता जा रहा है।