स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद: आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ रही 5,000 साल पुरानी चिकित्सा पद्धति

11वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर भारत अपनी करीब 5,000 साल पुरानी चिकित्सा परंपरा को साक्ष्य-आधारित वैज्ञानिक शोध के माध्यम से आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था का हिस्सा बनाने की दिशा में किए गए प्रयासों को रेखांकित कर रहा है। देशभर में सरकारी क्लीनिक और अस्पताल नियमित चिकित्सा सेवाओं के साथ आयुर्वेदिक उपचार उपलब्ध करा रहे हैं। मुफ्त ऑनलाइन परामर्श, स्वास्थ्य बीमा कवरेज और वैज्ञानिक अनुसंधान के विस्तार के साथ आयुर्वेद को अधिक व्यवस्थित और सुलभ बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

समग्र जीवनशैली पर आधारित चिकित्सा पद्धति

आयुर्वेद को जीवन का विज्ञान माना जाता है, जिसकी जड़ें प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी हैं। ‘आयु’ यानी जीवन और ‘वेद’ यानी ज्ञान या विज्ञान से मिलकर बने आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के विकारों का शमन करना है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथों में वर्णित औषधीय पौधों, पशु उत्पादों और खनिजों के चिकित्सीय उपयोग इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं।

शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन पर जोर

आयुर्वेद में स्वास्थ्य को शरीर, मन और आत्मा के साथ आसपास के वातावरण के संतुलन से जोड़ा गया है। दोष, अग्नि, धातु और मल के संतुलन के साथ आत्मा, मन और इंद्रियों के बीच सामंजस्य को भी स्वास्थ्य की स्थिति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। सरकार आयुर्वेद को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ते हुए इस पारंपरिक दृष्टिकोण को वैज्ञानिक शोध और संस्थागत व्यवस्था के साथ आगे बढ़ा रही है।

23 सितंबर को मनाया जाता है आयुर्वेद दिवस

सरकार हर साल 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस मनाती है। इस वर्ष ‘बेहतर कल के लिए आयुर्वेद’ की थीम के तहत पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्जीवित करने और उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है। आयुर्वेद के साथ योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा और होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को भी इस व्यापक प्रयास में शामिल किया गया है।

आयुष स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर जोर

सरकार राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के माध्यम से आयुर्वेद समेत पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के विस्तार और आधुनिकीकरण पर काम कर रही है। वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच एनएएम के माध्यम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आयुष स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए 6,406.99 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी की गई है।

देश में 12,260 आयुष एएएम संचालित

19 सितंबर 2026 तक देश में 12,260 आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) संचालित हो रहे हैं। एनएएम का लक्ष्य 12,500 ऐसे केंद्र स्थापित करना है। इन केंद्रों में आयुष सेवाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ जोड़ा जा रहा है। एनएचएम के माध्यम से 13,249 सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सामान्य चिकित्सा देखभाल के साथ आयुष सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद की जा रही है।

पीएचसी और जिला अस्पतालों तक आयुष सेवाएं

30 दिसंबर 2025 तक आयुष सेवाएं उपलब्ध कराने वाली इन सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में 6,302 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 3,191 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 475 जिला अस्पताल और 3,281 अन्य स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल थीं। सरकार विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यरत 25,322 आयुष डॉक्टरों और 5,666 आयुष अर्द्धचिकित्साकर्मियों के वेतन के लिए भी सहायता उपलब्ध करा रही है।

एकीकृत अस्पतालों और सेवाओं का विस्तार

सरकार मौजूदा आयुष अस्पतालों और क्लीनिकों के उन्नयन के साथ नए एकीकृत अस्पताल स्थापित करने पर भी जोर दे रही है। 10, 30 और 50 बिस्तरों वाले अस्पतालों के जरिए विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। सरकारी क्लीनिकों और अस्पतालों में आवश्यक आयुष औषधियों की उपलब्धता, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और जागरूकता अभियान भी इस विस्तार का हिस्सा हैं।

केंद्रीय अस्पतालों में एकीकृत आयुष विभाग

वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज जैसे केंद्रीय अस्पतालों में एकीकृत चिकित्सा विभाग शुरू किए गए हैं। यहां निवारक, संवर्धनात्मक और उपचारात्मक सेवाओं के साथ पंचकर्म इकाइयां भी संचालित हैं। आयुष अनुसंधान परिषदों की विस्तारित ओपीडी सेवाएं सफदरजंग अस्पताल, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उपलब्ध हैं। नए एम्स में भी आयुष सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है।

ई-संजीवनी से ऑनलाइन आयुष परामर्श

सरकार की मुफ्त टेलीमेडिसिन सेवा ‘ई-संजीवनी’ के जरिए 50 करोड़ से अधिक मरीज लाभ उठा चुके हैं। इस प्लेटफॉर्म पर आयुष ओपीडी सेवाएं भी उपलब्ध हैं, जिससे मरीज आयुर्वेद और अन्य आयुष पद्धतियों के विशेषज्ञ डॉक्टरों से ऑनलाइन परामर्श ले सकते हैं।

आयुष उपचारों को बीमा कवरेज

आयुष उपचारों को स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में शामिल करने के लिए भी नीतिगत बदलाव किए गए हैं। 2024 में भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने बीमा कंपनियों के लिए आयुर्वेद समेत चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों को कवर करने वाले उत्पाद या ऐड-ऑन उपलब्ध कराने का प्रावधान किया।

एआईआईए का 32 सामान्य बीमा कंपनियों से समझौता

10 फरवरी 2026 को अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए), नई दिल्ली ने जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के साथ कॉमन एम्पैनलमेंट समझौता किया। इसके तहत एआईआईए को देश की सभी 32 सामान्य बीमा कंपनियों के साथ सूचीबद्ध किया गया है। संस्थान ने बीमा संबंधी सवालों और आयुष बीमा कवरेज को लेकर जागरूकता के लिए हेल्पलाइन 1800-11-0008 भी शुरू की है।

डब्ल्यूएचओ के आईसीडी-11 में आयुर्वेद की शब्दावली

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय रोग वर्गीकरण के 11वें संशोधन (आईसीडी-11) के मॉड्यूल में आयुर्वेद की शब्दावली को शामिल किया गया है। इससे आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी से संबंधित निदान को मानक कोड के जरिए दर्ज करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिला है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा, अनुसंधान और नीति निर्माण में डेटा के मानकीकरण में मदद मिलने की उम्मीद है।

आयुर्वेद शिक्षा का विस्तार

राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत आयुर्वेद शिक्षा के विस्तार के लिए नए स्नातक और स्नातकोत्तर संस्थानों, फार्मेसी और पैरामेडिकल कार्यक्रमों की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है। देशभर में 13 मार्च 2026 तक 593 आयुर्वेद कॉलेज, 45,245 स्नातक और 5,673 स्नातकोत्तर आयुर्वेद सीटें उपलब्ध थीं। एनएएम के तहत 17 आयुष कॉलेजों की स्थापना को मंजूरी दी गई है, जिनमें 12 कॉलेज आयुर्वेदिक शिक्षा पर केंद्रित हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा

आयुर्वेद को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने के लिए साक्ष्य-आधारित अनुसंधान और वैज्ञानिक सत्यापन पर जोर दिया जा रहा है। आयुष मंत्रालय की ‘आयुर्ज्ञान’ योजना के तहत अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी जाती है। 34 परियोजनाओं के लिए 17.79 करोड़ रुपए के अनुसंधान निधि पूल में से 17 आयुर्वेद परियोजनाओं को 9.38 करोड़ रुपए मिले हैं।

औषधियों की सुरक्षा और प्रभावकारिता पर शोध

2026 की शुरुआत तक 11 विशिष्ट अनुसंधान परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी थी। इनमें छह परियोजनाएं पांच प्रमुख एकल आयुर्वेदिक वनस्पतियों की सुरक्षा और प्रभाव से जुड़े दस्तावेज तैयार करने पर केंद्रित थीं। 2014-15 से 2025-26 के बीच आयुर्वेद से जुड़े 33 शोध प्रकाशन सामने आए, जबकि 2001-02 से अब तक कुल 77 शोध प्रकाशनों का उल्लेख किया गया है।

उत्कृष्टता केंद्रों को मिल रहा सहयोग

‘आयुर स्वास्थ्य योजना’ 2021-2026 के तहत आयुष नैदानिक और औषधि अनुसंधान, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों और संस्थानों को उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। 2025 के अंत तक सहायता प्राप्त 25 परियोजनाओं में 22 परियोजनाएं आयुर्वेद पर केंद्रित थीं या उनमें आयुर्वेद शामिल था। योजना के तहत 28 उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें 22 आयुर्वेद-केंद्रित हैं।

सीसीआरएएस के जरिए अनुसंधान क्षमता का निर्माण

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) आयुष मंत्रालय के तहत आयुर्वेद अनुसंधान से जुड़ा प्रमुख संस्थागत निकाय है। देशभर में 30 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संस्थानों के नेटवर्क के माध्यम से परिषद शोध, प्रशिक्षण, फेलोशिप और छात्र केंद्रित कार्यक्रम संचालित करती है।

‘स्पार्क’ कार्यक्रम से छात्रों को शोध का अवसर

‘स्टूडेंटशिप प्रोग्राम फॉर आयुर्वेद रिसर्च केन’ यानी ‘स्पार्क’ कार्यक्रम का उद्देश्य स्नातक आयुर्वेद छात्रों में शोध के प्रति रुचि और क्षमता विकसित करना है। 2022-23 से 2024-25 के बीच इस कार्यक्रम के माध्यम से 289 आयुर्वेद कॉलेजों ने लाभ उठाया।

13 भारतीय भाषाओं में शोध सामग्री का अनुवाद

मार्च 2026 में सीसीआरएएस ने ‘अनुवादिनी एआई’ के साथ साझेदारी की। इस प्लेटफॉर्म के जरिए परिषद अपने शोध परिणामों, शैक्षणिक संसाधनों और त्रैमासिक चिकित्सा पत्रिकाओं का 13 क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रही है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद संबंधी वैज्ञानिक जानकारी को छात्रों, चिकित्सकों और आम लोगों तक अधिक व्यापक रूप से पहुंचाना है।

औषधीय पौधों की खेती और संरक्षण

सरकार औषधीय जड़ी-बूटियों के संरक्षण, खेती और प्रसंस्करण के लिए किसानों और अनुसंधान संस्थानों को सहयोग दे रही है। इसके तहत आपूर्ति श्रृंखला की कमियों को दूर करने, किसानों को प्रोत्साहित करने, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने और औषधीय उत्पादों के मानकों को बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।

आयुर्वेदिक दवाओं के लिए कड़े गुणवत्ता मानक

आयुर्वेदिक दवाओं को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और औषधि नियमावली, 1945 के तहत विनियमित किया जाता है। निर्माताओं के लिए अच्छी विनिर्माण प्रक्रिया (जीएमपी) का पालन, दवाओं की सुरक्षा और प्रभावकारिता से जुड़े मानकों को पूरा करना तथा भेषजसंहिता के मानकों का अनुपालन जरूरी है। गुणवत्ता नियंत्रण के लिए औषधि निरीक्षकों द्वारा नमूने लिए और जांचे जाते हैं।

ई-औषधि पोर्टल से निगरानी

दवा निर्माण लाइसेंस से जुड़ी प्रक्रिया को आसान बनाने और निगरानी को मजबूत करने के लिए ‘ई-औषधि’ पोर्टल शुरू किया गया है। इसके जरिए लाइसेंस आवेदनों की कागजरहित प्रक्रिया और नियामकीय निगरानी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

आयुर्वेद आहार के लिए मानकीकृत व्यवस्था

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से ‘आयुर्वेद आहार’ के लिए मानकीकृत नियमन लागू किया है। इसके तहत प्रामाणिक आयुर्वेदिक ग्रंथों के आधार पर खाद्य उत्पादों की सूची तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पारंपरिक खाद्य निर्माताओं के लिए अधिक पारदर्शी और विनियमित व्यवस्था विकसित करना है।

43 देशों में 46 आयुष सूचना केंद्र

आयुष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए भारत ने विभिन्न देशों के साथ समझौते, अनुसंधान सहयोग और शैक्षणिक आदान-प्रदान की व्यवस्था की है। अब तक पारंपरिक चिकित्सा और होम्योपैथी में सहयोग के लिए 27 समझौता ज्ञापन, आयुष अकादमिक पीठ के लिए 16 समझौते और संस्थान-स्तर पर सहयोग के लिए 57 समझौते किए गए हैं। 43 देशों में 46 आयुष सूचना केंद्र स्थापित किए गए हैं और अंतरराष्ट्रीय आयुष फेलोशिप व छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत विदेशी नागरिकों को 104 छात्रवृत्तियां दी गई हैं।

डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन

दिसंबर 2025 में नई दिल्ली के भारत मंडपम में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा डब्ल्यूएचओ वैश्विक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों और 22 स्वास्थ्य मंत्रियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में ‘दिल्ली घोषणापत्र’ अपनाया गया, जिसमें सदस्य देशों को वैज्ञानिक तरीकों के जरिए पारंपरिक चिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

जामनगर में डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र

गुजरात के जामनगर में स्थित डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र को अनुसंधान और नीति निर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद और यूनानी के लिए मानक प्रशिक्षण मार्गदर्शिकाएं तैयार करने में डब्ल्यूएचओ के साथ सहयोग किया है। भारत ने हर्बल दवा विनियमन और वनस्पति विज्ञान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपने शोध और अनुभव साझा किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और सांस्कृतिक पहुंच

जून 2025 में 11वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर 191 देशों में करीब 2,000 कार्यक्रम आयोजित किए गए। जापान के ओसाका में आयोजित वर्ल्ड एक्सपो 2025 में भी भारतीय मंडप में नियमित योग सत्र आयोजित किए गए, जिससे आयुष और भारतीय पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को बढ़ावा मिला।

ब्रिक्स में पारंपरिक चिकित्सा पर सहयोग

भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा को शामिल करने की दिशा में भी काम कर रहा है। हालिया ब्रिक्स बैठकों और रियो डी जनेरियो घोषणापत्र के बाद चंडीगढ़ में आयोजित 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पर समर्पित विशेषज्ञ कार्य समूह स्थापित किया गया।

आयुष वीजा से मेडिकल वैल्यू ट्रैवल को बढ़ावा

विदेशी मरीजों के लिए भारत में आयुष उपचार लेना आसान बनाने के लिए विशेष आयुष वीजा विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं। इनमें मरीजों के लिए एम-3 और उनके साथ आने वाले देखभालकर्ताओं के लिए एम-4 वीजा शामिल हैं। इसका उद्देश्य आयुष आधारित चिकित्सा सेवाओं के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय गंतव्य के रूप में विकसित करना है।

बजट 2026-27 में 4,408 करोड़ रुपए का आवंटन

केंद्रीय बजट 2026-27 में आयुष मंत्रालय के लिए 4,408 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसका इस्तेमाल आयुष स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने तथा अवसंरचना और अंतरराष्ट्रीय पहुंच के विस्तार के लिए किया जाना है। बजट में तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना और आयुष फार्मेसियों तथा औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं के उन्नयन की घोषणाएं भी शामिल हैं।

परंपरा और आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच तालमेल

आयुर्वेद का विकास पारंपरिक ज्ञान परंपरा से आगे बढ़कर आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के संस्थागत हिस्से के रूप में हो रहा है। स्वास्थ्य अवसंरचना, शिक्षा, अनुसंधान, नियामक व्यवस्था, डिजिटल सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के विस्तार ने आयुर्वेद के लिए व्यापक इकोसिस्टम तैयार किया है। साक्ष्य-आधारित अनुसंधान, वैज्ञानिक सत्यापन और गुणवत्ता मानकों पर बढ़ता जोर इसकी आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में भूमिका को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में आयुर्वेद का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संस्थानों और वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को दर्शाता है। (इनपुट: पीआईबी)

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