ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 : नई दिल्ली से साझा विकास और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की नई उम्मीद

दुनिया तेजी से बदल रही है। वैश्विक राजनीति में नए समीकरण उभर रहे हैं, अर्थव्यवस्था नई चुनौतियों का सामना कर रही है और तकनीक ने विकास की परिभाषा को व्यापक बना दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा नई संभावनाएं खोल रही हैं, वहीं युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा तथा स्वास्थ्य संकट जैसी चुनौतियां भी सामने हैं। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और साझेदारी की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य में नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 का विशेष महत्व रहा। सम्‍मेलन में आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस पर जोर दिया गया। यह केवल सदस्य देशों के नेताओं की बैठक नहीं, बल्कि विकासशील देशों की आकांक्षाओं और वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को साझा मंच देने का महत्वपूर्ण अवसर बना। भारत की मेजबानी ने सम्मेलन को संवाद, बहुपक्षीय सहयोग और समावेशी विकास के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करने का अवसर दिया।ब्रिक्स का दायरा अब अर्थव्यवस्था और व्यापार से आगे बढ़कर स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, कृषि, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा तथा महिला और युवा सशक्तिकरण तक पहुंच चुका है। विभिन्न क्षेत्रों और परिस्थितियों वाले देशों को साझा हितों पर साथ लाना इसकी प्रमुख विशेषता रही। नई दिल्ली सम्मेलन ने यह संदेश मजबूत किया कि वैश्विक प्रगति तभी सार्थक होगी, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और निर्णय प्रक्रिया में सभी देशों की भागीदारी सुनिश्चित हो।

बदलती दुनिया में ब्रिक्स की बढ़ती प्रासंगिकता

ब्रिक्स की शुरुआत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग के मंच के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ इसका दायरा व्यापक होता गया। आज यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग और विकासशील देशों की आवाज को मजबूती देने वाला महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक परिस्थितियों और भौगोलिक क्षेत्रों से जुड़े देशों का यह समूह अपनी विविधता के बावजूद साझा विकास के मुद्दों पर संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाता है। यही विविधता ब्रिक्स को वैश्विक विमर्श में विशिष्ट स्थान देती है। बदलती विश्व व्यवस्था में विकासशील देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और न्यायपूर्ण बनाने की अपेक्षा रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की व्यापक भागीदारी और वैश्विक संसाधनों तक समान अवसर जैसे मुद्दे इस सोच के केंद्र में हैं। नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इन आकांक्षाओं को साझा मंच प्रदान करते हुए बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती देने का महत्वपूर्ण संदेश दिया है।

भारत की भूमिका और ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज

भारत की विदेश नीति में विकासशील देशों के हितों को महत्व देने की परंपरा रही है। भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बात रखी है कि वैश्विक विकास की योजनाएं केवल विकसित देशों की प्राथमिकताओं के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। विकासशील देशों की अपनी चुनौतियां और प्राथमिकताएं हैं और उन्हें वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए। ब्रिक्स भारत को इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का अवसर देता है। नई दिल्ली से भारत ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग की भी उतनी ही आवश्यकता है। ‘ग्लोबल साउथ’ के अनेक देशों के सामने गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा की सीमित पहुंच, जलवायु परिवर्तन और खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियां हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल किसी एक देश के प्रयास से संभव नहीं है। इसके लिए तकनीक, वित्त, ज्ञान और अनुभव साझा करने की जरूरत है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से साझा भविष्य तक

भारत की सभ्यता में रचा-बसा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की व्यापक दृष्टि देता है। आज जब जलवायु परिवर्तन, महामारी, आर्थिक अस्थिरता और डिजिटल तकनीक जैसी चुनौतियां सीमाओं से परे असर डाल रही हैं, तब यह दृष्टिकोण और अधिक प्रासंगिक हो गया है। साझा चुनौतियों ने यह स्पष्ट किया है कि उनका स्थायी समाधान भी सामूहिक प्रयास, संवाद और सहयोग से ही संभव है। नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इस भारतीय दृष्टिकोण को वैश्विक बहुपक्षवाद के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया। सम्मेलन में विभिन्न मतों और हितों वाले देशों के बीच संवाद बनाए रखने तथा साझा मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता रेखांकित हुई। भारत ने ब्रिक्स को किसी शक्ति-समूह के विरुद्ध खड़े मंच के बजाय साझा विकास, समावेशी प्रगति और वैश्विक हितों के लिए सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में अपनी भूमिका निभाई। मतभेदों के बीच सहमति के क्षेत्रों की पहचान कर साथ आगे बढ़ने का यह दृष्टिकोण व्यावहारिक कूटनीति और संतुलित बहुपक्षवाद की मजबूत मिसाल बना।

आर्थिक सहयोग : विकास की नई संभावनाएं

ब्रिक्स की बुनियादी ताकत आर्थिक सहयोग है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक साझेदारी को बढ़ावा देना आने वाले वर्षों में इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में रह सकता है। विश्व अर्थव्यवस्था में आपूर्ति शृंखलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ी है। हाल के वर्षों में दुनिया ने देखा है कि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय बड़ी समस्या बन सकती है। ऐसे में विविध और सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण आवश्यक है। ब्रिक्स देश व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने, छोटे एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक बाजार से जोड़ने और नई तकनीक के माध्यम से व्यापार को आसान बनाने की दिशा में सहयोग किया जा सकता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान व्यवस्था पर सहयोग भी भविष्य में आर्थिक संबंधों को अधिक सुगम बनाने की दिशा में एक विकल्प हो सकता है। हालांकि इस क्षेत्र में व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं, लेकिन संवाद और क्रमिक सहयोग से इन्हें दूर किया जा सकता है। आर्थिक सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसका लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे। छोटे कारोबारी, किसान, स्टार्टअप, युवा उद्यमी और रोजगार तलाश रहे लोगों को भी वैश्विक आर्थिक सहयोग का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

डिजिटल क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता

21वीं सदी की सबसे परिवर्तनकारी शक्तियों में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रमुख हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, प्रशासन और शोध जैसे क्षेत्रों में व्यापक बदलाव की संभावनाएं पैदा की हैं। हालांकि, इसके बढ़ते प्रभाव के साथ डेटा सुरक्षा, रोजगार, डिजिटल असमानता, गलत सूचना और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग जैसे सवाल भी सामने आए हैं। नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डिजिटल सहयोग और तकनीकी नवाचार की संभावनाओं ने इस व्यापक विमर्श को नई दिशा दी।डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में भारत के अनुभव विकासशील देशों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। साथ ही, सम्मेलन ने यह दृष्टि मजबूत की कि तकनीकी प्रगति का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। डिजिटल समावेशन के बिना तकनीकी क्रांति असमानता बढ़ा सकती है। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास मानव-केंद्रित, समावेशी और जिम्मेदार होना जरूरी है, ताकि तकनीक मानव क्षमता को सशक्त करे और सुरक्षित, न्यायपूर्ण तथा बेहतर भविष्य के निर्माण में सहायक बने।

स्वास्थ्य : विकास का सबसे मानवीय पक्ष

किसी भी देश की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल उसकी GDP से नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता से भी किया जाता है। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वास्थ्य सुरक्षा वैश्विक सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। किसी एक देश में उत्पन्न स्वास्थ्य संकट देखते ही देखते पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए महामारी से निपटने की तैयारी, वैक्सीन और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य तकनीक में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की विशेष आवश्यकता सामने आई।नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को भी व्यापक दृष्टि प्रदान की। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, चिकित्सा अनुसंधान और विशेषज्ञता साझा करने तथा सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने में सदस्य देशों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है। डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने दूरदराज के क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने, रोगों की समय पर पहचान और निगरानी तथा स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों के बेहतर विश्लेषण की नई संभावनाएं खोली हैं। स्वास्थ्य सहयोग का अंतिम लक्ष्य यही होना चाहिए कि आर्थिक स्थिति या भौगोलिक दूरी किसी व्यक्ति के बेहतर उपचार में बाधा न बने।

जलवायु परिवर्तन और सतत विकास

जलवायु परिवर्तन आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसका प्रभाव विशेष रूप से विकासशील देशों पर अधिक पड़ता है। बाढ़, सूखा, गर्मी की बढ़ती तीव्रता और प्राकृतिक आपदाएं करोड़ों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रही हैं। BRICS देशों के लिए जलवायु परिवर्तन पर सहयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन देशों में बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं। विकास की जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन यही सबसे बड़ी आवश्यकता भी है। स्वच्छ ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है। साथ ही जलवायु वित्त और आधुनिक तकनीक की उपलब्धता विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत ने लंबे समय से यह दृष्टिकोण रखा है कि जलवायु के साथ विकास की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसलिए न्यायपूर्ण और समावेशी ऊर्जा पर चर्चा ब्रिक्स के एजेंडे को अधिक मानवीय बना सकती है।

ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा

ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा किसी भी देश की स्थिरता के लिए बुनियादी आवश्यकता है। वैश्विक संकटों के दौरान ऊर्जा और खाद्य कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। ब्रिक्स देशों के बीच ऊर्जा सहयोग से आपूर्ति को अधिक सुरक्षित और विविध बनाया जा सकता है। पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि तकनीक, सिंचाई, जल संरक्षण, भंडारण और आपूर्ति शृंखला को बेहतर करना आवश्यक है। छोटे किसानों को आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल अधिक उत्पादन पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी कितनी कम की जाती है और उनकी आपूर्ति कितनी प्रभावी ढंग से होती है।

युवा शक्ति और कौशल विकास

ब्रिक्स देशों की बड़ी युवा आबादी उनके लिए बड़ी ताकत है। लेकिन युवा आबादी तभी आर्थिक शक्ति बन सकती है जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर मिलें। नई तकनीक के कारण रोजगार का स्वरूप बदल रहा है। AI, रोबोटिक्स, डिजिटल सेवाओं और हरित अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। ऐसे में युवाओं को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित करना जरूरी है। ब्रिक्स देशों के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और तकनीकी संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सकता है। छात्र एवं शोधकर्ता आदान-प्रदान, संयुक्त शोध और कौशल विकास कार्यक्रम युवाओं को वैश्विक अवसरों से जोड़ सकते हैं। यदि ब्रिक्स अपने युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर पैदा करने में सफल होता है, तो यह केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि सामाजिक स्थिरता और मानव विकास की दिशा में भी बड़ी सफलता होगी।

महिला सशक्तिकरण के बिना समावेशी विकास अधूरा

किसी भी समाज की प्रगति महिलाओं की समान और सार्थक भागीदारी के बिना पूरी नहीं हो सकती। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देना समावेशी विकास की बुनियादी शर्त है। नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी महिला सशक्तिकरण को व्यापक विकास के दृष्टिकोण से जोड़ने की आवश्यकता रेखांकित हुई। सदस्य देशों के बीच महिला उद्यमिता, डिजिटल कौशल, वित्तीय समावेशन और रोजगार के क्षेत्र में अनुभव तथा सफल मॉडलों को साझा करना इस दिशा में उपयोगी कदम साबित हो सकता है।विशेष रूप से ग्रामीण और छोटे शहरों की महिलाओं को डिजिटल तकनीक, वित्तीय सेवाओं और बाजार से जोड़ना आर्थिक अवसरों का विस्तार कर सकता है। महिलाओं का सशक्तिकरण केवल उनकी व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समुदाय और अर्थव्यवस्था पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए महिला सशक्तिकरण को अलग पहल के बजाय विकास की मुख्यधारा का अभिन्न हिस्सा बनाना ही अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ प्रगति का आधार है।

शांति और संवाद की आवश्यकता

आज दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तनाव और संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे वातावरण में आर्थिक और सामाजिक विकास प्रभावित होता है। युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। ब्रिक्स की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो सकती है। यह ऐसा मंच बन सकता है जहां अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले देश संवाद के माध्यम से साझा समाधान तलाशें। शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है। शांति का अर्थ आर्थिक अवसर, सामाजिक सुरक्षा, खाद्य और ऊर्जा की उपलब्धता तथा नागरिकों के सम्मानजनक जीवन से भी है। इसलिए नई दिल्ली से ब्रिक्स का संदेश होना चाहिए कि वैश्विक समस्याओं का समाधान संवाद और कूटनीति से ही संभव है। टकराव से संसाधन नष्ट होते हैं, जबकि सहयोग से विकास के रास्ते खुलते हैं।

बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार

बदलती विश्व व्यवस्था और वैश्विक संस्थाओं की वर्तमान संरचना के बीच आज स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। विश्व की अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और शक्ति-संतुलन में व्यापक बदलाव आए हैं, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का ढांचा इन परिवर्तनों के अनुरूप पर्याप्त रूप से नहीं बदला है। विकासशील देशों की लंबे समय से यह अपेक्षा रही है कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी और प्रभाव को अधिक व्यापक बनाया जाए। संयुक्त राष्ट्र सहित अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग इसी व्यापक आवश्यकता से जुड़ी है।नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इस विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया। सम्मेलन के संदर्भ में भारत की भूमिका इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही कि उसने संस्थागत सुधार को टकराव के बजाय अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और संतुलित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण से जोड़ने पर जोर दिया। वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को आवाज देते हुए ब्रिक्स ने यह संदेश मजबूत किया कि बदलती दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी अधिक समावेशी और न्यायसंगत स्वरूप अपनाना होगा।

संस्कृति भी बन सकती है सहयोग का सेतु

राष्ट्रों के बीच संबंध केवल सरकारों और संस्थाओं से नहीं बनते। लोगों के बीच संपर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संस्कृति, भाषा, कला, योग, शिक्षा और पर्यटन देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता और सभ्यतागत विरासत उसकी सॉफ्ट पावर की बड़ी ताकत है। BRICS देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देकर लोगों के बीच बेहतर समझ विकसित की जा सकती है। जब विद्यार्थी एक-दूसरे के देशों में पढ़ते हैं, कलाकार एक-दूसरे के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं और पर्यटक अलग-अलग संस्कृतियों को समझते हैं, तब कूटनीतिक संबंधों को भी मानवीय आधार मिलता है।

आम नागरिक के जीवन से जुड़ना चाहिए ब्रिक्स

अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की चर्चा अक्सर राजनयिक भाषा और बड़ी घोषणाओं तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी भी वैश्विक मंच की वास्तविक सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन में कितना दिखाई देता है। यदि ब्रिक्स के सहयोग से नई तकनीक सस्ती होती है, युवाओं को रोजगार मिलता है, किसानों को बेहतर बाजार मिलता है, मरीजों को सस्ती दवाएं मिलती हैं, महिलाओं को आर्थिक अवसर मिलते हैं और स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार होता है, तभी इस सहयोग का वास्तविक अर्थ सामने आएगा। नई दिल्ली का सम्मेलन इसी मानवीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर किया गया है। विकास का अर्थ केवल बड़ी परियोजनाएं नहीं, बल्कि बेहतर जीवन है।

चुनौतियां भी कम नहीं

ब्रिक्स के सामने संभावनाएं जितनी व्यापक हैं, चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक हैं। सम्मेलन की चर्चाओं ने यह स्पष्ट किया कि सदस्य देशों की आर्थिक परिस्थितियां, राजनीतिक प्राथमिकताएं और रणनीतिक हित अलग-अलग हैं। ऐसे में हर मुद्दे पर एकमत होना आसान नहीं है और बड़े समूह में सहमति बनाने में समय लगना स्वाभाविक है। व्यापार, भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा नीति और तकनीकी मानकों जैसे क्षेत्रों में भी सदस्य देशों की प्राथमिकताओं में अंतर सामने आता है। हालांकि, सम्मेलन से यह भी स्पष्ट हुआ कि विविधता को कमजोरी के बजाय संवाद और सहयोग की ताकत बनाया जा सकता है। हर मुद्दे पर समान राय होना आवश्यक नहीं है; साझा हितों वाले क्षेत्रों की पहचान कर व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है। यही बहुपक्षीय कूटनीति की वास्तविक कसौटी है। मतभेदों को स्वीकार करते हुए संवाद बनाए रखना और असहमतियों के बीच भी सहयोग के रास्ते तलाशना। नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इसी संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण संदेश दिया।

नई दिल्ली से साझा भविष्य की ओर

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 को व्यापक दृष्टि से देखें तो यह केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में नई संभावनाओं और साझा समाधानों की तलाश का महत्वपूर्ण मंच रहा। भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन से आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय, तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों, ऊर्जा सुरक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय हितों के साथ वैश्विक सहयोग का संतुलित संदेश गया। भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ। सम्मेलन की चर्चाओं और भारत की पहल से यह स्पष्ट हुआ कि नेतृत्व का अर्थ केवल अपनी बात मनवाना नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों और हितों को साथ लेकर आगे बढ़ना भी है। संवाद, सहमति और सहयोग की संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में सम्मेलन के परिणाम भारत की कूटनीतिक क्षमता और उसकी समावेशी वैश्विक दृष्टि को रेखांकित करते हैं।

समस्या का निदान संवाद और साझेदारी से ही संभव

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 ने वैश्विक सहयोग, समावेशी विकास और साझा समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन ने रेखांकित किया कि 21वीं सदी की जटिल चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के प्रयास से नहीं, बल्कि संवाद, साझेदारी और बहुपक्षीय सहयोग से संभव है। विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना, तकनीक को अधिक सुलभ बनाना, स्वास्थ्य और शिक्षा को प्राथमिकता देना तथा महिलाओं और युवाओं के लिए नए अवसर पैदा करना इसी साझा दृष्टिकोण का हिस्सा है।सम्मेलन ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्थिक और तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है, जब उसके केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय जिम्मेदारी हो। बदलती विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स की प्रासंगिकता उसकी आर्थिक शक्ति के साथ इस बात से भी तय होगी कि वह वैश्विक समुदाय की आकांक्षाओं को कितना प्रभावी ढंग से समझकर समाधान प्रस्तुत करता है। नई दिल्ली से निकला साझा विकास और साझा भविष्य का यह संदेश टिकाऊ शांति तथा समावेशी वैश्विक व्यवस्था की मजबूत आधारशिला है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।