दीपावली: अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की शाश्वत यात्रा

  • दीपावली भारतीय संस्कृति का महापर्व है, जो इतिहास, आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना को एक सूत्र में पिरोता है।
  • दीपावली जीवन में सकारात्मकता, विवेक, सद्भाव और नई उम्मीदों का उजाला फैलाने की प्रेरणा देती है।
  • पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा और सामाजिक सद्भाव के संकल्प से ही दीपावली का उत्सव सार्थक बनता है।

अंधकार से भयभीत होना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन उसके बीच प्रकाश की तलाश करना उसकी चेतना का सर्वोच्च विकास है। दीपावली इसी शाश्वत मानवीय संकल्प का प्रतीक है, जो संदेश देती है कि अज्ञान का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, विवेक और पुरुषार्थ का एक छोटा-सा दीपक भी उसे दूर करने की शक्ति रखता है। भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन दीपावली का स्थान विशेष है। कार्तिक मास की अमावस्या की घोर अंधेरी रात करोड़ों दीपों की रोशनी से जगमगा उठती है। यह उजाला केवल घर-आंगन ही नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन को भी प्रकाशित करता है। दीपावली इतिहास, पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक समरसता और आर्थिक गतिविधियों का अनूठा संगम है। यह पर्व अज्ञान से ज्ञान, निराशा से आशा और जड़ता से चेतना की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी इसकी प्रासंगिकता और महत्ता बनी हुई है।

धर्म और मर्यादा की विजय का शाश्वत संदेश

दीपावली की जड़ें भारतीय इतिहास और पुराणों की गहराइयों में बहुत दूर तक फैली हुई हैं। इस पर्व से जुड़े कई प्रसंग इसकी महत्ता को बहुआयामी बनाते हैं। रामायण कालीन प्रसंग: त्रेता युग में चौदह वर्षों का वनवास काटकर, लंकापति रावण का वध कर और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ जब अयोध्या लौटे, तो अयोध्या वासियों ने अपने आराध्य के स्वागत में पूरी नगरी को दीपों से सजा दिया था। यह प्रकाश उत्सव असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर विनय की विजय का शाश्वत प्रतीक बन गया। श्रीराम के चरित्र में मर्यादा, कर्तव्य, सत्य और त्याग के जो मूल्य हैं, वे दीपावली को केवल एक दिन का उत्सव नहीं बल्कि जीवन जीने की कला बनाते हैं। महाभारत कालीन प्रसंग: महाभारत के अनुसार, पांडवों के तेरह वर्ष के वनवास और अज्ञातवास की अवधि पूर्ण होने पर कार्तिक अमावस्या के दिन ही उनके हस्तिनापुर लौटने की कथा मिलती है, जिसकी खुशी में प्रजा ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था।

युगों से जगमगाती दीपावली की परंपरा

पौराणिक कथाएं और समुद्र मंथन: क्षीर-सागर के मंथन के दौरान कार्तिक अमावस्या के दिन ही धन की देवी माता लक्ष्मी और आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि का प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिए इस दिन लक्ष्मी-पूजन के साथ स्वास्थ्य के प्रदाता धन्वंतरि की भी आराधना की जाती है। ऐतिहासिक, जैन और सिख परंपराएं: जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को इसी दिन बिहार के पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त हुआ था। जैन परंपरा में यह आत्मज्ञान, अहिंसा, संयम और अज्ञान से मुक्ति का प्रतीक है। वहीं सिख परंपरा में इसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन छठे गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को मुक्त कराकर लौटे थे, जो स्वतंत्रता और दूसरों के अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक है। खगोलीय और मौसमी दृष्टि: ज्योतिष और खगोल विज्ञान के अनुसार, कार्तिक अमावस्या ऋतु परिवर्तन का काल है। शरद ऋतु से हेमंत की ओर बढ़ते इस संक्रमण में पर्यावरण के सूक्ष्म जीवों और रोगाणुओं को नियंत्रित करने के लिए दीपकों की ऊष्मा और पूजन सामग्रियों का प्रयोग वैज्ञानिक रूप से भी लाभकारी माना गया है।

अनुष्ठानों का क्रम और सांस्कृतिक संदेश

दीपावली केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि पांच दिनों तक चलने वाला एक महापर्व है, जिसका हर दिन एक विशिष्ट सांस्कृतिक संदेश देता है। धनतेरस (धनत्रयोदशी): कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाने वाला यह दिन स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों का प्रतीक है। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के कारण इसे आयुर्वेद और स्वास्थ्य परंपरा से जोड़ा गया है। इस दिन बर्तन या उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा है, जो यह सिखाती है कि धन का उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए। नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली): भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की कथा से जुड़ी यह तिथि अत्याचार के अंत और स्वच्छता का संदेश देती है। दक्षिण भारत में इस दिन का विशेष महत्व है और मुख्य उत्सव इसी दिन मनाया जाता है। दीपावली (मुख्य महापूजन): अमावस्या की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का संयुक्त पूजन होता है। गणेश जी बुद्धि और विवेक के प्रतीक हैं, जबकि लक्ष्मी जी धन और संपदा की। संदेश यह है कि विवेक और ईमानदारी के बिना धन का सदुपयोग संभव नहीं है। गोवर्धन पूजा (अन्नकूट): दीपावली के अगले दिन प्रकृति के आधार, गोवर्धन पर्वत और गौमाता की पूजा की जाती है। यह पर्व मानव और प्रकृति के अटूट रिश्ते, पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक सहयोग का अनूठा उदाहरण है। भैया दूज (यम द्वितीया): भाई-बहन के पवित्र प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का यह पर्व पांच दिवसीय उत्सव का अत्यंत भावनात्मक समापन है।

देश के विभिन्न राज्यों में दीपावली की अनूठी परंपराएं

भारत के अलग-अलग राज्यों में दीपावली मनाने के तौर-तरीके भिन्न हैं, जो इस देश की सांस्कृतिक बहुलता को दर्शाते हैं। उत्तर भारत: भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी, आतिशबाजी और भव्य लक्ष्मी-गणेश पूजन का विशेष महत्व है। गुजरात: व्यापारी वर्ग द्वारा लक्ष्मी पूजा के साथ नए व्यापारिक वर्ष और नए बही-खातों की शुरुआत की जाती है। पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा: इस रात महाकाली की विशेष (महानिशा) पूजा का विधान है, जो शक्ति, साहस और नकारात्मक ऊर्जा के संहार का प्रतीक है। महाराष्ट्र और नेपाल: महाराष्ट्र में वसुबारस से शुरू होने वाले अनुष्ठान चलते हैं, वहीं नेपाल में ‘तिहार’ के रूप में पशुओं, प्रकृति और मानवीय रिश्तों को समर्पित कई दिनों के उत्सव मनाए जाते हैं।

स्थानीय कारीगरों की आजीविका

दीपावली केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक उल्लास का नाम नहीं है, यह देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा इंजन भी है। त्योहार के दौरान बाजारों में रौनक बढ़ती है और विभिन्न क्षेत्रों को गति मिलती है। कुम्हारों और हस्तशिल्पियों का अर्थशास्त्र: आधुनिक चकाचौंध और चाइनीज लाइटों के दौर के बीच, हाल के वर्षों में ‘वोकल फॉर लोकल’ और पारंपरिक मिट्टी के दीयों के प्रति लौटा जुनून एक बड़ा सकारात्मक बदलाव है। दीयों, मूर्तियों और हस्तनिर्मित उत्पादों के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के कारीगरों को रोजगार मिलता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। व्यापारिक गतिशीलता: कपड़े, मिठाइयां, आभूषण और घरेलू सामानों की मांग से छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े उद्योगों तक सभी को लाभ होता है। यदि उपभोक्ता स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें, तो यह आर्थिक चक्र समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है।

संयम और प्रकृति के संरक्षण के साथ मनाएं त्योहार

आधुनिक समय में दीपावली के दौरान पर्यावरण की सुरक्षा एक गंभीर विषय बन गया है। सतर्कता की जरूरत: तेज आवाज वाले पटाखे और अत्यधिक प्रदूषण हवा की गुणवत्ता को बिगाड़ते हैं तथा बच्चों, बुजुर्गों व पशु-पक्षियों के लिए कष्टकारी होते हैं। ग्रीन दीपावली की ओर कदम: समाज में अब ‘ग्रीन क्रैकर्स’, पारंपरिक मिट्टी के दीयों और प्राकृतिक रंगों से रंगोली बनाने का चलन बढ़ रहा है। त्योहार का आनंद लेते हुए प्रकृति को नुकसान न पहुंचाना ही सच्ची समझदारी है, क्योंकि दीपावली का मूल संदेश प्रकाश फैलाना है, प्रदूषण बढ़ाना नहीं।

डिजिटल परिवर्तन: परंपराओं का नया रंग-रूप

समय के साथ दीपावली के स्वरूप में बदलाव आया है। कभी हफ्तों पहले भेजे जाने वाले ग्रीटिंग कार्ड्स की जगह अब व्हाट्सएप संदेशों, डिजिटल ई-कार्ड्स और एआई-जनरेटेड शुभकामनाओं ने ले ली है। इसके बावजूद, आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। तकनीक ने दूरियों को जरूर कम किया है, लेकिन परिवार के साथ बैठकर समय बिताना, बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना और जरूरतमंदों की मदद करना जैसी मूल भावनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

दीपावली का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक संदेश

 

इस पर्व का सबसे गहरा संदेश उपनिषदों के महावाक्य “तमसो मा ज्योतिर्गमय” में निहित है अर्थात हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मन का मैल साफ करना: जिस प्रकार दीपावली से पहले घरों की सफाई की जाती है, उसी प्रकार मन के भीतर छिपे द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार और अज्ञान के कचरे को बाहर करना आवश्यक है। अंतःकरण की शुद्धि के बिना सच्ची समृद्धि और संतोष संभव नहीं है। सच्ची सफलता और मानवीय व्यवहार: दीपावली सिखाती है कि व्यक्ति की महानता केवल उसके धन से नहीं, बल्कि उसके अच्छे विचारों, संवेदनशीलता और समाज के प्रति उसके योगदान से तय होती है। यह पर्व अमीर-गरीब के भेद को मिटाकर सामाजिक समरसता का सेतु बनता है।

हर घर में जले एक नया दीप

दीपावली भारतीय संस्कृति का वह अनमोल रत्न है जिसमें इतिहास, धर्म, अध्यात्म, अर्थशास्त्र और सामाजिक सौहार्द एक सूत्र में पिरोए हुए हैं। श्रीराम की मर्यादा, माता लक्ष्मी का विवेकपूर्ण आशीर्वाद, भगवान महावीर का संयम और गुरु हरगोबिंद जी का स्वतंत्रता का संदेश इन सबका मूल उद्देश्य मनुष्य को बेहतर और संवेदनशील इंसान बनाना है। आज जब पूरा विश्व विभिन्न तनावों से जूझ रहा है, दीपावली हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देती है। आइए, इस दीपावली पर केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों और रिश्तों को भी रोशन करें। एक ऐसा दीप जलाएं जो अज्ञान को मिटाए, समाज में सद्भाव फैलाए और हर जरूरतमंद के जीवन में उम्मीद की नई किरण बनकर चमके। यही दीपावली का वास्तविक और परम उत्सव है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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