भारतीय कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। हालांकि, खेती उन परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनी हुई है, जिन पर किसान का नियंत्रण नहीं होता। सूखा, बाढ़, चक्रवात, ओलावृष्टि, कीट, रोग और बेमौसम बारिश कुछ ही घंटों में महीनों की मेहनत को बर्बाद कर सकती है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) कृषि जोखिमों के सामने किसानों को वित्तीय सुरक्षा और अधिक भरोसा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
फरवरी 2016 में शुरू की गई PMFBY की परिकल्पना एक स्पष्ट उद्देश्य के साथ की गई थी- यह सुनिश्चित करना कि प्राकृतिक और जलवायु संबंधी जोखिमों के कारण फसल को होने वाले नुकसान का पूरा वित्तीय बोझ किसानों को खुद न उठाना पड़े। पिछले एक दशक में यह योजना भारत के महत्वपूर्ण कृषि जोखिम-प्रबंधन तंत्रों में से एक बन गई है। शुरुआत से अब तक 92.46 करोड़ से अधिक किसान आवेदन बीमित किए जा चुके हैं, जबकि 26.33 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों के तहत 2.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान किया गया है। ये आंकड़े कृषि आजीविका की सुरक्षा के लिए सरकार के प्रयासों के व्यापक स्तर को दर्शाते हैं।
PMFBY की एक प्रमुख विशेषता इसकी वहनीयता है। किसान खरीफ खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए अधिकतम केवल 2 प्रतिशत, रबी खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत तथा वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत प्रीमियम का भुगतान करते हैं। शेष प्रीमियम पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी दी जाती है। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सरकारी सब्सिडी 90:10 के हिस्सेदारी पैटर्न के अनुसार दी जाती है। यह व्यवस्था सीमित वित्तीय संसाधनों वाले किसानों के लिए भी फसल बीमा को सुलभ बनाती है।
मोदी सरकार का दृष्टिकोण केवल वित्तीय मुआवजा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहा है। कृषि बीमा में तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया है, ताकि आकलन और दावों का निपटारा अधिक तेज, पारदर्शी और सटीक हो सके। नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल और डिजीक्लेम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट एग्री ऐप ने मैनुअल हस्तक्षेप को कम किया है और दावों की निगरानी को मजबूत किया है।
यस-टेक (YES-TECH Yield- Estimation System Based on Technology) और विंड्स (WINDS- Weather Information Network and Data System) जैसी तकनीक आधारित पहल विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। इनमें फसल उत्पादन के अनुमान और जोखिम के आकलन को बेहतर बनाने के लिए रिमोट सेंसिंग, मौसम संबंधी जानकारी और डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के नवाचार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि किसी भी बीमा व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल उसके कवरेज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वास्तविक दावों के आकलन और निपटारे की गति तथा निष्पक्षता भी महत्वपूर्ण होती है।
योजना के मानवीय प्रभाव को असम के नगांव जिले के छोटे किसान अनवर हुसैन के अनुभव से समझा जा सकता है। भारी बारिश से उनकी फसल को नुकसान पहुंचने के बाद पीएमएफबीवाई के तहत केवल 100 रुपये के प्रीमियम के आधार पर उन्हें 50,600 रुपये का मुआवजा मिला। इस सहायता से उन्हें अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी करने और अगले फसल मौसम में निवेश करने में मदद मिली। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि फसल बीमा केवल सरकारी आंकड़ा नहीं है। एक कमजोर स्थिति वाले किसान के लिए यह आत्मविश्वास के साथ खेती जारी रखने और कर्ज तथा आर्थिक संकट के चक्र में फंसने के बीच अंतर पैदा कर सकता है।
योजना की समावेशी प्रकृति भी महत्वपूर्ण है। PMFBY में कर्ज लेने वाले और गैर-कर्जदार दोनों किसान शामिल हैं तथा पात्र किरायेदार किसानों और बटाईदारों को शामिल करने का भी प्रावधान है। महत्वपूर्ण रूप से, पिछले एक दशक में योजना के तहत नामांकन कराने वाले किसानों में औसतन करीब 50 प्रतिशत गैर-कर्जदार किसान रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि फसल बीमा को केवल कृषि ऋण के विस्तार के रूप में नहीं, बल्कि वित्तीय सुरक्षा के एक स्वैच्छिक साधन के रूप में भी देखा जा रहा है।
राज्यों की बढ़ती भागीदारी भी योजना के ढांचे में विश्वास का संकेत देती है। आंध्र प्रदेश खरीफ 2022 में, झारखंड खरीफ 2024 में और पश्चिम बंगाल खरीफ 2026 में योजना में दोबारा शामिल हुए, जबकि बिहार ने रबी 2026-27 सत्र से पीएमएफबीवाई लागू करने का फैसला किया है। वर्तमान में खरीफ 2026 के लिए यह योजना 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की जा रही है।
योजना के नवीनतम आंकड़े इसके लगातार बढ़ते दायरे को दर्शाते हैं। 27 अगस्त 2026 तक खरीफ 2026 के तहत 241.38 लाख किसानों का बीमा किया जा चुका था, जिसमें 278.12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल था। केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में पीएमएफबीवाई के लिए 12,200 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो कृषि क्षेत्र के लिए सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किसान कल्याण पर जोर अब अधिक लचीली और तकनीक-सक्षम कृषि के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ा जा रहा है। पीएमएफबीवाई इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है। किफायती बीमा, सरकारी सब्सिडी, डिजिटल बुनियादी ढांचे, आधुनिक आकलन तकनीकों और शिकायत निवारण तंत्र को एक साथ जोड़कर यह योजना यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि प्राकृतिक आपदा किसी किसान परिवार के लिए स्वतः ही वित्तीय आपदा में न बदल जाए।
हालांकि, चुनौतियों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और अनिश्चितता बढ़ रही है, जिससे कृषि जोखिम प्रबंधन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए दावों का तेजी से निपटारा, किसानों के बीच अधिक जागरूकता, प्रभावी शिकायत निवारण और व्यापक भागीदारी लगातार प्राथमिकताएं बनी रहनी चाहिए।
भारत का कृषि भविष्य केवल उत्पादकता बढ़ाने पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि किसानों को उन जोखिमों से बचाने पर भी निर्भर करेगा, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं है। पीएमएफबीवाई इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी एक दशक लंबी यात्रा मोदी सरकार के उस प्रयास को दर्शाती है, जिसमें किसान को कृषि नीति के केंद्र में रखते हुए कल्याण को तकनीक, वित्तीय समावेशन और लचीलेपन के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है।
एक सुरक्षित किसान आत्मविश्वास के साथ खेती करता है और एक आत्मविश्वासी कृषक समुदाय मजबूत तथा आत्मनिर्भर भारत के लिए आवश्यक है। किसानों के लिए वित्तीय सुरक्षा तंत्र तैयार करके PMFBY ने केवल किसान कल्याण में योगदान देती है, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और अधिक लचीली कृषि अर्थव्यवस्था बनाने के व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य में भी योगदान देती है।


