इस सप्ताह अमेरिकी सीनेट की कृषि समिति में उर्वरक की बढ़ती कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर जोरदार बहस छिड़ी। सुनवाई के दौरान कई अमेरिकी सीनेटरों और किसानों ने भारत की भारी उर्वरक खरीदारी और सब्सिडी नीति का बार-बार जिक्र किया। कई सीनेटरों और औद्योगिक नेताओं ने सीधे तौर पर ग्लोबल उर्वरक व्यापार में भारत की बढ़ती भूमिका की ओर इशारा किया और देश को अंतरराष्ट्रीय कीमतों को तय करने वाले सबसे बड़े खरीदारों में से एक बताया।
द फर्टिलाइजर इंस्टीट्यूट के प्रेसिडेंट और सीईओ कोरी रोसेनबुश ने सीनेटरों को बताया कि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता भारत हाल ही में 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया का बड़ा टेंडर जारी कर चुका है, जिसकी कीमत लगभग 1,000 डॉलर प्रति मीट्रिक टन रही।
रोसेनबुश ने कहा, “भारत सरकार खुद उर्वरक खरीदती है और फिर किसानों को बढ़ती ग्लोबल कीमतों से बचाने के लिए उस पर भारी सब्सिडी देती है। यह नीति वैश्विक मांग और आपूर्ति के पैटर्न पर असर डाल रही है।”
अमेरिकी किसानों का क्या है कहना ?
अमेरिकी किसानों ने सुनवाई में बताया कि पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है और मुनाफा घट गया है। दक्षिण डकोटा के किसान ट्रेंट कुबिक ने कहा कि 2025 में उन्होंने अपने खेत में कोई फॉस्फेट नहीं डाला क्योंकि यह आर्थिक रूप से ठीक नहीं था।
केंटकी के किसान एडी मेल्टन ने बताया कि फरवरी से अनहाइड्रस अमोनिया की कीमत में 33%, यूरिया में 55% और लिक्विड नाइट्रोजन में 25% की बढ़ोतरी हुई है। कई सीनेटरों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और फूड सप्लाई से जुड़ा मुद्दा बताते हुए घरेलू उत्पादन बढ़ाने और बाजार की पारदर्शिता सुधारने की मांग की।
वैश्विक कारण
सुनवाई में भू-राजनीतिक तनाव, होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग रुकावटें, चीन की निर्यात पाबंदियां और निर्यात प्रतिबंधों को भी कीमत बढ़ने का बड़ा कारण बताया गया। रोसेनबुश ने कहा कि दुनिया के व्यापारिक यूरिया का 34% और सल्फर एक्सपोर्ट का आधा हिस्सा इसी रूट से गुजरता है।
भारत पर क्या असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। खाड़ी क्षेत्र में कोई बड़ी रुकावट या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में और बढ़ोतरी होने पर भारत सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है, जिसका असर किसानों की खेती की लागत पर पड़ सकता है। यह सुनवाई ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका में किसान बढ़ती इनपुट लागत, घटते मार्जिन और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। (इनपुट-एजेंसी)


