जब भी कोई आतंकी हमला होता है तो पाकिस्तान पहले इनकार करता है फिर बगलें झांकता है और अंत में बेनकाब हो ही जाता है। पहलगाम में हुए आतंकी हमले की जांच में NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) ने जिस तरह पाकिस्तान की साज़िश का पर्दाफाश किया उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पाकिस्तान न केवल आतंक का पोषक है बल्कि उसकी सेना खुद ‘आतंक-व्यवसाय’ की बैसाखियों पर टिकी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI लंबे समय से आतंकवादी संगठनों को पालती-पोसती रही है। अब यह केवल एक ‘रणनीतिक चाल’ नहीं रह गई है बल्कि यह पाकिस्तान की सत्ता संरचना और उसकी आंतरिक राजनीति को बनाए रखने का आवश्यक अंग बन चुका है। वहां के फौजी अफसरों के लिए आतंकवाद का समर्थन करना न केवल परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज बने रहने का तरीका है बल्कि उनके ‘कारोबार’ का हिस्सा भी है।
नाम, ठिकाने और नेटवर्क का खुलासा
पहलगाम हमले की जांच में NIA को जो सुराग मिले हैं वे चौंकाने वाले हैं। इस हमले में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों की सक्रिय भूमिका सामने आई है। केवल यहीं तक नहीं इन संगठनों को जो सटीक रणनीतिक और सैन्य प्रशिक्षण मिल रहा है, वह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान आर्मी के सहयोग के बिना संभव नहीं। NIA को कई तकनीकी सबूत मिले हैं- फोन कॉल्स की निगरानी, संदिग्ध ट्रांजैक्शन्स, और सीमापार से संचालित हैंडलर्स के निर्देश, जो साबित करते हैं कि पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों को पाकिस्तानी मिलिट्री इंटेलिजेंस की प्रत्यक्ष शह प्राप्त थी। जिन आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया उन्हें न केवल हथियारों की सप्लाई पाकिस्तान से हुई बल्कि हमले की साजिश और टारगेट सिलेक्शन में भी पाकिस्तानी मिलिट्री की सीधी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
आतंकवाद का सैन्यीकरण
यह प्रश्न अब बार-बार उठता है कि पाकिस्तान की सेना आतंकियों के हाथ की कठपुतली क्यों बन कर रह गई है? इसका जवाब उस गहरे राजनीतिक-आर्थिक गठजोड़ में छिपा है, जिसने पाकिस्तान को एक ‘आतंक प्रायोजक राष्ट्र’ में तब्दील कर दिया है। पाकिस्तान की सेना अब सिर्फ सीमा की रक्षा करने वाली संस्था नहीं रही बल्कि वह एक विशाल कॉरपोरेट साम्राज्य चला रही है।
आतंक के बल पर ‘फौजी कारोबार’
पाकिस्तान की सेना के पास आज खुद की रियल एस्टेट कंपनियां, बैंक, कंस्ट्रक्शन कंपनियां, FMCG और होटल चेन तक हैं। ये संस्थान Fauji Foundation, Army Welfare Trust, Shaheen Foundation जैसे नामों से चलाए जा रहे हैं। सेना के रिटायर्ड जनरल्स इन कंपनियों के चेयरमैन होते हैं और इनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सेना के शीर्ष अफसरों की जेब में जाता है। ऐसे में आतंकवाद का माहौल बनाए रखना, भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाना और कश्मीर में लगातार अशांति बनाए रखना सेना के इस कारोबारी मॉडल का हिस्सा बन चुका है। अगर सीमा शांत हो गई, आतंकवाद खत्म हो गया तो सेना की अहमियत भी खत्म हो जाएगी और उसका आर्थिक साम्राज्य भी खतरे में पड़ जाएगा।
‘डिप्लोमेसी’ नहीं, ‘डर’ की नीति?
इसके अलावा पाकिस्तानी सेना को असली ताकत विदेशी सहायता से मिलती है। अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों से मिलने वाली सैन्य और आर्थिक मदद का बड़ा हिस्सा आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को यह दिखाना होता है कि वह ‘आतंकी हमलों का शिकार’ है तो ISI और सेना मिलकर नकली हमलों की पटकथा रचते हैं और फिर वही हमले ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ के नाम पर मदद का बहाना बनते हैं।
हर मोर्चे पर पाकिस्तान बेनकाब
भारत अब पाकिस्तान के असली चेहरे को विश्व के सामने लाकर उसे मिलने वाली आर्थिक सहायता पर चोट करने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। कई देशों में भेजे गए ऑल पार्टी डेलीगेशन और हाल ही में IMF की तरफ से दी गई ग्रांट का विरोध इसका जीता जागता उदाहरण है। भारत की नीति अब रक्षात्मक नहीं, आक्रामक हो चुकी है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को यह एहसास हो भी गया है कि भारत अब हर हमले का जवाब देगा, सीमा पार भी। NIA जैसी संस्थाओं की प्रोफेशनल जांच और वैश्विक मंचों पर भारत की कूटनीति ने पाकिस्तान को लगातार घेरा है। अब दुनिया यह मानने लगी है कि पाकिस्तान न केवल आतंकवादियों को पनाह देता है, बल्कि उन्हें प्रशिक्षित कर भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के खिलाफ इस्तेमाल भी करता है।
एक अंतहीन चक्रव्यूह में फंसा देश
Financial Action Task Force (FATF) की ग्रे लिस्ट में पाकिस्तान का रहना उसके लिए एक निरंतर शर्मिंदगी का विषय बन चुका है। बार-बार पाकिस्तान वादे करता है कि वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करेगा लेकिन जैसे ही दुनिया का ध्यान हटता है, वह फिर पुराने ढर्रे पर लौट आता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत ने सबूतों के साथ पाकिस्तान को बेनकाब किया है, चाहे वह UN हो या G20 या SCO। भारत यह संदेश देने में कामयाब रहा है कि पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को सिर्फ एक दो संगठनों या चेहरों के जरिए समझना भूल होगी। यह एक बहुस्तरीय और बहुपक्षीय प्रणाली है जिसमें राजनीतिक दल, सेना, खुफिया एजेंसियां, धर्मगुरु और मीडिया तक शामिल हैं।
ISI: आतंक का मास्टरमाइंड
ISI ही वह संस्था है जो आतंकवाद का खाका तैयार करती है। उसके पास खास ‘टेरर मैनेजमेंट यूनिट्स’ होती हैं जो भर्ती, फंडिंग और ट्रेनिंग की जिम्मेदारी उठाती हैं।
सेना: ‘आउटसोर्स्ड वारफेयर’ का सरगना
पाकिस्तानी सेना आतंक को एक ‘लो-कॉस्ट वॉरफेयर’ की तरह देखती है। बिना किसी सीधी लड़ाई में शामिल हुए, सेना आतंकियों के जरिए अपने दुश्मनों को थकाना चाहती है।
राजनीतिक वर्ग: मौन समर्थन
पाकिस्तान के राजनीतिक दल, विशेषकर PML-N और PPP, सेना के इस आतंकवादी एजेंडे के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। क्योंकि वे जानते हैं कि सत्ता की चाबी रावलपिंडी (GHQ) के पास है, इस्लामाबाद के पास नहीं।
धार्मिक चरमपंथी: नैरेटिव की खाद
मौलवियों और मदरसों की पूरी एक श्रृंखला है जो युवाओं को ‘कश्मीर जिहाद’ के नाम पर भड़काते हैं। इनके पीछे फंडिंग भी उन्हीं चैनलों से आती है, जो सेना द्वारा नियंत्रित होते हैं।
अपने विनाश की पटकथा लिख रहा पाकिस्तान
पाकिस्तान भले ही अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है लेकिन भारत अब उस दौर में नहीं है जहां वह पाकिस्तान की चालबाजियों का जवाब सिर्फ निंदा प्रस्तावों से देता था। ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया है कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ न केवल रणनीतिक रूप से मजबूत है बल्कि नैतिक रूप से भी वैश्विक समर्थन प्राप्त कर रहा है। पाकिस्तान की सेना और ISI द्वारा चलाया जा रहा आतंकवाद का यह खेल अब लंबे समय तक छिपा नहीं रह सकता। पहलगाम हमले जैसी घटनाएं केवल हमले नहीं बल्कि सबूत हैं इस बात के कि पाकिस्तान का अस्तित्व अब आतंकवाद पर ही निर्भर हो चुका है। जब किसी राष्ट्र का अस्तित्व ही आतंक से जुड़ जाए तो वह राष्ट्र न केवल दूसरों के लिए खतरा होता है बल्कि अपने लिए भी विनाश की पटकथा लिख रहा होता है।
-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)


