मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के चलते फेडरल रिजर्व ने इंटरेस्ट रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। इसकी वजह मिडिल ईस्ट संकट की वजह से ग्लोबल एनर्जी की बढ़ती कीमत बताई जा रही है। जबकि पॉलिसी बनाने वालों ने इकोनॉमिक आउटलुक को लेकर बढ़ती अनिश्चितता की ओर इशारा किया है।
फेड चेयर जेरोम पॉवेल ने बुधवार (लोकल टाइम) को कहा कि सेंट्रल बैंक रोजगार दर बढ़ाने और कीमतों को स्थिर करने के अपने दोहरे काम पर फोकस कर रहा है, भले ही महंगाई “बढ़ गई है और बहुत ज्यादा है।”
पॉवेल ने कहा, “यूएस इकॉनमी अच्छी रफ्तार से बढ़ रही है,” उन्होंने कहा कि उपभोक्ता खर्च मजबूत बना हुआ है और बिजनेस इन्वेस्टमेंट मजबूत है। साथ ही, उन्होंने माना कि जॉब मिलने की रफ्तार हो गई है और हाउसिंग सेक्टर कमजोर बना हुआ है।
फेड ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर 3.5 से 3.75 प्रतिशत के बीच स्थिर रखी है, जो बढ़ती अनिश्चितता के बीच सतर्क रुख का संकेत है। पॉवेल ने कहा कि मध्य-पूर्व की स्थिति ने आर्थिक परिदृश्य को लेकर “उच्च स्तर की अनिश्चितता” पैदा कर दी है और निकट भविष्य में ऊर्जा कीमतें महंगाई को और ऊपर ले जाएंगी।
महंगाई के आंकड़े भी इसका संकेत दे रहे हैं। मार्च तक 12 महीनों में कुल पीसीई (पर्सनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर) महंगाई 3.5 प्रतिशत रही, जो तेल कीमतों में उछाल से प्रभावित है। वहीं, खाद्य और ऊर्जा को छोड़कर कोर महंगाई 3.2 प्रतिशत पर रही।
हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब भी अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है, लेकिन पॉवेल ने माना कि इस तेल झटके का असर दुनिया भर में समान नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर इसका प्रभाव पश्चिम यूरोप और एशिया की तुलना में कम है, जहां ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भरता है।
पॉवेल ने स्पष्ट किया कि फेड फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव के लिए जल्दबाजी नहीं करेगा। “मौद्रिक नीति पहले से तय रास्ते पर नहीं है,” उन्होंने कहा, यह जोड़ते हुए कि आगे के फैसले आने वाले आंकड़ों और जोखिमों के आधार पर लिए जाएंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा झटके अक्सर अस्थायी होते हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति अप्रत्याशित बनी हुई है। “यह अभी अपने चरम पर भी नहीं पहुंचा है,” उन्होंने तेल कीमतों के संदर्भ में कहा।
अमेरिकी श्रम बाजार फिलहाल स्थिर है, जहां बेरोजगारी दर 4.3 प्रतिशत है, हालांकि नौकरियों की वृद्धि की गति धीमी पड़ी है। उपभोक्ता खर्च, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है अब भी मजबूत बना हुआ है, लेकिन ईंधन कीमतों में लगातार वृद्धि इसका दबाव बढ़ा सकती है।
पॉवेल ने चेतावनी दी कि पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से लोगों की जेब पर असर पड़ेगा और वे अन्य चीजों पर खर्च कम कर सकते हैं। इसके बावजूद, अभी तक खर्च में किसी बड़े गिरावट के संकेत नहीं मिले हैं।
फेड का “इंतजार और निगरानी” वाला रुख इस बात को दर्शाता है कि ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता कितने समय तक बनी रहती है। वैश्विक स्तर पर, महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और व्यापार तनाव के बाद यह नया तेल झटका केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई से निपटने की चुनौती को और जटिल बना रहा है।
एशिया के कई देशों के लिए जो बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल व्यापार घाटे को बढ़ा सकता है और घरेलू महंगाई को तेज कर सकता है, जिससे आर्थिक विकास पर दबाव पड़ने की आशंका है।
(इनपुट-आईएएनएस)


