क़ौम की भलाई या वक्फ क़ानून की लड़ाई?

क़ौम की भलाई या वक्फ क़ानून की लड़ाई? दिल पर हाथ रख कर ये सवाल पूछे हर वतन परस्त मुसलमान!

इस देश में हर सुधार को हिन्दू-मुस्लिम के रंग में क्यों रंग दिया जाता है? क्या इस्लाम के अनुयायी इतने भोले हैं कि वे आसानी से बहकावे में आ जाते हैं? किसी भी ऐसे मुद्दे पर जिसका आम मुस्लिम और इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, क्या उन्हें भड़काया जा सकता है? ऐसे मामले जिनसे उनकी धार्मिक मान्यताओं पर कोई असर नहीं होता हो, क्या ऐसे मुद्दों पर भी मुस्लिम नागरिकों को बहकाया जा सकता है? शायद अब वक्त आ गया है कि क़ौम और आगे आने वाली नस्लों की बेहतरी चाहने वाले हर वतन परस्त मुसलमान को अपने दिल पर हाथ रख कर ये सोचना चाहिए।

राजनीतिक स्वार्थ

आज़ादी के समय से तत्कालीन राजनीतिक दलों और उनके नेताओं द्वारा अपने राजनीतिक हितों के लिए देश के मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पैदा की गई है। जबकि आम हिन्दुस्तानी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि देश में कौन-कौन रहता है और क्या करता है, जब तक कि उसका खुद का अस्तित्व खतरे में नहीं आ जाता।

आज़ादी के बाद की असुरक्षा

आज़ादी के बाद के वर्षों में अपने राजनीतिक हितों के लिए पैदा की गई असुरक्षा ही अभी तक देश में दंगों और झगड़ों की वजह रही है। देश के पुराने धार्मिक मुद्दों पर नागरिकों की भावनाओं का इस्तेमाल कर, उसे हवा देकर एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाया जाता रहा है। ऐसे मुद्दे जिनसे आम मुसलमानों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, उन्हें भी धार्मिक मुद्दा बनाकर देश और बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ भड़काया जाता रहा है।

इतनी आक्रामकता क्यों?

देश में रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण भड़की भावनाओं पर हम सभी हिन्दूवादी संगठनों की आलोचना करते थे। ऐसे मुद्दे को देश की प्रगति के विरुद्ध मानते थे लेकिन जैसे-जैसे जमीनी हकीकत से सामना होता रहा और दोनों पक्ष के नेताओं से कानून व्यवस्था को लेकर अनुभव होते रहे तब महसूस हुआ कि कुछ मुद्दे जैसे वक्फ इत्यादि ऐसे हैं जिनका मुस्लिम अस्तित्व, मुस्लिम धर्म, मुस्लिम अस्मिता पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ऐसे में सवाल आता है कि जब कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं तो इतनी आक्रामकता क्यों?

सिर्फ़ सामाजिक मंचों पर कटुता

आज़ादी के इतने वर्षों बाद जब देश के मुसलमान इस देश की सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था में इतने घुले-मिले हुए हैं। देश के हर हिस्से में हिन्दू साथियों के साथ रह रहे हैं, काम धंधे भी कर रहे हैं तो फिर सामाजिक प्लेटफॉर्म्स पर इतनी कटुता क्यों दिखाई देती है? जबकि आम हिन्दू बहुत ही सहनशील, मिलजुलकर रहने वाला, अहिंसा में विश्वास रखने वाला है। उसके आम जीवन में कभी इस प्रकार की कटुता दिखाई भी नहीं देती है।

सरकारी व्यवस्था में कोई भेद नहीं

प्रशासनिक स्तर पर वर्तमान एनडीए सरकार में गरीब मुस्लिम की भी सभी कल्याणकारी योजनाओं में बराबरी की हिस्सेदारी है। किसी भी स्तर पर उनके प्रति सरकारी व्यवस्था में कोई भेदभाव नहीं है और न ही भेदभाव का कोई संदेश है। फिर उनके हित और लाभ के लिए बन रहे कानूनों के खिलाफ इतना विरोध क्यों?

तुष्टिकरण के लिए दोहरी मानसिकता

इससे एक बात तो स्पष्ट है कि देश के कुछ राजनीतिक दल मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर काम कर रहे हैं और झूठ बोल कर बिना आधार के मुद्दे खड़े करने की कोशिश कर रहे हैं। कई नेताओं ने तो संसद में वक्फ बिल पर कुछ भी नहीं बोला लेकिन यही लोग सार्वजनिक मंचों से झूठ बोल कर आम मुस्लिम को उकसा रहे हैं।

कांग्रेस के DNA में बंटवारा करना

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें देश के बंटवारे के समय उत्पन्न हुई परिस्थितियों को समझना होगा। इन्हीं परिस्थितियों ने देश में इस प्रकार की भावनाओं को जन्म दिया है। जब देश का बंटवारा हो रहा था तो एक नेता की महत्त्वाकांक्षा और प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने मुस्लिम तुष्टिकरण नामक एक ऐसी बीमारी को जन्म दिया जो अब कांग्रेस के DNA में घुस चुकी है। उनके पदचिन्हों पर चलते हुए क्षेत्रीय पार्टियां उनसे भी आगे निकल चुकी हैं।

गांधी और पटेल की समझदारी से बचा देश

पं. नेहरू देश के विभाजन के समय इस सीमा तक पहुँच गए थे कि वह पूरा बंगाल, पूरा पंजाब और असम भी पाकिस्तान को देने के लिए सहमत हो चुके थे। महात्मा गांधी और सरदार पटेल की समझदारी और दृढ़दृष्टि से आधा बंगाल, आधा पंजाब और पूरा असम बच पाया। देश को बांटने की यही मानसिकता पूरे परिवार के DNA में है।

तुष्टिकरण से मुस्लिमों का ही नुकसान

कांग्रेस ही असल में सबसे बड़ी सांप्रदायिक पार्टी है। यह पार्टी मुसलमानों के ग़ैर धार्मिक मुद्दों को भी धार्मिक बनाकर नफरती राजनीति कर रही है और देश में हिन्दू-मुस्लिम के बीच की खाई को और बड़ा कर रही है। सामाजिक सुधार के लिए भी किए जा रहे प्रयासों को धार्मिक रंग देकर ये लोग मुसलमानों का सबसे अधिक नुकसान कर रहे हैं।

चंद लोगों को ही लाभ

मेरा ख़ुद का अनुभव रहा है कि आम मुसलमान वक्फ के मुतावल्लियों से ज़्यादा परेशान है। मुतवल्ली संपत्तियों को वक्फ के काम जैसे यतीमखाने, मदरसे, स्कूल, अस्पताल के लिए वक्फ की आय का इस्तेमाल न करके उसे अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए खुद-बुद कर रहे हैं, जिसके कारण आम मुसलमान को ही सबसे ज़्यादा नुकसान है। गरीब मुसलमान इस बात की शिकायत भी करता है लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती।

बिल में संशोधन से पारदर्शिता

अब ऐसे में यदि वक्फ की संपत्तियों के रखरखाव के लिए पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार कोई बिल लेकर आई है तो उसे मुसलमानों पर हमला कैसे कहा जा सकता है? ऐसा तो वही कह सकते हैं, जिन्हें वक्फ के बुरे प्रबंधन से लाभ हो रहा है। ऐसे चंद लोग ही मुस्लिम समुदाय का शोषण कर रहे थे। पूरे बिल में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके आधार पर सरकार कोई संपत्ति ले ले। फिर भी झूठ बोल बोल कर मुसलमानों के रहनुमा बनने की मुहिम चली आई है।

संशोधन से मुसलमानों को लाभ

देश के मुसलमानों को सरकार का धन्यवाद करना चाहिए कि देश में उनकी वक्फ की संपत्तियों के प्रबंधन के लिए नया कानून लाया गया है। सरकार चाहती तो देश में एक समान आचार संहिता की दिशा में वक्फ को भी हिन्दू चैरिटी एक्ट के साथ मिला कर देश में एक कॉमन चैरिटी एक्ट ला सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और पुराने वक्फ बिल की भावना को सुरक्षित रखते हुए केवल संपत्ति प्रबंधन की व्यवस्था को बेहतर करने के लिए संशोधन किए गए हैं। ऐसे में इसे मुसलमानों और उनकी संपत्ति पर हमला बताना इस सदी का सबसे बड़ा झूठ है।

बिल का मूल चरित्र बरकरार

माननीय उच्चतम न्यायालय में मुकदमा दाखिल करने की कवायद भी मुस्लिम समाज को बरगला कर अपने आप को उनका सबसे बड़ा ख़ैर-ख़्वाह साबित करने और मुकदमे के नाम पर धन इकट्ठा करने की एक कोशिश है। बिल में संशोधन के खिलाफ न्यायालय से कोई भी राहत मिलने की उम्मीद कम है, क्योंकि बिल का मूल चरित्र बरकरार है। इसमें सिर्फ़ संशोधन किया गया है। ऐसे में न्यायालय के लिए भी इसमें हस्तक्षेप करने का कोई बड़ा आधार दिखाई नहीं देता।

पैसा बटोरने का ज़रिया है ऐसे आंदोलन

मुझे याद है कि रामजन्मभूमि पर मंदिर बनने से पहले एक नेताजी घोषणा करके हर साल 6 दिसंबर को अयोध्या बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कूच का ऐलान करते थे। इसके लिए मुस्लिम समुदाय से, विशेषकर अरब देशों से पैसा माँगते थे। 6 दिसंबर को सुबह गाज़ियाबाद पुलिस को अपना कार्यक्रम बताते थे और गाज़ियाबाद से वापस आ जाते थे। इस बार का वक्फ विरोधी आंदोलन और कोर्ट में एप्लिकेशन लगाने की कवायद भी कुछ इसी प्रकार का प्रयास है।

अपने दिल पर हाथ रख कर पूछे वतन परस्त मुसलमान

अब यह देश और क़ौम के लिए सोचने वाले मुसलमानों को तय करना है कि क्या वे वक्फ को आदरणीय पैगंबर और कुरान शरीफ में दिए गए सिद्धांतों के अनुसार क़ौम के भले के लिए चलाने वाली व्यवस्था चाहते हैं या वक्फ को लूट खसोट का अड्डा बन कर कुछ लोगों के हाथ में रहने देना चाहते हैं? यह भी देखें कि जो बड़े वक्फ बेवाओं, यतीमों और गरीबों की मदद के लिए बनाए गए, उनका ज़मीन पर क्या हाल है, मुतवल्लियों द्वारा कितने बेच दिए गए और पैसा किसी रसूख वाले की जेब में तो नहीं गया? यहां तक कि क़ब्रिस्तान भी बेच दिए गए और अब वही रसूख़ वाले क़ौम को झूठ बोल कर गुमराह कर रहे हैं और क्या वजह है कि क़ौम की भलाई की सोच वाले मुसलमानों ने नए वक्फ बनाने छोड़ दिए हैं? यदि वक्फ पारदर्शिता और नियम से नहीं चले तो ग़रीब पसमांदा मुसलमानों के बच्चे परवरिश और पढ़ाई के लिए दर-दर भटकते रहेंगे।

इसलिए सभी अच्छी सोच वाले मुसलमानों को आगे आकर बोलना चाहिए और किसी के लिए नहीं तो क़ौम के ग़रीबों के लिए, यतीमों के लिए, ग़रीब बच्चों के लिए बोलना चाहिए और सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के आधार पर चल रही सरकार का समर्थन करना चाहिए।

(लेखक फ़ौज़न अ़वी, इंडियन माइनॉरटी फाउंडेशन से जुड़े हैं)