ग्वालियर में कपड़ों का कचरा अब सिर्फ लैंडफिल तक पहुंचने वाला अपशिष्ट नहीं, बल्कि युवाओं की रचनात्मकता, महिलाओं की भागीदारी और प्रशासनिक प्रयासों से ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ की नई कहानी लिख रहा है। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U) 2.0 के तहत ग्वालियर नगर निगम ने वस्त्र अपशिष्ट को संसाधन में बदलने की दिशा में पहल तेज की है। शहर में युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों को जोड़कर पुराने कपड़ों के पुन: उपयोग, रीसाइक्लिंग और उनसे उपयोगी उत्पाद तैयार करने का काम किया जा रहा है। लक्ष्य है कि ग्वालियर को ‘जीरो वेस्ट सिटी’ की दिशा में आगे बढ़ाते हुए वस्त्र अपशिष्ट का एक भी धागा लैंडफिल तक न पहुंचे।
कचरे में रोजाना पहुंचता है टनों कपड़ा
ग्वालियर शहर से रोजाना करीब 500 से 550 टन ठोस कचरा निकलता है। इसमें पुराने कपड़े और कपड़ों की कतरन भी शामिल होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुल कचरे में वस्त्र अपशिष्ट की हिस्सेदारी करीब 1.12% से 5.54% तक हो सकती है। इस आधार पर रोजाना करीब 5 से 30 टन तक कपड़ा कचरा लैंडफिल या डंपिंग साइट की ओर जा सकता है। सिंथेटिक और पॉलिएस्टर जैसे पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण इस तरह के कपड़ों को प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में लंबा समय लगता है। ऐसे में इनके पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग की जरूरत और बढ़ जाती है।
युवाओं ने कचरे को फैशन में बदला
ग्वालियर नगर निगम ने वस्त्र अपशिष्ट को नई उपयोगिता देने के लिए स्थानीय युवा डिजाइनर्स को भी इस अभियान से जोड़ा है। ऋतुवा कॉउचर की रिया शर्मा जैसे युवा डिजाइनर्स के साथ मिलकर ‘शून्य-फ्रॉम वेस्ट टू वर्थ’ परियोजना को आगे बढ़ाया गया। इसका विजन ‘लैंडफिल से हथकरघे तक’ और ‘कतरन से कलाकृति’ रखा गया। इसके तहत घरों और डंपिंग साइट से एकत्र किए गए बेकार कपड़ों को रचनात्मक डिजाइन के जरिए जैकेट और आधुनिक ट्राउजर जैसे परिधानों में बदला गया।
डेढ़ से दो साल के कपड़ों से तैयार हुए परिधान
इस पहल में करीब डेढ़ से दो साल की अवधि में जमा किए गए कपड़ों के टुकड़ों को इस्तेमाल किया गया। इन्हें व्यवस्थित तरीके से जोड़कर करीब चार महीने की मेहनत के बाद नए परिधान तैयार किए गए। इस पहल ने यह संदेश दिया कि फैशन और डिजाइन की रचनात्मकता के जरिए ऐसे कपड़ों को भी नया जीवन दिया जा सकता है, जिन्हें आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है। नगर निगम ने इस पहल पर आधारित ‘शून्य’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी तैयार की है।
आरआरआर केंद्रों से बढ़ी 3R की पहुंच
ग्वालियर नगर निगम ने वस्त्र अपशिष्ट प्रबंधन में ‘रिड्यूस, रीयूज़ और रीसाइकल’ यानी 3R की अवधारणा को अपनाया है। इसके तहत शहर के अलग-अलग हिस्सों में छह स्थायी आरआरआर केंद्र स्थापित किए गए हैं। विशेष स्वच्छता अभियानों के दौरान इनकी संख्या बढ़ाकर 18 से 20 तक की जाती है। इन केंद्रों पर नागरिक पुराने और इस्तेमाल में न आने वाले कपड़े जमा कर सकते हैं, जिसके बाद उनकी छंटाई की जाती है।
जरूरतमंदों तक पहुंचते हैं इस्तेमाल लायक कपड़े
छंटाई के दौरान अच्छी स्थिति वाले कपड़ों को साफ करने के बाद ‘स्लम हाट’ या ‘नेकी की दीवार’ के माध्यम से जरूरतमंद परिवारों तक नि:शुल्क पहुंचाया जाता है। इस व्यवस्था से एक ओर पुराने कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल होता है, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद लोगों को उपयोगी वस्त्र उपलब्ध होते हैं। इस तरह कचरा प्रबंधन को सामाजिक सरोकार से भी जोड़ा गया है।
महिला समूहों को मिला रोजगार का अवसर
जो कपड़े पहनने लायक नहीं होते, उन्हें नगर निगम की देखरेख में काम कर रहे महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाता है। महिलाओं को प्रशिक्षण देकर पुराने कपड़ों से थैले तैयार करने की पहल की गई है। इसके तहत 50 हजार थैले बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इन थैलों को स्थानीय बाजारों और स्कूलों में वितरित कर प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
केदारपुर में तकनीक से होगी कचरे की छंटाई
वस्त्र अपशिष्ट प्रबंधन को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए ग्वालियर में प्रसंस्करण की तकनीकी क्षमता भी विकसित की जा रही है। मुख्य लैंडफिल साइट पर 250 टन प्रतिदिन क्षमता की सूखा कचरा प्रसंस्करण इकाई काम कर रही है। वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों के अनुरूप केदारपुर में करीब 75.27 करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक कचरा प्रसंस्करण और मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) तैयार की जा रही है।
अलग किए गए कपड़े जाएंगे रीसाइक्लिंग के लिए
एमआरएफ में स्वचालित मशीनों की मदद से मिश्रित कचरे से कपड़ों को अलग किया जाएगा। अलग किए गए वस्त्र अपशिष्ट को पंजीकृत रीसाइक्लिंग वेंडर्स तक पहुंचाया जाएगा। वहां इनका इस्तेमाल उद्योगों में सफाई के कपड़े और इंसुलेशन सामग्री जैसे उत्पाद तैयार करने के लिए किया जा सकेगा। इससे कपड़ा कचरा लैंडफिल में जाने के बजाय दोबारा उत्पादन चक्र का हिस्सा बन सकेगा।
पुराने कचरे के ढेर से भी मिली राहत
केदारपुर साइट पर वर्षों से जमा करीब 6.03 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे के ढेर को भी वैज्ञानिक तरीके से हटाने का काम किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें करीब 90% कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जा चुका है। यह प्रयास लैंडफिल के दबाव को कम करने के साथ शहर की स्वच्छता और पर्यावरणीय स्थिति सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बनी ताकत
ग्वालियर की पहल की खासियत यह है कि इसमें नगर निगम की प्रशासनिक व्यवस्था के साथ युवाओं की रचनात्मकता, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों और आम नागरिकों की भागीदारी को एक साथ जोड़ा गया है। पुराने कपड़ों को फैशन उत्पादों में बदलने से लेकर जरूरतमंदों तक उपयोगी कपड़े पहुंचाने और अनुपयोगी वस्त्रों से थैले बनाने तक, अलग-अलग स्तरों पर कचरे को संसाधन में बदलने की कोशिश की जा रही है।
‘जीरो वेस्ट सिटी’ की ओर ग्वालियर
ग्वालियर का लक्ष्य शहर को ‘जीरो वेस्ट सिटी’ के रूप में विकसित करना है। इसके लिए वस्त्र अपशिष्ट को स्रोत से अलग करने, उसका पुन: उपयोग करने और रीसाइक्लिंग तक पहुंचाने की व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। यह पहल बताती है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, युवाओं की रचनात्मकता और जनभागीदारी मिलकर कचरे को पर्यावरणीय चुनौती से आर्थिक और सामाजिक अवसर में बदल सकती है। (इनपुट: पीआईबी)


