भारत का नारियल क्षेत्र ग्रामीण आजीविका, कृषि विकास और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण आधार है। करीब 10 मिलियन किसानों सहित लगभग 30 मिलियन लोग इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। भारत वैश्विक नारियल उत्पादन में पहले स्थान पर है और देश में केरलम क्षेत्रफल, तमिलनाडु उत्पादन तथा आंध्र प्रदेश उत्पादकता के मामले में आगे है। पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़ते हुए भारत का नारियल निर्यात अब वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल दूध और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे मूल्य-वर्धित उत्पादों तक पहुंच गया है। सरकार, मुख्य रूप से नारियल विकास बोर्ड के माध्यम से, खेती, उत्पादकता, प्रसंस्करण, निर्यात और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई योजनाएं लागू कर रही है। वर्ष 2025-26 में करीब 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र नारियल की खेती के तहत लाया गया और 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र का जीर्णोद्धार किया गया। केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘नारियल संवर्धन योजना’ की घोषणा के साथ क्षेत्र को सतत और मूल्य-वर्धित विकास की नई दिशा मिली है।
नारियल: आजीविका और सांस्कृतिक धरोहर
‘कल्पवृक्ष’ यानी जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित नारियल भारत की विरासत, संस्कृति और कृषि अर्थव्यवस्था में गहराई से रचा-बसा है। इसके बहुआयामी उपयोगों के कारण इसे हजारों उपयोगों वाला वृक्ष भी कहा जाता है। नारियल से भोजन, पेय, औषधि, रेशा, इमारती लकड़ी, ईंधन और कई प्रकार के कच्चे माल मिलते हैं। इससे परिवारों की आजीविका के साथ-साथ पारंपरिक गतिविधियों और मूल्य-वर्धित उद्योगों को भी आधार मिलता है।
करीब तीन हजार साल पुराना खेती का इतिहास
भारत में नारियल की खेती का लगभग तीन सहस्राब्दियों का सुव्यवस्थित इतिहास रहा है। आज यह ग्रामीण रोजगार और आर्थिक संबल का महत्वपूर्ण स्रोत है। करीब 10 मिलियन किसानों सहित लगभग 30 मिलियन लोग इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों द्वारा की जाने वाली नारियल की खेती समावेशी विकास और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है।
बस्तर में नारियल बना आजीविका का विकल्प
छत्तीसगढ़ के बस्तर पठार में किसान पारंपरिक रूप से धान, मोटे अनाज, मक्का और लघु वनोपज पर निर्भर रहे हैं। नारियल विकास बोर्ड के डीएसपी फार्म, कोंडागांव के प्रयासों से क्षेत्र में नारियल की खेती धीरे-धीरे एक आशाजनक आजीविका विकल्प के रूप में उभर रही है।
2,500 पेड़ों से बहुस्तरीय खेती का मॉडल
बकावंड ब्लॉक के 36 वर्षीय एमबीए स्नातक ईशांश सिंह राठौर इसका उदाहरण हैं। किसान परिवार से आने वाले राठौर ने कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम करने के बाद बोर्ड से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर नारियल की खेती शुरू की। उन्होंने करीब 2,500 नारियल के पेड़ लगाए, जिनमें मुख्य रूप से बौनी किस्में शामिल हैं। इनमें करीब 500 पेड़ों से उत्पादन शुरू हो चुका है। उन्होंने बहुस्तरीय फसल प्रणाली अपनाते हुए नारियल के बागान में 4,000 अनानास, 800 ड्रैगन फ्रूट, 1,000 आम, 600 सिट्रस के पौधों के साथ केला, अमरूद, पपीता, लीची, कॉफी, स्ट्रॉबेरी और मौसमी सब्जियों की खेती भी शुरू की। इस विविधीकृत मॉडल से भूमि की उत्पादकता बढ़ी और आय के कई स्रोत बने। फार्म से नारियल की खेती से सालाना करीब 5-6 लाख रुपए और अंतर-फसलों से लगभग 10 लाख रुपए की अतिरिक्त आय हुई। उनकी सफलता ने बस्तर के अन्य किसानों को भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
वैश्विक नारियल उत्पादन में भारत पहले स्थान पर
भारत वैश्विक नारियल उत्पादन में पहले और खेती के क्षेत्रफल के मामले में तीसरे स्थान पर है। वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 31.24% और क्षेत्रफल में 17.90% है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत ने 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से करीब 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन किया। औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।
केरलम क्षेत्रफल, तमिलनाडु उत्पादन में आगे
देश में केरलम में नारियल की खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र है। यहां करीब 7.54 लाख हेक्टेयर में नारियल की खेती होती है और लगभग 5,149.87 मिलियन नारियल का उत्पादन होता है। तमिलनाडु उत्पादन में सबसे आगे है, जबकि आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक उत्पादकता दर्ज की गई है। इसके बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का स्थान है।
नारियल निर्यात 7,038 करोड़ रुपए के पार
भारत का नारियल क्षेत्र अब प्राथमिक उत्पादन से आगे बढ़कर कृषि निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। वर्ष 2025-26 में नारियल उत्पादों का निर्यात 7,038.35 करोड़ रुपए यानी 794.70 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह 4,349.03 करोड़ रुपए के पिछले स्तर की तुलना में करीब 62% की वृद्धि है। वर्ष 2001-02 में नारियल उत्पादों का निर्यात सिर्फ 25.3 करोड़ रुपए था।
पारंपरिक उत्पादों से मूल्य-वर्धित उत्पादों तक विस्तार
भारत का नारियल निर्यात पहले मुख्य रूप से शेल चारकोल, नारियल तेल, कच्चे नारियल और सूखे नारियल जैसे पारंपरिक उत्पादों तक सीमित था। अब निर्यात सूची में वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल दूध, नारियल पानी और अन्य मूल्य-वर्धित उत्पाद शामिल हो गए हैं। भारत के बाजार मध्य पूर्व से आगे बढ़कर यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच चुके हैं।
अमेरिका और यूएई प्रमुख बाजार
पिछले पांच वर्षों में अमेरिका, यूएई, श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, यूके और नीदरलैंड प्रमुख व्यापारिक साझेदार बने हैं। प्रमुख निर्यात उत्पादों में एक्टिवेटेड कार्बन, नारियल तेल, ताजा या जमा/कद्दूकस किया हुआ नारियल, कोपरा और सूखा नारियल शामिल हैं। इनमें एक्टिवेटेड कार्बन निर्यात मात्रा के लिहाज से लगातार प्रमुख उत्पाद रहा है।
नारियल विकास बोर्ड की अहम भूमिका
12 जनवरी 1981 को स्थापित नारियल विकास बोर्ड कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है। कोच्चि मुख्यालय वाला बोर्ड 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नारियल क्षेत्र के विकास और कायाकल्प के लिए काम कर रहा है। इसके प्रमुख लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का उत्पादन बढ़ाना, नारियल का रकबा बढ़ाना, मौजूदा बागानों की उत्पादकता सुधारना, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा उत्पाद विविधीकरण और उप-उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देना हैं। वर्ष 2025-26 में बोर्ड की गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए 147.21 करोड़ रुपए जारी किए गए।
कोपरा एमएसपी से किसानों को सहारा
कोपरा न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के तहत शामिल 22 अनिवार्य कृषि फसलों में से एक है। भारत में मुख्य रूप से मिलिंग कोपरा और बॉल कोपरा का उत्पादन होता है। मिलिंग कोपरा का उपयोग मुख्य रूप से तेल निकालने के लिए किया जाता है, जबकि बॉल कोपरा का इस्तेमाल सूखे मेवे और धार्मिक कार्यों में होता है। नेफेड और नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन (एनसीसीएफ) कोपरा खरीद के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसियां हैं। राज्य स्तरीय एजेंसियां भी खरीद प्रक्रिया में सहयोग करती हैं।
2026 सीजन में बढ़ा कोपरा एमएसपी
2026 सीजन के लिए मिलिंग कोपरा का एमएसपी 12,027 रुपए प्रति क्विंटल और बॉल कोपरा का एमएसपी 12,500 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है। यह 2025 के मुकाबले मिलिंग कोपरा में 445 रुपए और बॉल कोपरा में 400 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि है। बढ़ा हुआ एमएसपी किसानों को लाभकारी मूल्य देने और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री पर जोर
सरकार नारियल विकास बोर्ड के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की उपलब्धता बढ़ाने, खेती का विस्तार करने, उत्पादकता सुधारने, तकनीक अपनाने और बाजार विकास के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है। इनमें बीज उत्पादन फार्म, बीज उद्यान, नर्सरी और गुणवत्ता प्रमाणन जैसी पहल शामिल हैं।
डीएसपी फार्म में 2.41 लाख पौधे तैयार
प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्म वैज्ञानिक नारियल खेती के तरीकों का प्रदर्शन करने के साथ व्यावसायिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करते हैं। वर्ष 2025-26 में देशभर के 11 डीएसपी फार्मों में 2.41 लाख गुणवत्तापूर्ण नारियल पौधे तैयार किए गए। न्यूक्लियस कोकोनट सीड गार्डन की स्थापना के लिए 2025-26 में 24 लाख रुपए आवंटित किए गए, जिसमें 20.29 लाख रुपए का उपयोग हुआ। इसी अवधि में 1.06 लाख पौधों की संयुक्त उत्पादन क्षमता वाली 12 नई नर्सरियों की स्थापना और छह मौजूदा नर्सरियों के रखरखाव में सहायता दी गई। सार्वजनिक क्षेत्र की नर्सरियों को 239.35 लाख रुपए की सहायता दी गई, जिससे 11.97 लाख रोपण सामग्री तैयार हुई। यह करीब 6,850-7,500 हेक्टेयर में नए पौधरोपण के लिए पर्याप्त है।
नए क्षेत्रों में नारियल खेती का विस्तार
नए क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से नारियल की खेती बढ़ाने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जा रही है। योजना के तहत नए क्षेत्रों में नारियल लगाने के लिए 56,000 रुपए प्रति हेक्टेयर की सहायता दो समान वार्षिक किस्तों में दी जाती है। प्रति लाभार्थी न्यूनतम 0.08 हेक्टेयर और अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र इसके दायरे में आता है। वर्ष 2024-25 में 209.24 लाख रुपए के उपयोग से 2,979 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को नारियल खेती के तहत लाया गया और 13,068 किसानों को लाभ मिला। वर्ष 2025-26 में केरलम, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम और अरुणाचल प्रदेश में करीब 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र खेती के तहत लाया गया। इसके लिए 632.77 लाख रुपए की वित्तीय सहायता दी गई।
बहुस्तरीय खेती से उत्पादकता सुधार
मौजूदा नारियल बागानों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए नारियल आधारित फसल प्रणाली के जरिए उत्पादकता सुधार (PICCS) को लागू किया जा रहा है। योजना के तहत प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए दो समान किस्तों में 42,000 रुपए प्रति हेक्टेयर तक की 100% लागत सब्सिडी दी जाती है। वर्ष 2025-26 में 3,943 लाख रुपए के वित्तीय परिव्यय से कई राज्यों के 266 क्लस्टरों में 48,696 किसानों और 18,800 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया। इसके अलावा, राज्य सरकारों के कन्वर्जेंस से 1,246 लाख रुपए की सहायता के जरिए 5,935 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया।
पुराने बागानों के जीर्णोद्धार पर जोर
रोगग्रस्त, अनुत्पादक और पुराने पेड़ों को गुणवत्तापूर्ण पौधों से बदलने तथा मौजूदा पेड़ों के कायाकल्प के लिए नारियल बागानों के पुनर्रोपण और जीर्णोद्धार की योजना लागू है। इसके तहत दो वर्षों में 54,000 रुपए प्रति हेक्टेयर तक की सहायता दी जाती है। पिछले पांच वर्षों में इस योजना के तहत 130.46 करोड़ रुपए की लागत से 25,517 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया। वर्ष 2025-26 में 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र का जीर्णोद्धार किया गया।
प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ी योजनाएं
नारियल विकास बोर्ड प्रौद्योगिकी प्रदर्शन, गुणवत्ता परीक्षण, प्रशिक्षण, इन्क्यूबेशन, परामर्श, बाजार आसूचना, अनुसंधान और निर्यात संवर्धन जैसी गतिविधियों के माध्यम से मूल्य श्रृंखला को मजबूत कर रहा है। बोर्ड भूसी और रेशे को छोड़कर अन्य नारियल उत्पादों के लिए निर्यात संवर्धन परिषद के रूप में कार्य करता है। वर्ष 2025-26 तक 8,299 और 31 जुलाई 2026 तक 8,700 निर्यातकों का पंजीकरण किया जा चुका है। पिछले पांच वर्षों में नारियल उत्पादों का निर्यात कारोबार 3,236.83 करोड़ रुपए से बढ़कर 7,038.35 करोड़ रुपए हो गया है।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार
पिछले पांच वर्षों में बोर्ड ने 20 घरेलू व्यापार मेलों में 72 उद्यमियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में 224 निर्यातकों की भागीदारी में सहायता की। इसी अवधि में 215 उद्यमियों के लिए 392 घरेलू बैठकों की सुविधा दी गई। फरवरी 2023 में हैदराबाद में ‘ग्लोबल कोकोनट इंडस्ट्री-टुवर्ड्स द समिट’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन आयोजित किया गया। अगस्त 2025 में कोयंबटूर में इंटरनेशनल कोकोनट कम्युनिटी के सहयोग से इंटरनेशनल कोकोनट हेल्थ कॉन्फ्रेंस और सितंबर 2025 में मनीला में वर्ल्ड कोकोनट कांग्रेस में भी भारत ने भागीदारी की।
एफपीओ और प्राथमिक प्रसंस्करण को बढ़ावा
किसानों के समूहों को अपनी उपज सामूहिक रूप से एकत्र करने और उसका विपणन करने के लिए खरीद केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे किसानों की मोलभाव क्षमता बढ़ती है और बिचौलियों की भूमिका कम होती है। अब तक दो एफपीओ को सहायता दी गई है। कोपरा, बॉल कोपरा और कम प्रसंस्कृत कच्चे नारियल की मिलिंग के लिए प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करने पर भी जोर है। इसका उद्देश्य किसानों, उद्यमियों, एफपीओ और सहकारी समितियों को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार करने में सक्षम बनाना है।
तकनीक और सामाजिक सुरक्षा की पहल
नारियल पर प्रौद्योगिकी मिशन (TMOC) के तहत कीट एवं रोग प्रबंधन, प्रसंस्करण, उत्पाद विविधीकरण और तकनीकी पहल को बढ़ावा दिया जाता है। ‘केरा सुरक्षा बीमा योजना’ के तहत नारियल पेड़ पर चढ़ने वालों, नीरा तकनीशियनों, संकरण श्रमिकों और नारियल मजदूरों को दुर्घटना बीमा कवर दिया जाता है।
नारियल संवर्धन योजना से नई उम्मीद
केंद्रीय बजट 2026-27 में कीटों के प्रकोप, रूट विल्ट रोग और पुराने बागानों की समस्या से निपटने के लिए ‘नारियल संवर्धन योजना’ की घोषणा की गई। इसके तहत बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण पौधों का उत्पादन, संभावित क्षेत्रों में खेती का विस्तार, पुराने और अनुत्पादक बागानों का चरणबद्ध पुनर्रोपण एवं जीर्णोद्धार, समग्र फसल स्वास्थ्य प्रबंधन और एकीकृत नारियल प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना पर जोर दिया गया है। यह पहल काजू और कोको समेत उच्च मूल्य वाली कृषि के लिए 350 करोड़ रुपए के व्यापक आवंटन का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सततता को मजबूत करना, किसानों की आय बढ़ाना और 2030 के दशक तक भारत को नारियल एवं कॉयर निर्यात में वैश्विक अगुआ बनाना है।
कौशल विकास से रोजगार और उद्यमिता
नारियल विकास बोर्ड कटाई, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के लिए प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करने पर भी जोर दे रहा है। ‘फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री’ कार्यक्रम के तहत युवाओं को यांत्रिक उपकरणों से पेड़ पर चढ़ने, पौध संरक्षण, उद्यमिता और संचार कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्ष 2024-25 में देशभर में 378 पेड़ चढ़ने वालों को प्रशिक्षित किया गया।
कोकोमित्र से संगठित कार्यबल तैयार
‘कोकोमित्र’ कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित नारियल आरोहकों को 6-10 सदस्यों की पंजीकृत इकाइयों में संगठित किया जाता है। इन समूहों को आधुनिक चढ़ाई उपकरण, पौध संरक्षण औजार और गतिशीलता सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि किसानों को समय पर सेवाएं मिल सकें।
केरा कौशल केंद्रों का नेटवर्क
‘केरा कौशल केंद्र’ का उद्देश्य देशभर में नारियल हस्तशिल्प केंद्रों का नेटवर्क तैयार करना है। यहां खोल, लकड़ी और रेशे से बने उत्पादों पर काम होगा। 15 सदस्यीय हस्तशिल्प उत्पादन समूहों को कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत किया जाता है। वर्ष 2026-27 से प्रत्येक स्वीकृत केंद्र को औजार, उपकरण, फर्नीचर, भंडारण रैक और अन्य सुविधाओं के लिए 2.67 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता मिल सकती है।
नीरा प्रसंस्करण के लिए प्रशिक्षण
नीरा निष्कर्षण और प्रसंस्करण तकनीशियन प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत लाइसेंस प्राप्त एफपीओ के सदस्यों को सात दिवसीय व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका उद्देश्य नारियल पुष्पक्रम से निकलने वाले गैर-किण्वित, अल्कोहल-मुक्त नीरा के सुरक्षित और वैज्ञानिक निष्कर्षण तथा प्रसंस्करण को बढ़ावा देना है। वर्ष 2025-26 में बोर्ड ने योजनाओं, वैज्ञानिक खेती और मूल्य संवर्धन से जुड़े 414 जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए।
परंपरा से वैश्विक कारोबार तक पहुंचा नारियल
पीढ़ियों से ‘जीवन वृक्ष’ के रूप में प्रतिष्ठित नारियल भारत के सांस्कृतिक और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। अब यह क्षेत्र पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक उत्पादन, बहुस्तरीय खेती, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, खेती के विस्तार, पुराने बागानों के जीर्णोद्धार, कौशल विकास और किसान समूहों को बढ़ावा देने वाली योजनाएं नई संभावनाएं पैदा कर रही हैं। वहीं, मूल्य-वर्धित नारियल उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग भारत के निर्यात को नई गति दे रही है। निरंतर नीतिगत और संस्थागत समर्थन के साथ भारत का नारियल क्षेत्र सांस्कृतिक विरासत से आगे बढ़कर वैश्विक कृषि और निर्यात अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। (इनपुट: पीआईबी)


