गांव से ग्लोबल तक, ‘युवा शक्ति’ लिख रही कामयाबी की गाथा

वर्तमान भारत में यदि कोई एक शब्द राष्ट्र निर्माण के स्तंभ के रूप में बार-बार उभरता है, तो वह है ‘युवा शक्ति’। यह शक्ति न केवल भारत की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है, बल्कि उसकी सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक आकांक्षाओं की आधारशिला भी है। अपने 10 वर्ष पूरे कर चुकी भारत सरकार की ‘कौशल भारत मिशन’ योजना इस देश की युवा शक्ति के लिए न सिर्फ सामाजिक परिवर्तन बल्कि आर्थिक सुदृढ़ता का प्रतीक बन चुकी है।

कौशल से आत्मनिर्भरता की राह

कौशल भारत मिशन की शुरुआत वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उस समय की गई थी, जब देश की युवा आबादी को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना सबसे बड़ा लक्ष्य था। उद्देश्य स्पष्ट था, भारत के युवाओं को न केवल पारंपरिक शिक्षा देना, बल्कि उन्हें रोजगार-उन्मुख और उद्योग-उपयुक्त कौशल प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाना। यह पहल इस धारणा पर आधारित थी कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को जीवन यापन के साधन और समाज के लिए योगदान की क्षमता प्रदान करे।

एक दशक में कैसे बदली तस्वीर? 

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY), राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप संवर्धन योजना (NAPS) और उदान जैसी उप-योजनाएं शामिल हैं। ये योजनाएं विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में युवाओं को तकनीकी और गैर-तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। इस मिशन की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते एक दशक में लगभग दो करोड़ युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है, जिनमें से एक बड़ी संख्या को रोजगार भी प्राप्त हुआ है या उन्होंने अपना स्वरोजगार स्थापित किया है।

‘विकसित भारत’ का निर्माण

प्रधानमंत्री मोदी का युवा शक्ति के भविष्य को लेकर विजन स्पष्ट नजर आता है। वह स्पष्ट कर चुके हैं कि आने वाले वर्षों में भारत सरकार का ध्यान वैश्विक मानकों के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण देने पर केंद्रित रहेगा। इस मिशन के 10 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उन्होंने यह भी कहा कि इस मिशन ने अब तक अनगिनत युवाओं को अवसरों से जोड़ा है और उन्हें अपने जीवन में एक नई दिशा दी है। यह वक्तव्य न केवल एक सांकेतिक घोषणा है, बल्कि भारत सरकार की उस दीर्घकालिक दृष्टि का संकेत है जिसके केंद्र में ‘विकसित भारत’ का निर्माण है।

रणनीतिक निर्णयों और संस्थागत बदलावों का परिणाम

कौशल भारत मिशन की सफलता के पीछे कई रणनीतिक निर्णयों और संस्थागत बदलावों का योगदान रहा है। सबसे पहले तो केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय स्थापित कर एक व्यापक कौशल पारिस्थितिकी तैयार की गई। दूसरे, उद्योगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को समय-समय पर अद्यतन किया गया। तीसरे, सरकारी प्रशिक्षण केंद्रों के अलावा निजी भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया गया जिससे गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं सुनिश्चित की जा सकें।

शहरी टैलेंट और ग्रामीण की खाई भी पाटी

जहां एक ओर इस मिशन ने शहरी युवाओं को सशक्त किया, वहीं दूसरी ओर यह ग्रामीण भारत की छुपी हुई प्रतिभाओं के लिए भी एक वरदान साबित हुआ। उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड जैसे राज्यों में लाखों युवा, जो कभी खेतों या दिहाड़ी मजदूरी तक सीमित थे, आज प्रशिक्षित होकर इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर, डेटा एंट्री ऑपरेटर, होम हेल्थ केयर वर्कर, कुक, और अन्य तकनीकी भूमिकाओं में स्थापित हैं। इन युवाओं की कहानियां उस परिवर्तन का प्रतीक हैं जो इस मिशन ने जमीनी स्तर पर लाया है।

महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत

इतना ही नहीं, महिलाओं की भागीदारी भी इस मिशन की विशेष उपलब्धि रही है। लाखों महिलाएं, जिन्होंने कभी घरेलू कामकाज तक सीमित जीवन जिया था, अब सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटीशियन, हेल्थ वर्कर और यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयर जैसी तकनीकी भूमिकाओं में प्रशिक्षित होकर न केवल आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि अपने परिवारों की आर्थिक रीढ़ भी बनीं। इस सामाजिक परिवर्तन ने भारत में महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत लिखी है।

चुनौतियों का सामना कर बदले हालात

हालांकि, इस मिशन के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं थीं। एक बड़ी चुनौती थी गुणवत्ता और प्रशिक्षण की मानकीकरण। देश भर में प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या तो बढ़ी, परंतु सभी जगह एक समान प्रशिक्षण गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक कठिन कार्य रहा। इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता और पहुंच की सीमाएं भी मिशन की गति को प्रभावित करती रहीं। फिर भी, सरकार ने समय-समय पर डिजिटल कौशल प्रशिक्षण, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म, और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना किया।

भारत ने उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच बनाया सेतु 

कौशल भारत मिशन को वैश्विक संदर्भ में भी देखा जाए तो यह कई अंतरराष्ट्रीय मॉडल्स के साथ तुलनात्मक रूप से बेहतर साबित हुआ है। जर्मनी और स्विट्जरलैंड के ड्यूल अप्रेंटिसशिप मॉडल को अपनाते हुए भारत ने उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच सेतु बनाने का प्रयास किया है। यह प्रयास अब इस दिशा में बढ़ चुका है कि भारत के तकनीकी और व्यावसायिक प्रमाणपत्रों को वैश्विक मान्यता मिले, जिससे प्रशिक्षित युवा विदेशों में भी कार्य कर सकें।

बदलते समय के साथ चल रही सरकार

हालिया वर्षों में कौशल भारत मिशन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस, हरित ऊर्जा, ई-वॉलेटिंग और डिजिटल बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। यह कदम न केवल मिशन की समकालीनता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि सरकार बदलते समय के साथ चल रही है और आने वाले दशक में युवाओं को ‘फ्यूचर-रेडी’ बनाने की तैयारी कर रही है।

भारत अब वैश्विक रोजगार बाजार में भी भारतीय युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करेगा

प्रधानमंत्री के हालिया वक्तव्य में यह बात विशेष उल्लेखनीय रही कि सरकार अब युवाओं के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करेगी। इसका अर्थ यह है कि भारत अब कौशल निर्माण में केवल अपने आंतरिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक रोजगार बाजार में भी भारतीय युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करेगा। इससे न केवल विदेशी करेंसी की प्राप्ति बढ़ेगी, बल्कि भारत की ग्लोबल वर्कफोर्स के रूप में प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। 

रोजगार प्राप्त करने से लेकर रोजगार देने तक का सफर

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कौशल भारत मिशन का प्रत्यक्ष लाभ रोजगार दर में वृद्धि और बेरोजगारी दर में गिरावट के रूप में देखा गया है। आर्थिक सर्वेक्षणों में यह बात बार-बार उभर कर सामने आई है कि जिन युवाओं ने कौशल प्रशिक्षण प्राप्त किया है, उनकी औसत आय में वृद्धि हुई है और वे नौकरी के लिए लंबे समय तक भटकने से बचे हैं। कई राज्यों में तो यह भी देखा गया है कि प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं ने स्वयं का व्यवसाय शुरू किया और अब वे न केवल खुद को, बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार प्रदान कर रहे हैं।

पिछले 10 वर्षों में लगभग दो करोड़ से अधिक युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान किया गया

भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में लगभग दो करोड़ से अधिक युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इनमें से लगभग सत्तर प्रतिशत युवाओं को या तो किसी कंपनी में रोजगार मिला या उन्होंने स्वरोजगार शुरू किया। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि यह मिशन केवल एक घोषणात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जमीन पर कार्यरत एक क्रियाशील परिवर्तन है।

 अगले दशक का विजन भी तैयार

यदि हम भविष्य की बात करें, तो कौशल भारत मिशन के अगले दशक की दिशा और गति को लेकर कई योजनाएं तैयार हैं। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक कम से कम पांच करोड़ युवाओं को ऐसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाए जो न केवल वर्तमान में प्रासंगिक हों, बल्कि आने वाले वर्षों में अत्यधिक मांग वाले साबित हों। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित प्रौद्योगिकी, वित्तीय तकनीक, स्वास्थ्य सेवा, पर्यटन, और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है।

राष्ट्र निर्माण की अग्रिम पंक्ति में खड़ी ‘युवा शक्ति’

कुल मिलाकर, कौशल भारत मिशन एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है जिसने भारत के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया है। यह मिशन केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर आत्मबल और आत्मसम्मान का संचार करने वाली पहल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन कि ‘कौशल भारत, युवा भारत की आत्मनिर्भरता की आधारशिला है’, आज पूर्णतया साकार होता दिख रहा है। यह मिशन भारत की युवा शक्ति को न केवल योग्य बना रहा है, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर रहा है और यही वह बिंदु है जहां से विकसित भारत का सपना, एक ठोस हकीकत की ओर अग्रसर होता है।

 -(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज़ सर्विस के साथ जुड़े हैं।)

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