भारत का डिजिटल परिवर्तन अब केवल स्मार्टफोन, डिजिटल भुगतान या ऑनलाइन सरकारी सेवाओं तक सीमित नहीं है। हर दिन लाखों भारतीयों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली डिजिटल सेवाओं के पीछे डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तेज गति वाली कनेक्टिविटी का एक मजबूत और लगातार विस्तार करता बुनियादी ढांचा काम कर रहा है। भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र का तेजी से हो रहा विस्तार दर्शाता है कि देश अपने डिजिटल सफर के अगले चरण के लिए किस तरह तैयारी कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार प्रौद्योगिकी, डिजिटल बुनियादी ढांचे और नवाचार को भारत के विकास के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में रेखांकित किया है। डेटा सेंटरों का विस्तार अब इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभर रहा है। यह बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को समर्थन देने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद कर रहा है।
इस परिवर्तन का स्तर उल्लेखनीय है। भारत की स्थापित डेटा सेंटर विद्युत क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 1.57 गीगावाट हो गई है। यह महत्वपूर्ण विस्तार कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा भंडारण और डिजिटल सेवाओं की तेजी से बढ़ती मांग को दर्शाता है। सरकार ने इस क्षेत्र में आगे बड़े पैमाने पर निवेश की संभावनाओं को भी रेखांकित किया है।
डेटा सेंटरों को अक्सर डिजिटल अर्थव्यवस्था का ‘अदृश्य इंजन’ कहा जाता है। ये बैंकिंग, ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और तेजी से बढ़ रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुप्रयोगों को समर्थन देते हैं। जैसे-जैसे अधिक नागरिक और व्यवसाय डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, वैसे-वैसे सुरक्षित, विश्वसनीय और लगातार उपलब्ध कंप्यूटिंग बुनियादी ढांचे की आवश्यकता भी बढ़ रही है।
सरकार पिछले कई वर्षों से इस आधारभूत ढांचे का निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में प्रमुख राष्ट्रीय डेटा सेंटर स्थापित किए हैं। इसके साथ ही कई राज्यों की राजधानियों में छोटे डेटा सेंटर भी स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र सरकारी संस्थानों को सहायता प्रदान करते हैं और विश्वसनीय डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद करते हैं।
यह प्रधानमंत्री मोदी के प्रौद्योगिकी आधारित विकास पर जोर से जुड़ी व्यापक ‘डिजिटल इंडिया’ यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य केवल प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को बढ़ाना नहीं है, बल्कि भारत के डिजिटल विकास को बनाए रखने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और क्षमताओं का निर्माण करना भी है।
सरकार के दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि डेटा सेंटरों का विकास अन्य तकनीकी पहलों के साथ-साथ किया जा रहा है। सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के दूसरे चरण, यानी सेमीकॉन 2.0, को जुलाई 2026 में 1,27,500 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान के साथ मंजूरी दी गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में एक विश्वसनीय और मजबूत सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
इसी तरह, इंडियाAI मिशन के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है, जिसका उद्देश्य एक व्यापक कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के लिए सहायता भी 22,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दी गई है। सरकार ने आईटी हार्डवेयर के लिए पीएलआई योजना 2.0 शुरू की है, जिसका उद्देश्य सर्वर जैसे उत्पादों के घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
इन सभी पहलों को एक साथ देखें तो एक व्यापक रणनीति सामने आती है—भारत को केवल डिजिटल उपयोगकर्ताओं की ही आवश्यकता नहीं है, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के पीछे काम करने वाले भौतिक बुनियादी ढांचे, हार्डवेयर, कंप्यूटिंग क्षमता और तकनीकी दक्षताओं की भी जरूरत है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास ने कंप्यूटिंग बुनियादी ढांचे की मांग को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एआई कंप्यूट क्षमता ढांचे के तहत 14 सूचीबद्ध सेवा प्रदाताओं और डेटा सेंटरों के माध्यम से लगभग 38,231 जीपीयू उपलब्ध कराए गए हैं। ये संसाधन पात्र स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और शिक्षण संस्थानों के लिए औसतन 65 रुपये प्रति घंटे की रियायती दर पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि कंप्यूटिंग क्षमता तक पहुंच यह तय कर सकती है कि स्टार्टअप, शोधकर्ता और संस्थान कितनी तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर प्रयोग कर सकते हैं और नए अनुप्रयोग विकसित कर सकते हैं।
जून 2026 में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में 5 गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता विकसित करने के लिए एयरट्रंक द्वारा प्रस्तावित लगभग 3 लाख करोड़ रुपये के निवेश का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस तरह का निवेश क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करने के साथ रोजगार, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं और नवाचार को बढ़ावा दे सकता है।
डेटा सेंटरों के विस्तार के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। इन केंद्रों को बड़ी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है और शीतलन प्रणालियों के आधार पर पानी की भी जरूरत पड़ सकती है। इसलिए सरकार ने ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा और बेहतर शीतलन तकनीकों पर जोर दिया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबेटिक कूलिंग, इमर्शन कूलिंग और क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग जैसी तकनीकों को अपनाए जाने का उल्लेख किया है। सरकार ने ऊर्जा संरक्षण और सतत भवन संहिता के तहत ऊर्जा दक्षता तथा जल संरक्षण से जुड़े प्रावधानों को भी रेखांकित किया है। यह ध्यान महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का डिजिटल विस्तार प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
भारत में डेटा सेंटरों का विकास अंततः केवल सर्वरों से भरी इमारतों के निर्माण तक सीमित नहीं है। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए डिजिटल आधार तैयार करने से जुड़ा है। डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस से लेकर सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और क्लाउड कंप्यूटिंग तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने प्रौद्योगिकी को अपनी विकास रणनीति के केंद्र में रखा है। बढ़ता हुआ डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र इसी व्यापक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का कारोबार, शासन, शिक्षा, अनुसंधान और रोजमर्रा के जीवन पर प्रभाव लगातार बढ़ेगा। आज आवश्यक बुनियादी ढांचे का निर्माण देश को इन बदलावों का अधिक क्षमता और आत्मविश्वास के साथ सामना करने में मदद कर सकता है।
भारत के डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार इसलिए देश को तकनीकी रूप से मजबूत और अधिक डिजिटल क्षमता वाली अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। डिजिटल बुनियादी ढांचे, उभरती प्रौद्योगिकियों और आत्मनिर्भरता पर प्रधानमंत्री मोदी का निरंतर जोर इन क्षमताओं को ‘विकसित भारत’ के व्यापक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण आधारों में शामिल करने में मदद कर रहा है।


