लखनऊ में आयोजित ‘AI Manthan 2.0’ के दूसरे दिन ‘AI for Healthcare’ सत्र में विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के व्यावहारिक इस्तेमाल पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि AI की मदद से बीमारियों की जल्द और सटीक पहचान करने के साथ-साथ मेडिकल सेवाओं को अधिक प्रभावी और लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध बनाया जा सकता है।
दो दिवसीय ‘AI Manthan 2.0’ का आयोजन राज्यपाल की अध्यक्षता में राज भवन और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU), कानपुर ने संयुक्त रूप से किया।
मेडिकल प्रैक्टिस में Generative AI का इस्तेमाल
Doctors AI Education and Research Foundation के डॉ. अमित कुमार डे ने ‘Generative AI for Clinical Practice’ विषय पर बोलते हुए Predictive AI और Generative AI के बीच अंतर समझाया। उन्होंने कहा कि Large Language Models (LLM) से मिलने वाले जवाबों को अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि मेडिकल क्षेत्र में AI का इस्तेमाल जानकारी को संक्षेप में तैयार करने, फॉर्मेटिंग और ड्राफ्टिंग जैसे कामों में किया जा सकता है। हालांकि, AI से मिले तथ्यों, दवाओं की खुराक और अन्य डेटा को इस्तेमाल से पहले जरूर सत्यापित किया जाना चाहिए।
Dr Lal PathLabs, New Delhi के Director of Renal Pathology and Electron Microscopy और Research and Development प्रमुख डॉ. आलोक शर्मा ने कहा कि Digital Pathology, Haematology और Microbiology जैसे क्षेत्रों में AI जांच और रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया को तेज और अधिक सटीक बना सकता है। उन्होंने कहा कि AI का उद्देश्य मौजूदा ऑटोमेशन सिस्टम को हटाना नहीं, बल्कि उनकी क्षमता और सटीकता को बेहतर बनाना है।
IIT Kanpur के विनायक पाठक ने कहा कि AI डॉक्टरों का विकल्प नहीं है, बल्कि उनके काम में सहायता करने वाला प्रभावी टूल है।
ओरल कैंसर की जल्द पहचान में AI की भूमिका
AIIMS New Delhi की प्रोफेसर दीपिका मिश्रा ने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में AI का इस्तेमाल अब सिर्फ रिसर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक क्लिनिकल सेवाओं में भी किया जा रहा है।
उन्होंने AI आधारित टूल्स और ‘Aarogya Sankalp’ मोबाइल एप्लिकेशन का उल्लेख किया, जिनका इस्तेमाल ओरल कैंसर की समय पर पहचान और रोकथाम के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि छह राज्यों के नौ प्रमुख केंद्रों में किए गए अध्ययन के पहले चरण में 40,746 संदिग्ध मामलों की स्क्रीनिंग की गई। इनमें से 9,643 मामलों को टेली-एक्सपर्ट्स ने संदिग्ध और 1,385 मामलों को हाई-रिस्क के रूप में चिन्हित किया।
उन्होंने कहा कि इस पहल का परीक्षण उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले समेत 48 गांवों में भी किया गया है।
-(इनपुटः PTI)


