ऑपरेशन सिंदूर की चोट कितनी गहरी है? पाकिस्तान की हड़बड़ाहट कर रही बयां

एक तरफ पाकिस्तान लगातार भारत से मुंह की खा रहा है वहीं खुद की लगाई आग के चलते तबाही की तरफ बढ़ रहा है। जनरल आसिम मुनीर का फील्ड मार्शल बनना केवल एक औपचारिक फैसला नहीं है, बल्कि यह बताता है कि इस समय आतंकवाद की नर्सरी तबाह होने से कितनी हड़बड़ाहट है। यह फैसला बताता है कि पाकिस्तान सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाने पर मजबूर क्यों हुआ। भारत ने इस बार ऑपरेशन सिंदूर के जरिए ऐसी चोट की है कि सैन्य शासन के अंधेरे दौर में जाता ये देश अब आसानी से आतंक का फन उठाने की सोच नहीं पाएगा बल्कि आने वाले समय में खुद की लगाई आग में जलता नजर आएगा। 

हार पर पर्दा डालने की नाकाम कोशिश

गौरतलब है कि सेना प्रमुख पाकिस्तान में हमेशा से प्रधानमंत्री से अधिक शक्तिशाली रहा है और यही कारण है कि वहां लोकतंत्र कभी स्थायित्व नहीं पा सका। इसके साथ ही, मानवाधिकारों की स्थिति भी लगातार बिगड़ती रही है। पत्रकारों पर हमले, अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और राजनीतिक दमन आम हो चुके हैं। ऐसे में आसिम मुनीर की नई ताजपोशी के जरिए अपनी हार पर पर्दा डालने की कोशिश करते पाकिस्तान ने अपने मुल्क के लोगों के लिए एक बार फिर बड़ा जोखिम पैदा कर दिया है। आतंकवाद को समर्थन और सेना का बढ़ता प्रभाव पाकिस्तान के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है।

आतंकवादियों के इशारे पर नाचती पाक सेना

पाकिस्तान की स्थापना 1947 में हुई थी लेकिन तब से लेकर अब तक वहां लोकतंत्र मजबूत होने की बजाय लगातार आतंकवाद की जड़ें मजबूत होती गईं। इसका सबसे बड़ा कारण सेना का राजनीतिक व्यवस्था में निरंतर हस्तक्षेप है। जहां एक परिपक्व लोकतंत्र में सेना को सरकार के अधीन रहना चाहिए, वहीं पाकिस्तान में सेना एक समानांतर नहीं बल्कि और अधिक ताकत के साथ सत्ता के रूप में कार्य करती है और ये सेना आतंकवादियों के इशारे पर नाचती है। विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक फैसलों तक में सेना का प्रभाव रहता है, जिससे चुनी हुई सरकारें कृपा पात्र से ज्यादा कुछ नहीं रहतीं।

पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी

पाकिस्तान में उल्टी गंगा बहना कोई नई बात नहीं। पहलगाम हमले के जवाब में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान ने हार पर पर्दा डालने के लिए अपने आर्मी चीफ का प्रमोशन कर दिया। पाकिस्तान ने आत्मघाती कदम उठाते हुए वर्तमान सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल की पदवी दी है। इससे साफ हो गया है कि पहलगाम आतंकी हमला पाक सेना का सोचा समझा कदम था। हमेशा की तरह एक बार फिर वहां की सेना ने राजनीतिक मामलों में पूरी तरह अपनी पकड़ बनाने के लिए इस कायराना हरकत की साजिश रची।

पाक में तख्तापलट का इतिहास

पाकिस्तान के इतिहास में इससे पहले केवल जनरल अयूब खान को फील्ड मार्शल का दर्जा दिया गया था। उन्होंने 1958 में पाकिस्तान में पहला सैन्य तख्तापलट किया था, जब उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा को अपदस्थ कर सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। उनका शासन पाकिस्तान में एक सैन्य तानाशाही की शुरुआत था, जिसने लोकतांत्रिक ढांचे को तोड़कर सत्ता को सेना के अधीन कर दिया। आज आसिम मुनीर की पदोन्नति एक बार फिर उसी इतिहास को दोहराने की आशंका को जन्म देती है।

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की जीरो हैसियत

पाकिस्तान की राजनीति में एक विचित्र स्थिति यह है कि वहां का सेना प्रमुख देश के प्रधानमंत्री से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। चाहे वह विदेश नीति हो, सुरक्षा रणनीति या चीन-अमेरिका जैसे देशों के साथ संबंध, सेना की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है। प्रधानमंत्री तक सेना के इशारों पर नाचता है। इस असंतुलन के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं का कोई वजदू ही नहीं है और सरकारें अक्सर सेना के दबाव में निर्णय लेती हैं।

गलती से नहीं लिया सबक

पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो लगातार गढ्डे में जा रहा है फिर भी सबक नहीं लेता। पाकिस्तान में अब तक तीन बार बड़े सैन्य तख़्तापलट हुए हैं। 1958 में जनरल अयूब ख़ान ने राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा को हटाया और मार्शल लॉ लगाया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक़ ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार गिराई। 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का तख्तापलट किया।

इन तीनों मामलों में सेना ने भ्रष्टाचार या सुरक्षा के नाम पर सत्ता पर कब्जा किया लेकिन असल में इन तख्तापलटों के पीछे आतंकवाद को पोषित करना ही सबसे बड़ा उद्धेश्य था। तख्तापलट ने पाकिस्तान को इतने पीछे धकेल दिया है कि अब लोकतंत्रा पर वहां की जनता का भरोसा भी खो दिया है।

मानवाधिकार की भयावह तस्वीर

पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति भी लगातार चिंताजनक बनी हुई है, खासकर जब सेना का प्रभाव अधिक होता है। ह्यूमन राइट्स वॉच 2024 की रिपोर्ट के अनुसार गायबशुदा लोगों (Forced Disappearances) की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना से जुड़ी एजेंसियों द्वारा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को उठाया जाता है। मीडिया की हालत भी खस्ता है। 2023 में 140 से अधिक पत्रकारों ने धमकियों की शिकायत की। कई मीडिया चैनल्स को सेना के पक्ष में रिपोर्टिंग करने के लिए मजबूर किया गया। इमरान खान की पार्टी सहित कई विपक्षी नेता जेल में पड़े हैं। 

धार्मिक आधार पर अत्याचार

पाकिस्तान में कट्टरता इस कदर है कि धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार लगातार जारी है। हिंदू, ईसाई और अहमदी समुदायों पर हमले बढ़े हैं। जबरन धर्मांतरण और मंदिरों पर हमले आम हो गए हैं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा ने तो रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। पाकिस्तान ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2024 में दुनिया के सबसे असमान देशों में छठवें स्थान पर है। घरेलू हिंसा और ऑनर किलिंग के मामले बहुत आम हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि सेना के अत्यधिक प्रभाव वाले देशों में केवल लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा भी खतरे में होती है।

एक बार फिर तख्तापलट की राह पर पाकिस्तान

कुल मिलाकर पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ों का कमजोर होना और आतंकवाद का बोलबाला अब किसी से छिपा नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां की सेना का लगातार राजनीति में दखल है। एक बार फिर इसी प्रवृत्ति को बल मिला है जब मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल की पदवी दी गई है। इतिहास गवाह है कि जब-जब पाकिस्तान में किसी सैन्य अधिकारी को इस पद पर बिठाया गया यह देश और गर्त में चला गया। ऑपरेशन सिंदूर के तहत मुंह की खा चुका पड़ोसी मुल्क एक बार फिर हड़बड़ाहट में तख्तापलट की राह पर चल पड़ा है। 

-(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है।)