भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सुधारों को आगे बढ़ने से रोकने वाले “छिपे हुए, व्यावहारिक वीटो” (de facto veto) की कड़ी आलोचना की है। सोमवार को महासभा में पांच स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकारों पर हुई बहस के दौरान भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि सुधार प्रक्रिया में ‘आम सहमति’ की शर्त को अप्रत्यक्ष वीटो की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। हरीश ने बताया कि सुरक्षा परिषद सुधारों के लिए चल रही अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) में यह मुद्दा शामिल था, लेकिन कुछ देशों द्वारा अपनाए जा रहे प्रक्रियागत पैंतरों के कारण यह अटक गई है। उन्होंने कहा, “IGN प्रक्रिया में भी ‘आम सहमति’ की दलील का इस्तेमाल एक छिपे हुए, व्यावहारिक वीटो के रूप में किया जा रहा है।”
इटली और पाकिस्तान समेत समूह का विरोध
‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ नाम के देशों के एक छोटे समूह ने प्रक्रिया संबंधी दांव-पेंच अपनाकर IGN को बातचीत का कोई मसौदा (negotiating text) अपनाने से रोक रखा है। इस समूह का नेतृत्व इटली कर रहा है और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। पी. हरीश ने याद दिलाया कि 2008 का महासभा प्रस्ताव, जो IGN का आधार है, बिल्कुल स्पष्ट है। इसका मुख्य सिद्धांत “अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति” है, न कि पूर्ण आम सहमति। उन्होंने कहा कि 17 दौर की बातचीत के बाद भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है, क्योंकि यह व्यावहारिक वीटो उस प्रस्ताव में कहीं दर्ज ही नहीं है। भारत ने व्यापक सुधारों की शुरुआत के लिए स्पष्ट समय-सीमा और लक्ष्यों के साथ मसौदे पर आधारित बातचीत जल्द शुरू करने की मांग की है।
प्रतिबंध समितियों में भी छिपा वीटो
पी. हरीश ने उन गुप्त वीटो की भी ओर इशारा किया जिन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मान्यता नहीं मिली है, फिर भी गैर-स्थायी सदस्यों समेत हर सदस्य उनका इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने कहा कि वीटो सिर्फ खुले तौर पर इस्तेमाल होने वाला अधिकार नहीं है। अध्यक्षीय बयानों, प्रेस बयानों और प्रतिबंध समितियों के फैसलों पर भी आम सहमति के अलिखित नियम के तहत कोई भी एक सदस्य प्रस्ताव रोक सकता है, और अक्सर इसके लिए कोई स्पष्टीकरण भी नहीं देना पड़ता। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि चीन ने कई बार प्रतिबंध समिति की गुप्त बैठकों में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों—जैसे लश्कर-ए-तैयबा के जकी-उर-रहमान लखवी और शाहिद महमूद तथा जैश-ए-मोहम्मद के साजिद मीर और मसूद अजहर—पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को रोका है।
भारत का रुख: नए स्थायी सदस्यों को भी वीटो चाहिए
पी. हरीश ने व्यापक सुधारों की वकालत करते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता के सवालों का जवाब सिर्फ वीटो को मैनेज करने से नहीं मिलेगा। इसमें परिषद का विस्तार और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा, “इन सवालों का जवाब एक ऐसी परिषद से मिलेगा जो आज की वास्तविकताओं को दर्शाती हो, न कि आठ दशक पहले हुए युद्ध के नतीजों को।” भारत ने सिद्धांत-आधारित रुख अपनाया है।
पी. हरीश ने दोहराया कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधारी गई परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा, “निष्पक्षता और न्याय की यही मांग है।” उन्होंने सुरक्षा परिषद में “दूसरे दर्जे” के सदस्यों—जैसे लंबे कार्यकाल वाले या बिना वीटो वाले स्थायी सदस्य—की श्रेणियां बनाने के विचार को भी खारिज कर दिया। उनका कहना था कि इससे पहले से कठिन चर्चा और जटिल हो जाएगी तथा असमानता और गहरी होगी। हरीश ने वीटो इस्तेमाल करने वाले देशों को महासभा के सामने स्पष्टीकरण देने की व्यवस्था पर भी संशय जताया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य जवाबदेही तय करना था, लेकिन व्यवहार में वीटो के बढ़ते इस्तेमाल ने “बिल्कुल उलट कहानी बयां की है।” (इनपुट-एजेंसी)


