भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं आज भी देशों और संस्कृतियों को जोड़ रही हैं : प्रधानमंत्री मोदी

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की ओर से ‘बृहत्तर भारत’ परियोजना के अंतर्गत ‘विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक संबंध’ विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का बुधवार को विज्ञान भवन में उद्घाटन हुआ। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। इसमें 50 देशों के प्रतिनिधि और राजदूत भाग ले रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के लिए शुभकामना संदेश भेजा, जिसे केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने पढ़कर सुनाया। सम्मेलन का आयोजन बृहत्तर भारत परिषद् (ग्रेटर इंडिया सोसाइटी) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 14 से 16 अक्टूबर तक किया जा रहा है।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान से मजबूत हुए ऐतिहासिक संबंध

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि सदियों से भारत की सभ्यतागत यात्रा सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है। नालंदा जैसे ज्ञान केंद्रों ने भारत और एशिया के अन्य क्षेत्रों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत किया। बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, व्यापारियों और यात्रियों ने स्थल तथा समुद्री मार्गों के माध्यम से भारतीय विचारों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया।

योग और भारतीय परंपराएं दुनिया को जोड़ रही हैं

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारतीय दर्शन, संगीत, नृत्य, साहित्य, सिनेमा और खान-पान की परंपराएं दुनिया भर के समाजों को भारत से जोड़ती हैं। अनेक देशों में भारतीय त्योहार और परंपराएं उत्साह से मनाई जाती हैं। दुनिया भर में योग का प्रसार इस बात का उदाहरण है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं आज भी विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोगों को जोड़ रही हैं। उन्होंने आशा जताई कि सम्मेलन में होने वाला विचार-विमर्श भारत और दुनिया के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की समझ को मजबूत करेगा और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाएगा।

बृहत्तर भारत को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों के रूप में समझें : शेखावत

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य केवल इतिहास पर चर्चा करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि अतीत का ज्ञान भविष्य की संभावनाओं को किस तरह दिशा दे सकता है। जब विभिन्न सभ्यताएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं, तो विचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं, ज्ञान सीमाओं को पार करता है और कला नए रूप ग्रहण करती है। इससे समाजों को अपनी साझा विरासत को समझने का अवसर मिलता है।

ग्रेटर इंडिया सोसाइटी की स्थापना के 100 वर्ष पूरे

शेखावत ने कहा कि बृहत्तर भारत परिषद् की स्थापना 14 अक्टूबर, 1926 को कलकत्ता में हुई थी। एक शताब्दी पहले ही विद्वानों ने भारत के अन्य देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन की आवश्यकता को समझ लिया था। उनके प्रयासों से इस ऐतिहासिक तथ्य को अकादमिक पहचान मिली कि भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और कलात्मक परंपराएं भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं से बहुत दूर तक पहुंची थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बृहत्तर भारत को किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय दावे के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों के व्यापक क्षेत्र के रूप में समझा जाना चाहिए। अपनी सभ्यतागत विरासत पर गर्व का अर्थ दूसरों के योगदान को कमतर आंकना नहीं है। इसके बजाय, अपनी विरासत की गहरी समझ दुनिया की अन्य विरासतों को समझने और उनका सम्मान करने की क्षमता बढ़ाती है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृति का काम दुनिया को जोड़ना है, बांटना नहीं।

प्रमाण आधारित शोध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर

केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय के लिए यह गर्व की बात है कि उसे दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत के प्राचीन संबंधों को सामने लाने की जिम्मेदारी मिली है। इन संबंधों को प्रमाणों के आधार पर स्थापित करने के लिए शोध करना और संबंधित देशों के विद्वानों के साथ मिलकर काम करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बृहत्तर भारत परियोजना के तहत संयुक्त शोध को बढ़ावा दिया जाएगा। यह केवल भारतीय विद्वानों का प्रयास नहीं होगा और न ही इसका उद्देश्य सिर्फ भारत के दावों को प्रस्तुत करना है। भारत तथा अन्य देशों के विद्वान समान रूप से महत्त्वपूर्ण विषयों पर मिलकर शोध करेंगे और प्रमाणों के आधार पर चर्चा के बाद शोधपत्र तैयार किए जाएंगे।

विचारों और लोगों की यात्राओं से विकसित हुईं सभ्यताएं

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण में कहा कि सभ्यताओं की पहचान केवल उनकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, बल्कि उनके विचारों की यात्राओं, लोगों के आवागमन और उनके पीछे छोड़ी गई स्मृतियों से भी होती है। इतिहास में व्यापारियों ने पहाड़ों और समुद्रों को पार किया, बौद्ध भिक्षुओं और तीर्थयात्रियों ने पवित्र स्थलों की यात्राएं कीं, विद्वानों ने ग्रंथों का अनुवाद किया और विचारों का आदान-प्रदान किया। उन्होंने कहा कि कारीगर भी अपने हुनर, तकनीकों और कलात्मक परंपराओं को दूर-दराज के क्षेत्रों तक ले गए। इन संपर्कों से संस्कृतियों ने एक-दूसरे से सीखा और समय के साथ विकास किया। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इसी इतिहास में बृहत्तर भारत की अवधारणा का मूल निहित है।

साझा विरासत का दस्तावेजीकरण और संरक्षण

डॉ. जोशी ने बताया कि बृहत्तर भारत परियोजना संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध प्रभाग की योजना है, जिसका क्रियान्वयन आईजीएनसीए कर रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय सभ्यता और चयनित देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत की पहचान करना, उसका दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण करना और उसे लोगों के लिए सुलभ बनाना है। यह परियोजना भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर उन क्षेत्रों को समझने पर जोर देती है, जहां विभिन्न देशों के लोगों के बीच संपर्क और संवाद हुआ।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने साझा किए विचार

उद्घाटन सत्र से पहले पूर्व विदेश सचिव, राजदूत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के पूर्व अध्यक्ष शशांक की अध्यक्षता में पूर्ण सत्र आयोजित किया गया। इसमें भारत में लिथुआनिया की राजदूत डायना मिकेविचिएने, फिजी के उच्चायुक्त जगन्नाथ सामी, संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव लिली पांडेय तथा पूर्व राजनयिक और लेखक टी.सी.ए. राघवन ने भाग लिया। जगन्नाथ सामी ने कहा कि फिजी उनकी जन्मभूमि है और भारत मातृभूमि। वहीं, डायना मिकेविचिएने ने कहा कि भारत हमेशा से लिथुआनिया को प्रेरित करता रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध प्रभाग की निदेशक प्रियंका चंद्रा ने सत्र का संचालन किया।

एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत पर प्रदर्शनी

सम्मेलन के दौरान ‘एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक से एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। शेखावत, विवेक अग्रवाल और अन्य गणमान्य अतिथियों ने इसका अवलोकन किया। प्रदर्शनी में भारत और एशिया के अन्य देशों के बीच साझा विरासत तथा ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को प्रदर्शित किया गया। उद्घाटन अवसर पर आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत विभाग के अध्यक्ष प्रो. धर्मचंद चौबे सहित विभिन्न देशों के राजदूत और प्रतिनिधि उपस्थित रहे।