अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : स्वस्थ तन, शांत मन और जागृत आत्मा का वैश्विक महोत्‍सव

जब आधुनिक सभ्यता की चकाचौंध के बीच मानव जीवन तनाव, अवसाद, अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और मानसिक अशांति के बोझ तले दबता जा रहा है, तब योग एक ऐसे दिव्य आलोक के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है, जो जीवन को संतुलन, स्वास्थ्य, शांति और आत्मिक ऊर्जा से आलोकित करता है। आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक और भौतिक संसाधनों की दृष्टि से अभूतपूर्व प्रगति कर चुका है ,पर विडंबना यह है कि वह भीतर से उतना ही विखंडित, अस्थिर और बेचैन दिखाई देता है। भौतिक उपलब्धियों के शिखर पर पहुंचने के बावजूद मानसिक संतोष, भावनात्मक स्थिरता और आध्यात्मिक आनंद का अभाव वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है।

ऐसे संक्रमण काल में योग केवल व्यायाम या स्वास्थ्य-सुधार की एक साधारण पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन के रूप में मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। यह मनुष्य को स्वयं से जोड़ता है, उसकी अंतर्निहित चेतना का बोध कराता है और अंततः समस्त सृष्टि के साथ एकात्म भाव स्थापित करने की प्रेरणा देता है। योग व्यक्ति को बाहरी भटकाव से निकालकर आत्म-अन्वेषण की यात्रा पर अग्रसर करता है, जहां शांति, संयम और आत्मबोध के द्वार खुलते हैं। यही कारण है कि आज योग भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की सीमाओं को पार कर विश्व मानवता की साझा धरोहर और वैश्विक कल्याण का माध्यम बन चुका है।

प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव चेतना, स्वास्थ्य, अनुशासन और आध्यात्मिक जागरण का वैश्विक महापर्व है। यह दिवस संपूर्ण विश्व को यह संदेश देता है कि मानव जीवन की वास्तविक शक्ति बाहरी संसाधनों, भौतिक संपन्नता अथवा तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि अंतर्मन की शांति, आत्मिक संतुलन और सकारात्मक चेतना में निहित है। योग हमें सिखाता है कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और जागृत आत्मा ही समृद्ध एवं सार्थक जीवन की आधारशिला हैं।

महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में कहा है “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः”, अर्थात् चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है। वहीं श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “समत्वं योग उच्यते”, अर्थात् जीवन की विषम परिस्थितियों में भी समभाव और संतुलन बनाए रखना ही योग है। इन दोनों महान सूत्रों में योग का संपूर्ण दर्शन निहित है। योग शरीर को आरोग्यता, मन को स्थिरता, बुद्धि को स्पष्टता, चरित्र को दृढ़ता और आत्मा को दिव्यता प्रदान करता है। यह केवल आसनों की श्रृंखला नहीं, बल्कि आत्म-विकास, आत्म-अनुशासन और आत्म-साक्षात्कार की वह साधना है, जो मनुष्य को उसकी सर्वोच्च संभावनाओं तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

आज जब विश्व शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और आध्यात्मिक रिक्तता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब योग एक समग्र समाधान के रूप में मानवता के समक्ष खड़ा है। यह केवल स्वस्थ रहने की कला नहीं, बल्कि संतुलित, सार्थक, शांतिपूर्ण और आनंदमय जीवन जीने का विज्ञान है; ऐसा विज्ञान, जो व्यक्ति को स्वयं से, समाज को सद्भाव से और मानवता को सार्वभौमिक कल्याण से जोड़ता है। यही योग की वैश्विक प्रासंगिकता, शाश्वत महत्ता और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक संदेश है।

योग का अर्थ और अवधारणा : आत्मा और परमात्मा के मिलन का विज्ञान

‘योग’ शब्द संस्कृत की ‘युज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है-जोड़ना, मिलाना या एकीकरण करना। सामान्य अर्थ में योग शरीर, मन और प्राण के समन्वय का नाम है, पर दार्शनिक दृष्टि से यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की प्रक्रिया है। योग मनुष्य को बाहरी संसार के आकर्षणों से ऊपर उठाकर अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कराता है। यह सिखाता है कि मनुष्य केवल मांस, रक्त और अस्थियों का पिंड नहीं, बल्कि चेतना का दिव्य अंश है।

भारतीय चिंतन में योग एक साथ विज्ञान, दर्शन और जीवन-पद्धति है। विज्ञान इसलिए कि इसके सिद्धांत अनुभव और परीक्षण पर आधारित हैं; दर्शन इसलिए कि यह जीवन के अंतिम सत्य की खोज करता है; और जीवन-पद्धति इसलिए कि यह व्यक्ति के विचार, व्यवहार, चरित्र और व्यक्तित्व को परिष्कृत करता है। योग का लक्ष्य केवल रोगमुक्त शरीर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलित व्यक्तित्व विकसित करना है जिसमें शारीरिक शक्ति, मानसिक स्थिरता, नैतिक उत्कृष्टता और आध्यात्मिक चेतना का समन्वय हो।

योग का ऐतिहासिक विकास : हजारों वर्षों की चेतन यात्रा

योग का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना ही प्राचीन और गौरवशाली है। इसकी जड़ें मानव संस्कृति के प्रारंभिक चरणों तक फैली हुई हैं। सिंधु-सरस्वती सभ्यता में योग: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों में ध्यानमग्न आकृतियां योग की प्राचीनता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। प्रसिद्ध पशुपति मुद्रा में योगासन की मुद्रा में बैठे पुरुष की छवि यह संकेत देती है कि योग का अभ्यास हजारों वर्ष पूर्व भी प्रचलित था। वैदिक और उपनिषदिक युग: वेदों में तप, ध्यान, प्राण और आत्मसंयम के अनेक उल्लेख मिलते हैं। उपनिषदों ने योग को आत्मज्ञान प्राप्ति का साधन बताया। कठोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद में योग को मन और इंद्रियों के नियंत्रण की श्रेष्ठ पद्धति माना गया है।

गीता का योग-दर्शन: श्रीमद्भगवद्गीता योग का विश्वकोश कही जाती है। इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि कर्तव्य, ज्ञान और भक्ति-तीनों मार्ग अंततः योग की ओर ले जाते हैं। पतंजलि का योगदान: महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। उनके योगसूत्र आज भी योग-दर्शन का मूल आधार हैं। उन्होंने अष्टांग योग की अवधारणा देकर साधना का स्पष्ट मार्ग प्रस्तुत किया। आधुनिक युग में योग का पुनर्जागरण: स्वामी विवेकानंद ने योग को विश्व मंच तक पहुंचाया। परमहंस योगानंद, स्वामी शिवानंद, बीकेएस अयंगर, टी. कृष्णमाचार्य और अन्य योगाचार्यों ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना : भारत से विश्व तक

इक्कीसवीं सदी में योग को वैश्विक मंच पर नई पहचान तब मिली जब भारत ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने का प्रयास किया। 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग दिवस का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ और 177 देशों ने सह-प्रायोजक बनकर इसका समर्थन किया। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक समर्थन प्राप्त प्रस्तावों में से एक था। 21 जून का महत्व: 21 जून उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है। भारतीय परंपरा में यह दिन ऊर्जा, चेतना और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है। ग्रीष्म अयनांत का यह अवसर प्रकृति और मानव चेतना के सामंजस्य का संदेश देता है।

योग का दार्शनिक आधार : आत्मबोध से मोक्ष तक

योग दर्शन का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है। सांख्य दर्शन जहां प्रकृति और पुरुष का विवेचन करता है, वहीं योग उन दोनों के संबंध को समझकर आत्ममुक्ति का मार्ग प्रस्तुत करता है। कर्मयोग: निष्काम भाव से कर्म करना कर्मयोग है। यह व्यक्ति को परिणाम की चिंता से मुक्त कर कर्तव्यपरायण बनाता है। ज्ञानयोग: आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना ज्ञानयोग कहलाता है। यह विवेक और सत्य की खोज का मार्ग है। भक्तियोग: ईश्वर के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण भक्तियोग का आधार है। इसमें भक्ति के माध्यम से आत्मा परमात्मा से जुड़ती है। राजयोग: राजयोग मन और चित्त के नियंत्रण का विज्ञान है। ध्यान और समाधि इसकी सर्वोच्च अवस्थाएं हैं। योग दर्शन के अनुसार मनुष्य का अंतिम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति है। जब चित्त शांत हो जाता है, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करती है।

अष्टांग योग : संपूर्ण जीवन का अनुशासन

महर्षि पतंजलि ने योग को आठ अंगों में विभाजित किया है। यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि। यम और नियम नैतिक अनुशासन के आधार हैं। आसन और प्राणायाम शरीर तथा प्राण को संतुलित करते हैं। प्रत्याहार, धारणा और ध्यान मन को अंतर्मुखी बनाते हैं। समाधि आत्मा की सर्वोच्च अवस्था है, जहां साधक परम आनंद का अनुभव करता है। अष्टांग योग केवल साधना की पद्धति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का वैज्ञानिक मॉडल है।

योग और शारीरिक स्वास्थ्य : निरोगी जीवन का आधार

योग का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। नियमित योगाभ्यास शरीर को स्वस्थ, लचीला और ऊर्जावान बनाता है। योगासन मांसपेशियों, स्नायुओं और जोड़ों को सक्रिय करते हैं। ताड़ासन, भुजंगासन, त्रिकोणासन, पश्चिमोत्तानासन और पवनमुक्तासन जैसे आसन शरीर की संरचना को संतुलित करते हैं। योग से रक्तसंचार बेहतर होता है। पाचन तंत्र मजबूत बनता है। मोटापा नियंत्रित होता है। मधुमेह के जोखिम में कमी आती है। हृदय स्वस्थ रहता है। रीढ़ की समस्याएं कम होती हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है और शरीर को अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है। अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी जैसे प्राणायाम श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाते हैं। योग शरीर को केवल रोगमुक्त ही नहीं बनाता, बल्कि उसे ऊर्जा, स्फूर्ति और दीर्घायु भी प्रदान करता है।

योग और मानसिक स्वास्थ्य : अंतर्मन की शांति का मार्ग

आज तनाव, चिंता, अवसाद और अनिद्रा जैसी समस्याएं वैश्विक महामारी का रूप ले चुकी हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती बन गया है। योग मन को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है। ध्यान और प्राणायाम मस्तिष्क को शांत करते हैं तथा विचारों की अनावश्यक भीड़ को नियंत्रित करते हैं। नियमित योगाभ्यास से तनाव कम होता है। अवसाद में राहत मिलती है। स्मरण शक्ति बढ़ती है। एकाग्रता विकसित होती है। भावनात्मक संतुलन बनता है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। योग मन को केवल शांत नहीं करता, बल्कि उसे सकारात्मक, रचनात्मक और जागरूक भी बनाता है।

योग और आध्यात्मिक उन्नति : आत्मा से परमात्मा तक

योग का सर्वोच्च उद्देश्य आत्मिक जागरण है। यह मनुष्य को उसकी आंतरिक दिव्यता से परिचित कराता है। ध्यान और साधना के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को पहचानता है। धीरे-धीरे उसका मन अहंकार, लोभ, मोह और क्रोध जैसी प्रवृत्तियों से मुक्त होने लगता है। योग व्यक्ति के भीतर करुणा, प्रेम, सहिष्णुता, आत्मसंयम, क्षमा, संतोष, जैसे गुणों का विकास करता है। यही कारण है कि भारतीय ऋषियों ने योग को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना है। योग बाहरी संसार की क्षणभंगुरता से ऊपर उठाकर आत्मिक आनंद की अनुभूति कराता है।

महिलाओं और युवाओं के लिए योग का महत्व

महिलाओं के जीवन में किशोरावस्था, मातृत्व और रजोनिवृत्ति जैसे अनेक जैविक परिवर्तन आते हैं। योग इन परिवर्तनों को संतुलित बनाने में सहायक सिद्ध होता है। योग हार्मोनल संतुलन बनाए रखता है। तनाव और थकान कम करता है। गर्भावस्था में स्वास्थ्य सुधारता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। युवाओं के लिए भी योग अत्यंत आवश्यक है। प्रतिस्पर्धा, करियर दबाव और डिजिटल व्यसन के दौर में योग उन्हें मानसिक संतुलन, अनुशासन और एकाग्रता प्रदान करता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग

आधुनिक विज्ञान ने योग के लाभों को प्रमाणित किया है। विश्वभर के अनेक विश्वविद्यालयों और चिकित्सा संस्थानों में योग पर व्यापक शोध किए जा चुके हैं। शोधों के अनुसार योग कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) कम करता है। रक्तचाप नियंत्रित करता है। प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ाता है। नींद की गुणवत्ता सुधारता है। मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ाता है। हृदय रोगों का जोखिम घटाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी योग और प्राणायाम ने लाखों लोगों को शारीरिक तथा मानसिक रूप से सशक्त बनाए रखने में सहायता की।

वैश्विक स्तर पर योग का प्रभाव : भारत की सांस्कृतिक कूटनीति

आज योग विश्वव्यापी आंदोलन बन चुका है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में करोड़ों लोग नियमित योगाभ्यास करते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विश्व के प्रमुख शहरों, ऐतिहासिक स्मारकों और सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक योग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। योग ने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को नई पहचान दी है। यह भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने का सबसे प्रभावी माध्यम बन गया है। योग यह संदेश देता है कि मानवता की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक विकास में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और वैश्विक सद्भाव में निहित है।

योग के समक्ष चुनौतियां

योग के वैश्विक विस्तार के बावजूद कुछ चुनौतियां भी सामने हैं। व्यावसायीकरण: योग को कई स्थानों पर केवल व्यवसाय और फैशन का माध्यम बना दिया गया है। अधूरी जानकारी: उचित प्रशिक्षण के अभाव में लोग कठिन आसनों का अभ्यास कर लेते हैं जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। जीवनशैली की व्यस्तता: आधुनिक जीवन की तेज गति लोगों को नियमित योगाभ्यास से दूर कर रही है। मूल स्वरूप का संरक्षण: योग के वैश्वीकरण के साथ उसके प्राचीन भारतीय दर्शन और मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखना आवश्यक है।

भविष्य की दिशा : योगमय विश्व की ओर

भविष्य में योग केवल स्वास्थ्य कार्यक्रम न रहकर जीवन प्रबंधन का वैश्विक मॉडल बन सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में योग शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। शोध आधारित योग प्रशिक्षण विकसित किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों तक योग सुविधाएं पहुंचाई जाएं। डिजिटल मंचों के माध्यम से योग को जन-जन तक पहुंचाया जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में योग को प्रमुख स्थान दिया जाए। यदि योग को जीवन शैली के रूप में अपनाया जाए तो यह केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि समाज और विश्व के कल्याण का आधार बन सकता है।

योग मानवता के भविष्य का प्रकाश स्तंभ

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता को स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन की ओर प्रेरित करने वाला वैश्विक आंदोलन है। योग भारतीय संस्कृति की वह अनुपम धरोहर है जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य को शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन, नैतिक अनुशासन और आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की है। आज जब विश्व तनाव, हिंसा, पर्यावरणीय संकट, जीवन शैली जनित रोगों और मानसिक अशांति से जूझ रहा है, तब योग एक समग्र समाधान के रूप में उभरकर सामने आया है। यह व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है, समाज को सामंजस्य प्रदान करता है और विश्व को शांति का संदेश देता है।

वास्तव में योग केवल आसनों का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह शरीर को स्वास्थ्य, मन को शांति, बुद्धि को स्पष्टता और आत्मा को दिव्यता प्रदान करता है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम योग को केवल एक दिवस तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपनी दैनिक जीवन शैली का अभिन्न अंग बनाकर “स्वस्थ मानव, स्वस्थ समाज और स्वस्थ विश्व” के निर्माण में योगदान दें। “योगः कर्मसु कौशलम्” योग जीवन को उत्कृष्टता, संतुलन और पूर्णता की ओर ले जाने वाला सनातन मार्ग है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” यही योग का संदेश है, यही उसका लक्ष्य है और यही मानवता का स्वर्णिम भविष्य भी। यह आलेख नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा विभाग के वरिष्ठ योग चिकित्सक डॉ. आलोक गुप्ता से हुई विस्तृत बातचीत, उनके दीर्घ चिकित्सकीय अनुभव तथा विभिन्न रोगों पर किए गए शोध, अध्ययनों और व्यावहारिक चिकित्सा-विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।