खादी और ग्रामोद्योग: परंपरा से उद्यम तक, गांवों के हुनर को मिल रही नई पहचान

कभी चरखा राष्ट्रवाद और स्वावलंबन का प्रतीक था। आज वही खादी और ग्रामोद्योग ग्रामीण भारत में रोजगार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता का आधार बन रहे हैं। शहद, हर्बल उत्पाद, केले के रेशे, वस्त्र, बेकरी और अगरबत्ती जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक हुनर स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता और नए बाजारों से जुड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं।

वोकल फॉर लोकल से आत्मनिर्भर भारत तक

खादी और ग्रामोद्योग का यह विस्तार ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ा है। वित्त, प्रशिक्षण, तकनीक और बाजार तक बेहतर पहुंच ने पारंपरिक कौशल को नए अवसर दिए हैं। स्थानीय उत्पादों और उपभोक्ताओं के बीच बढ़ता जुड़ाव हर साल आयोजित होने वाले खादी महोत्सव में भी दिखाई देता है। खादी महोत्सव 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक आयोजित किया जाता है। विशेष रूप से युवाओं को केंद्र में रखकर चलाया जाने वाला यह अभियान उन्हें खादी और स्थानीय उत्पादों के प्रति जागरूक करता है तथा देशभर के लोगों को स्थानीय उत्पाद खरीदने के लिए प्रोत्साहित करता है।

KVIC निभा रहा है अहम भूमिका

इस बदलाव के केंद्र में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित यह वैधानिक निकाय ग्रामीण उद्योगों की योजना बनाने, उन्हें बढ़ावा देने, संगठित करने और सहायता उपलब्ध कराने का काम करता है। KVIC प्रशिक्षण, कच्चे माल, विपणन, अनुसंधान, गुणवत्ता सुधार और तकनीकी सहायता के साथ कौशल विकास को भी प्रोत्साहित करता है। इसका उद्देश्य पारंपरिक हुनर को टिकाऊ ग्रामीण उद्यमों में बदलना है।

बिक्री और रोजगार में ऐतिहासिक वृद्धि

वर्ष 2025-26 में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 1.87 लाख करोड़ रुपए के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। मई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 की तुलना में बिक्री में 501% की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में उत्पादन 380% बढ़कर 1,25,296 करोड़ रुपए हो गया, जबकि इस क्षेत्र में रोजगार 56% बढ़कर 2.04 करोड़ हो गया। कारीगरों के पारिश्रमिक में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह 2013-14 में 4 रुपए प्रति लच्छी से बढ़कर वर्तमान में 15 रुपए प्रति लच्छी हो गया है, यानी करीब 275% की वृद्धि। एक लच्छी लंबाई में 840 गज सूत और वजन में एक पाउंड के बराबर होती है।

हुनर से कारोबार तक पहुंच

कारीगरों को प्रशिक्षण से लेकर बाजार तक पहुंच बनाने में मदद देने के लिए KVIC ने विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों का विस्तार किया है। इसके 35 विभागीय और गैर-विभागीय प्रशिक्षण केंद्रों का नेटवर्क है, जहां खाद्य उत्पाद, बेकरी, मधुमक्खी पालन, अगरबत्ती, मोमबत्ती और मोटर मरम्मत जैसी गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। वित्त वर्ष 2025-26 में विभिन्न KVIC प्रशिक्षण कार्यक्रमों के तहत 79,682 लोगों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। खादी क्षेत्र के करीब पांच लाख कारीगरों में 80% से अधिक महिलाएं हैं। इसी अवधि में 47,382 महिलाओं ने विभिन्न KVIC कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षण लिया, जो कुल प्रशिक्षुओं का करीब 59% है।

PMEGP से लाखों लोगों को रोजगार

प्रशिक्षण के साथ टूलकिट, उपकरण, वित्तीय सहायता और विपणन सहयोग भी उपलब्ध कराया जा रहा है। मार्च 2008 से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) ने KVIC के माध्यम से करीब 97.95 लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। बिहार के जितेंद्र बैठा इसका उदाहरण हैं। उन्होंने 2020 में बेकरी उत्पाद निर्माण इकाई स्थापित की। आज उनके उद्यम का वार्षिक टर्नओवर 72 लाख रुपए है और इससे स्थानीय समुदाय के 20 लोगों को रोजगार मिल रहा है। उन्हें उद्यम के लिए वित्तीय सहायता के साथ उत्पादन से जुड़े उपकरण और तकनीकी सहयोग भी मिला।

आधुनिक मशीनों से कारीगरों को ताकत

ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत कारीगरों को आधुनिक मशीनें, टूलकिट और उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वर्ष 2025-26 में 37,769 मशीनें, टूलकिट और उपकरण वितरित किए गए। मई 2026 तक इस योजना के तहत कुल 3.23 लाख से अधिक मशीनें, टूलकिट और उपकरण वितरित किए जा चुके हैं। इस तरह तकनीक का इस्तेमाल पारंपरिक काम को अधिक उत्पादक, गुणवत्तापूर्ण और बाजार के अनुरूप बनाने में मदद कर रहा है।

खादी संस्थानों को बाजार के अनुरूप ढालने पर जोर

खादी विकास योजना के जरिए खादी संस्थानों को उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने, मूल्य संवर्धन करने और बदलती बाजार मांग के अनुसार खुद को ढालने में मदद दी जा रही है। संशोधित बाजार विकास सहायता (MMDA) के जरिए मूल्य संवर्धन और बाजार-उन्मुख मूल्य निर्धारण के लिए अधिक लचीलापन दिया गया है। वर्ष 2024-25 में 1,097 खादी संस्थानों को 245 करोड़ रुपए वितरित किए गए, जिससे 1,45,484 कारीगरों को लाभ मिला।

सस्ते ऋण और बेहतर कार्यस्थल की सुविधा

ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणपत्र (ISEC) योजना के तहत पात्र खादी संस्थानों को 4% वार्षिक रियायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे संस्थानों को कार्यशील पूंजी और विस्तार के लिए अपेक्षाकृत सस्ता वित्त उपलब्ध होता है। कारीगरों के लिए बेहतर कार्यस्थल भी इस प्रयास का हिस्सा है। वर्कशेड योजना के तहत उत्पादन के लिए बेहतर और अधिक अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाता है। वर्ष 2025-26 में दिसंबर 2025 तक 1,309 कारीगर इस योजना से लाभान्वित हुए।

ग्रामीण कारोबार से वैश्विक बाजार तक

तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार संपर्कों के जरिए पारंपरिक कौशल और स्थानीय संसाधनों को नए उत्पादों और व्यवसायों में बदला जा रहा है। अनुसंधान एवं विकास से उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। पंजाब के एस.पी. सिंह ने KVIC के जरिए PMEGP योजना के तहत मिले सहयोग से शहद और कुकीज का कारोबार शुरू किया। उनका उद्यम अब करीब 200 श्रमिकों को रोजगार देता है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपने उत्पादों का निर्यात करता है। शहद और कुकीज उनके प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं, जिनके निर्यात का बड़ा हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका को जाता है।

36 देशों तक पहुंचा शहद और कुकीज का कारोबार

2010 में सहायता मिलने के बाद इस उद्यम ने अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी के जरिए अपनी निर्यात उपस्थिति का विस्तार किया। KVIC ने दुबई, संयुक्त राज्य अमेरिका और मध्य पूर्व में आयोजित प्रदर्शनियों में भागीदारी सुगम बनाई, जिससे विदेशी खरीदारों से संपर्क स्थापित करने में मदद मिली। आज यह कारोबार 36 देशों में अपने उत्पादों का निर्यात करता है। यूरोपीय बाजार में शहद निर्यात बढ़ाने के लिए राजपुरा, पंजाब में दूसरी इकाई विकसित की जा रही है।

स्थानीय संसाधन से मूल्यवर्धित उत्पाद

बी. सुंदरराज ने प्राकृतिक सुगंधित पौधे को ग्रामीण उद्यम का आधार बनाया। उनकी अगरबत्ती इकाई में अगरबत्ती, हर्बल उत्पाद, वेटिवर यानी खस अगरबत्ती और वेटिवर सांब्रानी का उत्पादन होता है। वर्ष 2024-25 में ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत मिली सहायता से उन्होंने विनिर्माण क्षमता मजबूत की और उत्पाद श्रृंखला का विस्तार किया। यह उदाहरण दिखाता है कि स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को बाजार में मांग वाले मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला जा सकता है।

स्थानीय जरूरतों से रोजगार का सृजन

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के जट्टीमाजरा गांव के साहिल चौधरी मोनो-कार्टन निर्माण इकाई चलाते हैं। यह इकाई क्षेत्र की निर्माण और पैकेजिंग संबंधी जरूरतों को पूरा करती है। 25 लाख रुपए की परियोजना लागत से स्थापित यह उद्यम KVIC समर्थित PMEGP के तहत संचालित होता है। अब इसका वार्षिक टर्नओवर करीब 45 लाख रुपए है और यह 23 लोगों को रोजगार देता है। वित्तीय सहायता ने एक स्थानीय उद्यमी के विचार को कार्यशील विनिर्माण इकाई में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डिजिटल और भौतिक बाजार का विस्तार

KVIC ने ग्रामीण उत्पादों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए डिजिटल और भौतिक दोनों माध्यमों का विस्तार किया है। खादी इंडिया का ऑनलाइन स्टोर कपड़े, वस्त्र, किराना, सौंदर्य उत्पाद, आवश्यक तेल, इत्र और अगरबत्ती समेत विभिन्न उत्पाद उपलब्ध कराता है। खादी इंडिया ब्रांड के प्रचार और विपणन के लिए भी कई पहल की जा रही हैं। देशभर में 8 विभागीय खादी इंडिया बिक्री केंद्र और 15 KVIC शाखाएं हैं। इसके अलावा खादी संस्थान 8,035 अन्य बिक्री केंद्रों का संचालन करते हैं। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, राज्य और जिला स्तर की प्रदर्शनियां ग्रामीण उत्पादों को नए बाजार उपलब्ध कराती हैं। KVIC घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में भागीदारी के जरिए कारीगरों और उद्यमों को व्यापक बाजार से जोड़ने का काम भी करता है।

फैशन की दुनिया में खादी की नई पहचान

खादी अब केवल पारंपरिक परिधान तक सीमित नहीं रह गई है। फैशन जगत में इसे आधुनिक डिजाइनों और नई तकनीकों के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। न्यूजीलैंड फैशन वीक 2026 और लैक्मे फैशन वीक 2025 जैसे मंचों पर खादी की कारीगरी और आधुनिक रूप देखने को मिला। इन मंचों पर पारंपरिक तकनीकों को समकालीन डिजाइन के साथ जोड़कर खादी को आधुनिक और वैश्विक पहचान देने की कोशिश की गई।

विरासत से अवसर तक का सफर

खादी और ग्रामोद्योग का बदलता स्वरूप बढ़ती बिक्री, उत्पादन, रोजगार, कारीगरों के पारिश्रमिक और नए ग्रामीण उद्यमों में दिखाई देता है। पारंपरिक हुनर जब तकनीक, वित्त, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ता है तो वह केवल विरासत नहीं रहता, बल्कि रोजगार और उद्यमिता का मजबूत आधार बन जाता है। चरखे से शुरू हुई स्वावलंबन की भावना आज ग्रामीण भारत में नए कारोबार, नए बाजार और नए अवसरों का रूप ले रही है। यही बदलाव खादी और ग्रामोद्योग को परंपरा से आधुनिक ग्रामीण उद्यम तक पहुंचाने की कहानी को नई पहचान देता है। (इनपुट: पीआईबी)