केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अकेले दक्षिण एशिया में 750 मिलियन से अधिक लोग गंभीर जलवायु खतरों में हैं, जिनमें हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर तटीय बाढ़ और शहरी ऊष्मा द्वीप शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली, ढाका, बैंकॉक और मनीला 2050 तक जलवायु के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील महानगरों में शामिल होंगे।
डॉ. सिंह ने बताया कि शहरीकरण, प्रगति का प्रतीक है, लेकिन अनियोजित विस्तार, बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण, भूजल भंडार में कमी और बढ़ते प्रदूषण के कारण यह एक बड़ी चुनौती के रूप में भी उभरा है।
कल गुरुवार को जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली में एशियाई भूगोल सम्मेलन (एसीजी 2025) में उद्घाटन भाषण देते हुए, केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन समयानुकूल और महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तीन गहन रूप से परस्पर जुड़े मुद्दों – जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सतत संसाधन प्रबंधन की बात करता है, जो सामूहिक रूप से हमारे साझा भविष्य के स्थायित्व को निर्धारित करते हैं।
इस दौरान, उन्होंने भारत में इस प्रतिष्ठित सम्मेलन के पहले संस्करण की मेजबानी के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया की सराहना की और इन वैश्विक चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों को एक साथ लाने के लिए कुलपति प्रोफेसर मजहर अली और आयोजन टीम की सराहना की।
2014 में श्रीनगर में आई बाढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी आपदाएं केवल प्राकृतिक ही नहीं होतीं, बल्कि अक्सर मानवीय लापरवाही और खराब योजना के कारण और भी गंभीर हो जाती हैं। उन्होंने चिंताजनक आंकड़े दिए: विकासशील एशियाई देशों में लगभग 80% अपशिष्ट जल बिना उपचारित किए ही बहा दिया जाता है, और शहरी भारत में सालाना 5.5 करोड़ टन से ज़्यादा ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो प्रति वर्ष 5% की दर से बढ़ रहा है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने ज़ोर देकर कहा कि अपशिष्ट-से आमदनी तकनीकें और चक्रीय अर्थव्यवस्था की पहल भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, जहां “कचरे” की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी। देहरादून का उदाहरण देते हुए, उन्होंने प्रयुक्त खाद्य तेल पुनर्चक्रण जैसी सफल पहलों का उल्लेख किया, जो न केवल पर्यावरणीय लक्ष्यों का समर्थन करती हैं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर आय भी उत्पन्न करती हैं।
उन्होंने इसरो के पृथ्वी अवलोकन मिशन, राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (2022) और स्वामित्व कार्यक्रम के तहत भारतीय सर्वेक्षण विभाग के ड्रोन-आधारित मान चित्रण का उल्लेख किया, जिसने जलवायु सुदृढ़ता की योजना और निगरानी को बदल दिया है।
उन्होंने एक स्थायी भविष्य को आकार देने में शिक्षा, युवाओं और विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी प्रकाश डाला। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि नया शैक्षणिक ढाँचा छात्रों को अपनी वास्तविक योग्यताओं का पता लगाने और भूगोल जैसे अंतःविषय विषयों से जुड़ने में सक्षम बनाता है, जो पर्यावरणीय समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
डॉ. सिंह ने कहा, “युवाओं को स्थायित्व के ज्ञान और उपकरणों से सशक्त बनाना, हमारे साझा भविष्य में सबसे शक्तिशाली निवेश है।”
सम्मेलन के आयोजन के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया का आभार व्यक्त करते हुए, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि ऐसे मंच अकादमिक सहयोग, नीतिगत संवाद और पर्यावरणीय चुनौतियों पर युवाओं की भागीदारी को मज़बूत करते हैं। उन्होंने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की, कि “जलवायु केवल नीति निर्माताओं या वैज्ञानिकों की चिंता का विषय नहीं है; हमारे अपने स्वास्थ्य, हमारी अपनी भलाई और हमारे बच्चों के भविष्य के लिए, यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत चिंता है।” (इनपुट-पीआईबी)


