गलत जानकारी मोटापे से भी खतरनाक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी: केंद्रीय मंत्री

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि देश में योग्यता-हीन प्रैक्टिशनर्स और खुद को डाइटिशियन बताने वाले लोग गलत सलाह देकर भारत में मोटापे की समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।

पंचकूला, हरियाणा में चल रहे इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF) में एक पैनल चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि समाज के व्यवहार, बाज़ार के प्रभाव और गलत जानकारियों ने मोटापे की स्थिति को उलझा दिया है।

उन्होंने कहा, “भारत में समस्या जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि गलत जानकारी की बाढ़ है। हर कॉलोनी में एक डाइटिशियन मिल जाएगा, लेकिन उनकी योग्यता जांचने की कोई व्यवस्था नहीं है। कई बार ऐसी सलाह मोटापे से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।”

मंत्री ने बताया कि मोटापा केवल दिखावे का मुद्दा नहीं बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है, जिसे वैज्ञानिक तरीके और नीतिगत अनुशासन से संभालने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज लंबे समय तक मोटापे को बीमारी की तरह नहीं देखता था, जिससे वैज्ञानिक बातचीत में भी देरी हुई।

भारत में खास तौर पर केन्द्रीय/विसरल मोटापा ज्यादा पाया जाता है, जो कि वजन सामान्य दिखने पर भी खतरनाक हो सकता है।

उन्होंने लोकप्रिय हो रहे GLP आधारित वजन-कम करने वाले ड्रग्स के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि कई दवाओं के दीर्घकालिक प्रभाव कई वर्षों बाद समझ आते हैं।

उन्होंने 70-80 के दशक में बिना जांचे-परखे रिफाइंड तेलों की ओर हुए बदलाव का उदाहरण दिया, जिसके नुकसान बाद में सामने आए।

जितेंद्र सिंह ने सारकोपेनिया और “ओज़ेम्पिक फेस” जैसी उभरती चिंताओं का भी जिक्र किया, जो तेज या दवा-आधारित वजन घटाने से जुड़ी हैं।

उन्होंने कहा, “पहले हर तीसरे ओपीडी मरीज को अनजाना डायबिटीज़ मिलता था; अब हर तीसरे मरीज में फैटी लिवर दिख रहा है। समस्या का दायरा बढ़ रहा है और हमें अधिक वैज्ञानिक और नियंत्रित ढांचे की जरूरत है।”