राष्ट्रीय पोषण सप्ताह : पोषित भारत की राह में चुनौतियां और समाधान

किसी देश की प्रगति का आकलन केवल आर्थिक वृद्धि, बड़ी परियोजनाओं, तकनीकी उपलब्धियों या आधुनिक बुनियादी ढांचे से नहीं किया जा सकता। राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा, कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता में दिखाई देती है। स्वस्थ और पोषित आबादी देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में अधिक प्रभावी योगदान देती है, जबकि कुपोषण विकास की गति को कमजोर करता है। इसलिए पोषण अब केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि मानव संसाधन, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन गया है।

भारत में हर वर्ष 1 से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1982 में हुई थी। इसका उद्देश्य लोगों को संतुलित आहार, पोषण और स्वस्थ जीवन शैली के प्रति जागरूक करना है। आज भारत कुपोषण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक ओर बच्चों में अल्पपोषण, महिलाओं में एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याएं मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर शहरी और युवा आबादी में मोटापा, अस्वास्थ्यकर खान-पान तथा जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। पौष्टिक, सुरक्षित और विविध आहार के साथ सही पोषण संबंधी जानकारी भी जरूरी है। सरकार के प्रयासों के साथ परिवार, स्कूल, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्यकर्मी और समुदाय की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। राष्ट्रीय पोषण सप्ताह इसी सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित करता है कि स्वस्थ थाली ही स्वस्थ समाज और मजबूत राष्ट्र की आधारशिला है।

पोषण का अर्थ केवल पेट भरना नहीं

पोषण का अर्थ केवल पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा और सभी जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराना है। भोजन में प्रोटीन, विटामिन, खनिज, आयरन, कैल्शियम, आयोडीन, जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा भी जरूरी है। पर्याप्त भोजन मिलने के बावजूद यदि शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिलते, तो व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो सकता है। इसे कई बार ‘छिपी भूख’ कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को भूख की कमी महसूस नहीं होती, लेकिन शरीर पोषक तत्वों की कमी से प्रभावित होता है। इसका असर विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और बुजुर्गों पर पड़ सकता है। बच्चों में पोषण की कमी शारीरिक एवं मानसिक विकास और सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है, जबकि महिलाओं में आयरन की कमी एनीमिया का कारण बनती है। लंबे समय तक पोषण की कमी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर करती है। इसलिए संतुलित, विविध और पोषक आहार स्वस्थ जीवन की बुनियादी जरूरत है।

भारत में कुपोषण की दोहरी चुनौती

भारत ने खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज देश में भोजन की उपलब्धता पहले से बेहतर है, फिर भी कुपोषण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बच्चों में स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट जैसी समस्याएं तथा महिलाओं और बच्चों में एनीमिया अब भी गंभीर चुनौती हैं। दूसरी ओर बदलती जीवन शैली के कारण मोटापा भी बढ़ रहा है। शारीरिक गतिविधियों की कमी, लंबे समय तक स्क्रीन का उपयोग और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन इस समस्या को बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत की पोषण चुनौती का स्वरूप बदल गया है। अब केवल पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और लोगों की खान-पान की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। यही दोहरा संकट व्यापक और संतुलित पोषण नीति की जरूरत को रेखांकित करता है।

बच्चों के स्वस्थ विकास की नींव है पोषण

बच्चों के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं। गर्भावस्था से लेकर दो वर्ष की उम्र तक का समय, जिसे जीवन के पहले 1,000 दिन कहा जाता है, पोषण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इस दौरान मां को पर्याप्त और संतुलित आहार मिलना जरूरी है, क्योंकि गर्भावस्था में पोषक तत्वों की कमी बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकती है। जन्म के बाद शुरुआती घंटे में स्तनपान शुरू करना और पहले छह महीने तक केवल मां का दूध देना बच्चे के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। छह महीने के बाद स्तनपान के साथ उम्र के अनुरूप पूरक आहार शुरू किया जाना चाहिए। बच्चे के भोजन में दाल, अनाज, सब्जियां, फल, दूध और अन्य उपयुक्त प्रोटीन स्रोतों की विविधता होनी चाहिए। केवल भोजन की मात्रा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।जीवन के शुरुआती वर्षों में उचित पोषण बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को बेहतर आधार देता है। इसलिए कुपोषण से लड़ाई की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था से ही होनी चाहिए।

मातृ पोषण से जुड़ा है अगली पीढ़ी का स्वास्थ्य

पोषण के क्षेत्र में महिलाओं और विशेषकर किशोरियों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ मां ही स्वस्थ बच्चे की नींव रखती है। किशोरावस्था में पोषण की कमी, खासकर आयरन की कमी और एनीमिया, शारीरिक क्षमता, पढ़ाई और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है तथा आगे चलकर गर्भावस्था के दौरान भी समस्याएं बढ़ा सकती है। इसलिए किशोरियों को संतुलित आहार, आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों के महत्व की जानकारी देना आवश्यक है। परिवारों में भी यह सोच बदलनी होगी कि लड़कियों और महिलाओं के भोजन को कम महत्व दिया जाए। महिला का पोषण केवल उसके स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि परिवार और अगली पीढ़ी के बेहतर स्वास्थ्य से जुड़ा निवेश है।

एनीमिया से लड़ना क्यों जरूरी है

भारत में पोषण संबंधी चर्चा में एनीमिया को विशेष महत्व देना जरूरी है। शरीर में आयरन की कमी एनीमिया का एक प्रमुख कारण हो सकती है। इसके कारण थकान, कमजोरी और कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया विशेष चिंता का विषय है। गर्भावस्था के दौरान इसकी स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसलिए आयरन से भरपूर भोजन, आवश्यकतानुसार आयरन-फोलिक एसिड की खुराक और स्वास्थ्य जांच को पोषण कार्यक्रमों से जोड़ना जरूरी है। हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, अनाज और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थ आयरन सहित कई पोषक तत्वों के स्रोत हो सकते हैं। लेकिन केवल भोजन के स्तर पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं और नियमित जांच के स्तर पर भी एनीमिया की रोकथाम आवश्यक है।

स्थानीय और पारंपरिक भोजन में समाधान

पौष्टिक भोजन को अक्सर महंगे खाद्य पदार्थों से जोड़कर देखा जाता है, जबकि भारत की पारंपरिक खाद्य संस्कृति में कई ऐसे स्थानीय और किफायती विकल्प मौजूद हैं, जो पर्याप्त पोषण दे सकते हैं। दालें, मोटे अनाज यानी श्रीअन्न, हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध-दुग्ध उत्पाद और स्थानीय प्रोटीन स्रोत भोजन को संतुलित बना सकते हैं। पारंपरिक भारतीय थाली में शामिल इन खाद्य पदार्थों को आधुनिक जीवन शैली में फिर अपनाने की जरूरत है। स्थानीय और मौसमी भोजन को बढ़ावा देने से पोषण के साथ किसानों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है। इसलिए बेहतर पोषण के लिए महंगे खाद्य पदार्थ जरूरी नहीं हैं। सही जानकारी और स्थानीय संसाधनों का समझदारी से उपयोग भी पोषण सुधार का प्रभावी माध्यम है।

बदलती जीवन शैली ने बढ़ाई नई चिंता

भारत में आर्थिक और सामाजिक बदलाव के साथ खान-पान की आदतों में भी तेजी से परिवर्तन आया है। शहरों में व्यस्त जीवन शैली के कारण घर के भोजन की जगह बाहर का खाना और पैकेज्ड खाद्य पदार्थ बढ़े हैं। फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा अधिक हो सकती है। इनके अधिक सेवन के साथ शारीरिक गतिविधियों की कमी मोटापा और गैर-संचारी रोगों का जोखिम बढ़ा सकती है। बच्चों और युवाओं में लंबे समय तक मोबाइल, कंप्यूटर और टेलीविजन का इस्तेमाल तथा खेलकूद के लिए कम समय चिंता का विषय है। इसलिए पोषण अभियान में संतुलित आहार के साथ नियमित व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।

पोषण और गैर-संचारी रोगों का संबंध

गलत खान-पान और निष्क्रिय जीवन शैली का संबंध केवल मोटापे से नहीं है। लंबे समय में इससे मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसका अर्थ यह है कि पोषण नीति को जीवन के हर चरण से जोड़ना होगा। बच्चे के लिए पौष्टिक भोजन जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वयस्क के लिए संतुलित भोजन और स्वस्थ जीवन शैली है। भारत में गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। यदि भोजन की आदतों और जीवन शैली में समय रहते सुधार किया जाए तो कई बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। इसलिए राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का संदेश केवल यह नहीं होना चाहिए कि कम खाना या ज्यादा खाना गलत है, बल्कि यह होना चाहिए कि सही मात्रा में सही और विविध भोजन करना जरूरी है।

गरीबी और पोषण का गहरा संबंध

कुपोषण का एक बड़ा कारण आर्थिक असमानता भी है। कम आय वाले परिवारों के सामने अक्सर यह चुनौती रहती है कि सीमित आय में परिवार के सभी सदस्यों के लिए पौष्टिक भोजन कैसे उपलब्ध कराया जाए। जब परिवार की आय कम होती है तो भोजन में विविधता प्रभावित हो सकती है। कई बार परिवार पेट भरने के लिए सस्ता भोजन तो खरीद लेता है, लेकिन उसमें जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त नहीं होते। इससे एक चक्र बन सकता है। गरीबी, पोषण की कमी, खराब स्वास्थ्य, कम कार्यक्षमता और फिर आर्थिक कमजोरी। इसलिए कुपोषण को समाप्त करने के लिए रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसी नीतियों को भी पोषण के साथ जोड़कर देखना होगा। पोषण सुधार तभी टिकाऊ होगा जब परिवारों की आर्थिक क्षमता भी मजबूत होगी।

स्वच्छ पानी और स्वच्छता भी जरूरी

पोषण और स्वच्छता का संबंध भी बहुत गहरा है। अगर बच्चे को पौष्टिक भोजन मिले लेकिन पीने का पानी दूषित हो या आसपास स्वच्छता की कमी हो तो संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है। बार-बार होने वाले संक्रमण का असर बच्चे की सेहत और पोषण पर पड़ सकता है। इसलिए पोषण कार्यक्रमों को स्वच्छ पेयजल, शौचालय, हाथ धोने की आदत और साफ-सफाई से जोड़ना आवश्यक है। यानी पोषण की पूरी तस्वीर में भोजन, स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छता सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

सरकारी योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका

भारत सरकार ने कुपोषण से निपटने के लिए कई योजनाएं और अभियान शुरू किए हैं। इनमें पोषण अभियान का उद्देश्य कुपोषण को मिशन मोड में कम करना और पोषण को जन आंदोलन बनाना रहा है। इसके बाद ‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0’ के माध्यम से पोषण सेवाओं, आंगनबाड़ी व्यवस्था और लाभार्थियों तक पहुंच को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोरियों को इन कार्यक्रमों में विशेष महत्व दिया गया है। आंगनबाड़ी केंद्र इन प्रयासों की जमीनी कड़ी हैं। हालांकि, योजनाओं की सफलता बजट और घोषणाओं से नहीं, बल्कि जरूरतमंदों तक सेवाओं की प्रभावी पहुंच से तय होगी।

डिजिटल तकनीक से मजबूत हो रही निगरानी

पोषण योजनाओं की निगरानी में डिजिटल तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पोषण ट्रैकर जैसी व्यवस्था के माध्यम से लाभार्थियों और आंगनवाड़ी सेवाओं से संबंधित जानकारी को डिजिटल रूप से दर्ज और मॉनिटर करने का प्रयास किया जा रहा है। डेटा आधारित व्यवस्था से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन क्षेत्रों में कुपोषण अधिक है, किन बच्चों को विशेष सहायता की जरूरत है और सरकारी सेवाओं की पहुंच कहां कमजोर है। हालांकि डिजिटल व्यवस्था की सफलता के लिए जमीनी स्तर पर सही आंकड़े, प्रशिक्षित कर्मचारी और पर्याप्त तकनीकी संसाधन जरूरी हैं। डेटा तभी उपयोगी होगा जब वह सही, समय पर और वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाला हो।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका

कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे गांव और समुदाय के स्तर पर सरकार की पोषण व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। बच्चों के वजन और विकास की निगरानी, महिलाओं को पोषण संबंधी जानकारी देना, बच्चों के भोजन और स्वास्थ्य से संबंधित व्यवहार में सुधार के लिए परिवारों को जागरूक करना जैसे कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए आंगनबाड़ी व्यवस्था को केवल भवन या केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि समुदाय आधारित पोषण व्यवस्था के रूप में मजबूत करने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन और तकनीकी सहायता मिले तो उनकी प्रभावशीलता और बढ़ सकती है।

स्कूलों को बनाना होगा पोषण शिक्षा का केंद्र

बच्चों में स्वस्थ खान-पान की आदतें बचपन से ही विकसित होती हैं। इसलिए स्कूल पोषण जागरूकता के महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। बच्चों को केवल किताबों में पोषण के बारे में पढ़ाने के बजाय उन्हें व्यावहारिक रूप से स्वस्थ भोजन, साफ-सफाई और शारीरिक गतिविधियों का महत्व समझाया जाना चाहिए। स्कूलों में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता, जंक फूड से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता और खेलकूद के लिए पर्याप्त अवसर बच्चों के स्वस्थ भविष्य में योगदान दे सकते हैं। अगर बच्चे छोटी उम्र से संतुलित भोजन की आदत सीखते हैं तो इसका लाभ उन्हें पूरी जिंदगी मिल सकता है।

पोषण को जन आंदोलन बनाने की जरूरत

सरकार अकेले कुपोषण को समाप्त नहीं कर सकती। परिवार और समुदाय की भागीदारी इसके लिए जरूरी है। किसी बच्चे को क्या खाना है, यह फैसला सबसे पहले परिवार करता है। गर्भवती महिला को कितना पौष्टिक भोजन मिलेगा, इसमें परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किशोरी की भोजन संबंधी जरूरतों को समझना भी परिवार की जिम्मेदारी है। इसी तरह पंचायत, स्वयं सहायता समूह, स्कूल, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य कर्मी और स्थानीय संगठन मिलकर पोषण को जन आंदोलन का रूप दे सकते हैं। पोषण के बारे में केवल एक सप्ताह या एक महीने तक जागरूकता अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

जलवायु परिवर्तन भी पोषण के लिए चुनौती

जलवायु परिवर्तन का असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी और दूसरी प्राकृतिक घटनाएं खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। जब कृषि उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और कीमत दोनों पर असर पड़ सकता है। इसका सबसे अधिक असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। ऐसे परिवार महंगे खाद्य पदार्थों की जगह कम कीमत वाले भोजन पर निर्भर होने लगते हैं और उनके भोजन की विविधता घट सकती है। इसलिए भविष्य की पोषण रणनीति को जलवायु परिवर्तन के साथ जोड़ना होगा। स्थानीय और विविध फसलों को बढ़ावा देना, टिकाऊ कृषि और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना इस दिशा में उपयोगी हो सकता है।

भारत के सामने प्रमुख चुनौतियां

भारत ने पोषण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन अभी कई चुनौतियां बाकी हैं। पहली चुनौती है क्षेत्रीय असमानता। देश के अलग-अलग राज्यों और जिलों में पोषण की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए हर क्षेत्र के लिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार रणनीति बनानी होगी। दूसरी चुनौती है महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया। इसे केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय मानने के बजाय शिक्षा, महिला एवं बाल विकास और खाद्य सुरक्षा से जोड़ना होगा। तीसरी चुनौती है शहरी कुपोषण और मोटापा। शहरों में अस्वास्थ्यकर खान-पान और निष्क्रिय जीवन शैली से उत्पन्न समस्याओं पर अधिक ध्यान देना होगा। चौथी चुनौती है पोषण संबंधी सही जानकारी का अभाव। कई बार परिवार सामाजिक मान्यताओं या गलत धारणाओं के कारण बच्चों और महिलाओं को सही भोजन नहीं दे पाते। पांचवीं चुनौती है योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन। यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

आगे की राह : पोषण नीति में क्या बदलाव जरूरी?

भारत को पोषण के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए जीवन-चक्र आधारित रणनीति अपनानी होगी। गर्भवती महिलाओं और किशोरियों से लेकर नवजात, बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग की पोषण संबंधी जरूरत अलग होती है। जीवन के पहले 1,000 दिनों में बच्चे के पोषण और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिए आंगनबाड़ी और प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के साथ स्कूलों में पोषण शिक्षा प्रभावी बनानी होगी। स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देना तथा एनीमिया की रोकथाम के लिए पोषण, स्वास्थ्य जांच और अनुपूरण को एकीकृत करना जरूरी है। वहीं मोटापा और गैर-संचारी रोगों से बचाव के लिए संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि को प्रोत्साहित करना होगा। पोषण को सरकारी योजना नहीं, व्यापक सामाजिक आंदोलन बनाना समय की जरूरत है।

पोषित भारत ही विकसित भारत की मजबूत नींव

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह हमें यह समझने का अवसर देता है कि देश का भविष्य उसकी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ा है। स्वस्थ और पोषित बच्चे, मजबूत महिलाएं तथा संतुलित खान-पान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने वाले युवा देश की मानव पूंजी को मजबूत बनाते हैं। भारत ने खाद्य उत्पादन, स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन कुपोषण की चुनौती लगातार बदल रही है। अब अल्पपोषण के साथ एनीमिया, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, मोटापा और अस्वास्थ्यकर खान-पान से भी एक साथ मुकाबला करना होगा।

सरकारी योजनाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी सफलता के लिए परिवार, स्कूल, आंगनबाड़ी और समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। पोषण को केवल भोजन की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, विविधता, स्वच्छता और स्वस्थ जीवनशैली से जोड़कर देखना होगा। एक पोषित बच्चा बेहतर सीख सकता है, स्वस्थ युवा अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है और स्वस्थ नागरिक देश के विकास में अधिक योगदान दे सकता है।इसलिए पोषण पर किया गया हर निवेश वास्तव में देश के भविष्य में निवेश है। राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का संदेश केवल सात दिनों तक सीमित न रहकर पूरे वर्ष और हर परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनना चाहिए। स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ समाज और मजबूत राष्ट्र की आधारशिला हैं।

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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