मां सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप हैं, जिन्हें नवरात्रि के नौवें दिन (महानवमी) पूजा जाता है। ‘सिद्धि’ का अर्थ है ‘पूर्णता’ या ‘सिद्धि प्राप्त होना’, और ‘दात्री’ का अर्थ है ‘देने वाली’। यह देवी अपने भक्तों को ऐसी क्षमताएं प्रदान करती हैं, जो उन्हें सफलता पाने में मदद करती हैं। तीनों लोकों के प्राणी-देवता, असुर और मनुष्य—सभी इनकी पूजा करते हैं।

इस दिन महिलाएं अपने घरों में पूजा करती हैं, व्रत रखती हैं और छोटी बच्चियों को अपने घर बुलाकर उन्हें प्रसाद (पूजा या अनुष्ठानों का भोग) देती हैं। कन्या पूजन के साथ-साथ कई लोग अपने अस्त्र-शस्त्र, वाहनों और व्यावसायिक औजारों की भी पूजा करते हैं।
मां सिद्धिदात्री का स्वरूप
देवी सिद्धिदात्री के चेहरे पर एक आनंदमयी भाव है। उनके चार हाथ हैं, जिनमें उन्होंने चक्र, शंख, त्रिशूल और गदा धारण कर रखे हैं। कुछ चित्रों और मूर्तियों में उन्हें त्रिशूल के स्थान पर कमल का फूल पकड़े हुए दिखाया गया है। वे एक खिले हुए कमल पर विराजमान हैं और शेर की सवारी करती हैं। मान्यता है कि भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से सभी सिद्धियों को प्राप्त किया था और अर्धनारीश्वर रूप धारण किया था।


सिद्धिदात्री की उत्पत्ति
पौराणिक मान्यताओं अनुसार एक बार पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया था। उस अंधकार में एक छोटी सी किरण प्रकट हुई। धीरे-धीरे यह किरण बड़ी होती गई और फिर इसने एक दिव्य नारी का रूप धारण कर लिया। तब मां सिद्धिदात्री ने प्रकट होकर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, और महेश को जन्म दिया। इन्हीं देवी मां की शिव जी ने आराधना की। देवी ने उन्हें सिद्धियां प्रदान की। इसी कारण देवी मां भगवती का नौवां स्वरूप मां सिद्धिदात्री कहलाया।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार जब सभी देवी देवता महिषासुर के अत्याचार से परेशान हो गए थे तब सभी देवताओं ने त्रिदेवों की शरण ली और फिर तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) ने अपने तेज से मां सिद्धिदात्री को जन्म दिया था। इसके बाद सभी देवताओं ने इन्हें अपने शस्त्र प्रदान किए और माता ने महिषासुर से युद्धकर उसका अंत कर दिया।

आठ सिद्धियॉं
माना जाता है कि भगवान शिव ने सर्वोच्च देवी, महाशक्ति की आराधना करके सभी सिद्धियॉं प्राप्त की थीं। शक्ति देवी के आशीर्वाद से, भगवान शिव के बाईं ओर से सिद्धिदात्री की उत्पत्ति हुई। यही कारण है कि भगवान शिव को ‘अर्धनारीश्वर’ के रूप में जाना जाता है। मां की पूजा से भक्त को अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व — ये अष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
1. अणिमा – परमाणु के आकार जितना छोटा हो जाने की शक्ति – इस शक्ति के कारण भगवान हनुमान ने लंका द्वीप पर, किसी को पता चले बिना माता सीता की खोज करने के लिए, स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म रूप में बदल लिया था।
2. महिमा – आकार में विशाल हो जाने की शक्ति – भगवान हनुमान ने लंका द्वीप को जलाने के लिए अपना रूप अत्यंत विशाल कर लिया था। भगवान विष्णु ने भी अपने वामन अवतार में एक विशाल रूप धारण किया था। उन्होंने केवल तीन पगों में तीनों लोकों को नाप लिया था।
3. गरिमा – वजन में अत्यंत भारी हो जाने की शक्ति
4. लघिमा – वजन में अत्यंत हल्का हो जाने की शक्ति
5. प्राप्ति – किसी भी समय, अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी प्राप्त कर लेने की शक्ति
6. प्राकाम्य–अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी करने की शक्ति, जैसे हवा में उड़ना या पानी पर चलना
7. ईशित्व – सृष्टि के सभी तत्वों पर प्रभुत्व या शक्ति
8. वशित्व–सभी प्राकृतिक शक्तियों को नियंत्रित करने की क्षमता, तथा जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण रखने की शक्ति

पूजा विधि
इस दिन कन्या पूजन, हवन और मां को हलवा-पूरी, खीर का भोग लगाया जाता है।
मंत्र:ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
सिद्धगन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
जब हम सिद्धिदात्री देवी की पूजा करते हैं, तो दिव्य ऊर्जा जीवन में चमत्कार होने का मार्ग प्रशस्त करती है। यह ऊर्जा असंभव को भी संभव बना देती है। व्यक्ति लीक से हटकर सोचने में सक्षम हो जाते हैं और सामान्य तर्क-बुद्धि की सीमाओं से परे जा पाते हैं। समय और स्थान के दायरे से कहीं आगे तक देखने की यह क्षमता, आपको जीवन में ऐसी चीजें हासिल करने में मदद करती है जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस दिव्य मातृशक्ति की पूजा करने से आपको अपने उन प्रयासों का फल प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जो आपके हाथ में नहीं हैं। यही सिद्धिदात्री देवी का महत्व है।


