29/10/25 | 8:34 pm

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यमुना पर नकारात्मक राजनीति: श्रद्धा और संस्कृति में भी विभाजन खोजने वालों को जनता का जवाब

छठ पर्व लोकआस्था, शुद्धता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह पर्व उस जीवन-दर्शन का हिस्सा है जिसमें जल, सूर्य और धरती को देवत्व का रूप दिया गया है लेकिन इस पर्व को भी नकारात्मक राजनीति ने नहीं बख्शा। आस्था का सम्मान न कर यमुना को जिस तरह से राजनीति का जरिया बनया गया उससे सवाल उठना लाजिमी है कि श्रद्धा और संस्कृति में भी विभाजन खोजने वालों की कोई सीमा है?

हाल ही में दिल्ली में छठ पर्व के अवसर पर जो दृश्य देखने को मिला उसने वर्षों पुराने दृश्य को पलट दिया। पहले जहां श्रद्धालु झागदार और गंदे पानी में पूजा, स्नान करने को मजबूर थे, वहीं इस बार दिल्ली में सरकार ने स्वच्छ जल की व्यवस्था, साफ घाटों, रोशनी और सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए। श्रद्धालुओं ने निश्चिंत होकर आस्था का पर्व मनाया। यह परिवर्तन प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ लोकपरंपरा के प्रति संवेदनशीलता का प्रमाण था।

इस सकारात्मक पहल पर भी राजनीति हावी हो गई। विपक्षी दलों ने इस प्रयास को जनसहभागिता और आस्था का उत्सव मानने के बजाय ‘राजनीतिक दिखावा’ बताने का प्रयास किया। प्रश्न यह है कि क्या स्वच्छ यमुना और स्वच्छ पर्व की पहल को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जाना चाहिए? क्या हर कार्य का मूल्यांकन अब केवल दलगत दृष्टि से ही होगा?

राजनीति और आस्था के बीच की रेखा धुंधली क्यों?

दिल्ली में यमुना का शुद्धिकरण केवल प्रशासनिक कार्य नहीं बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। वर्षों तक प्रदूषण की मार झेलने के बाद जब श्रद्धालुओं को स्वच्छ जल में छठ मनाने का अवसर मिला तो यह केवल सरकार की सफलता नहीं बल्कि सामूहिक आस्था की जीत थी। इसके बावजूद जब विपक्ष इस प्रयास की आलोचना करता है तो वह न केवल सरकार बल्कि समाज की भावनाओं को भी आहत करता है।

छठ पर्व बिहार और पूर्वांचल की अस्मिता से जुड़ा लोकपर्व है। करोड़ों लोगों की श्रद्धा इस पर्व से बंधी है। यह त्योहार स्वच्छता, संयम और परिवार-समर्पण का प्रतीक है लेकिन हाल के दिनों में विपक्ष के नेताओं द्वारा दिए गए बयान ने इस पर्व की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। राहुल गांधी ने जिस तरह से छठ और उससे जुड़ी परंपराओं पर टिप्पणी की वह केवल राजनीतिक आलोचना नहीं बल्कि सांस्कृतिक असंवेदनशीलता है।

लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं पर लोकआस्था का अपमान कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। जब कोई नेता लोकपर्वों को राजनीति की भाषा में अपमानित करता है तो वह केवल किसी सरकार को नहीं बल्कि उस संस्कृति को नीचा दिखाता है जिसने भारत को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का भाव दिया।

विकास और धर्म का संतुलन

इसमें कोई दोराय नहीं कि बीते एक दशक में ‘विकास’ और ‘धर्म’ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई हैं। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण और अब दिल्ली में यमुना तटों का सौंदर्यीकरण ये सब उस सोच का हिस्सा है जिसमें आस्था को प्रशासनिक प्राथमिकता दी गई है। यह केवल राजनीतिक दृष्टिकोण नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया है।

छठ के दौरान दिल्ली में हुए सुधार इसी विचारधारा का विस्तार हैं। स्वच्छ घाट, बेहतर व्यवस्थाएं और श्रद्धालुओं के लिए सुविधा यह दिखाता है कि सरकार ने केवल औपचारिकता नहीं निभाई बल्कि लोकभावना को केंद्र में रखकर कार्य किया।

आस्था का अपमान क्यों?

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता अब भावनाओं से नहीं परिणामों से जुड़ती है। इस बार छठ पर्व पर राजधानी दिल्ली में यमुना का जल शुद्ध दिखा, घाटों पर व्यवस्था की गई तो पूरे समाज में सकारात्मक संदेश गया। उसे नकारात्मक राजनीति से कलंकित करना लोकतंत्र की परिपक्वता पर प्रश्न उठाता है।

यमुना के शुद्धिकरण में प्रशासनिक और तकनीकी चुनौतियां अभी बाकी हैं लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती है राजनीतिक प्रदूषण।

यमुना को राजनीतिक चश्मे से नहीं, श्रद्धा से देखिए

आस्था को अपमानित करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती कदम है। लोकपर्वों की ताकत जनता की एकता और भावनाओं में है न कि दलगत विचारधाराओं में।
छठ पर्व का संदेश है- स्वच्छता, संयम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता। यदि राजनीति इस संदेश को भी प्रदूषित कर देगी तो समाज को विभाजित करने के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा।

आज आवश्यकता है कि हम यमुना को केवल पर्यावरणीय दृष्टि से नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी शुद्ध करें। यमुना को प्रदूषण से मुक्ति चाहिए लेकिन उससे भी पहले उसे राजनीति के प्रदूषण से मुक्त करने की ज़रूरत है।

 

(वरिष्ठ पत्रकार अमित शर्मा की राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे प्रसार भारती न्यूज सर्विस के साथ जुड़े हैं।)

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