भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों पर यातायात बढ़ने के साथ सुरक्षित और बेहतर नौवहन व्यवस्था विकसित की जा रही है। जल सर्वेक्षण और नौवहन मार्गों के रखरखाव के जरिए जलमार्गों को नौकाओं और जहाजों के आवागमन के योग्य बनाए रखा जा रहा है। वहीं, ब्रह्मपुत्र नदी पर देश के पहले नदी-आधारित प्रकाशस्तंभ चौबीसों घंटे नौवहन के लिए दूर तक सहायता उपलब्ध कराएंगे। डिजिटल मंचों के माध्यम से जल की गहराई, मार्ग और मौसम की वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध हो रही है। इन पहलों से नौवहन सुरक्षा मजबूत हो रही है, आवागमन अधिक सुगम और पूर्वानुमान योग्य बन रहा है तथा जलमार्गों पर बढ़ते माल परिवहन को सहायता मिल रही है।
जलमार्गों के विस्तार के साथ नौवहन को सुदृढ़ बनाने पर जोर
भारत की नदियां और जलमार्ग देश के परिवहन नेटवर्क में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन्हें अर्थव्यवस्था को गति देने वाले प्रभावी साधन के रूप में विकसित किया जा रहा है। जलमार्ग परिवहन का किफायती और स्वच्छ विकल्प उपलब्ध कराते हैं। जलमार्ग से एक टन माल ढोने की लागत सड़क परिवहन की तुलना में लगभग एक-तिहाई और रेल परिवहन की तुलना में आधी होती है। इससे कार्बन उत्सर्जन भी काफी कम होता है। साथ ही, राजमार्गों पर दबाव घटता है और उनका उपयोग यात्रियों तथा ऐसे सामान के परिवहन के लिए किया जा सकता है, जिन्हें कम समय में पहुंचाना आवश्यक होता है।
देश में नौवहन और जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए 111 राष्ट्रीय जलमार्ग हैं। इनकी कुल लंबाई 20,187 किलोमीटर है और ये 23 राज्यों तथा 4 केंद्रशासित प्रदेशों में फैले हुए हैं। इनमें से 32 राष्ट्रीय जलमार्गों पर वर्तमान में परिचालन हो रहा है। जलमार्गों के बढ़ते आर्थिक महत्व का अंदाजा इनके माध्यम से माल ढुलाई में तेजी से हुई वृद्धि से लगाया जा सकता है। अंतर्देशीय जलमार्गों से माल ढुलाई वर्ष 2014-15 के 2.9 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 21.8 करोड़ मीट्रिक टन हो गई। यह 20.13% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) को दर्शाता है। यह वृद्धि समुद्री भारत दृष्टिकोण 2030 के तहत निर्धारित 20 करोड़ मीट्रिक टन के लक्ष्य को भी पार कर चुकी है। इस तरह अंतर्देशीय जलमार्ग अब केवल संभावनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेहतर प्रदर्शन भी कर रहे हैं।
बदलती नदी परिस्थितियों के बीच सुरक्षित नौवहन
जलमार्गों के विस्तार के साथ सुरक्षित और बेहतर नौवहन के लिए ऐसी सुविधाओं और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता बढ़ रही है, जो नदी की स्थिति और विभिन्न मार्गों पर नौवहन की संभावनाओं को समझने में मदद करें। नदियों की बदलती परिस्थितियों में जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुगम बनाने के लिए जल सर्वेक्षण और नौवहन मार्गों का रखरखाव किया जा रहा है। डिजिटल मंचों के माध्यम से जल की गहराई, मार्गों, जहाजों की आवाजाही और मौसम से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। भारत के पहले नदी-आधारित प्रकाशस्तंभों सहित नए नौवहन बुनियादी ढांचे से चौबीसों घंटे जहाजों की आवाजाही को और सहायता मिल रही है।
जल सर्वेक्षण: नदियों की स्थिति को समझने का आधार
नदी सतह से देखने पर भले ही पहले जैसी दिखाई दे, लेकिन उसके नौगम्य मार्ग की संरचना बाहर से दिखाई नहीं देती। नदी के अलग-अलग हिस्सों में और विभिन्न मौसमों में जलस्तर बदलता रहता है। इन बदलावों से जहाजों के आवागमन के लिए उपलब्ध मार्ग प्रभावित हो सकता है। इसी कारण अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास के लिए नदी की स्थिति की लगातार जानकारी होना आवश्यक है।
जल सर्वेक्षण में नदी की गहराई और तल की संरचना का आकलन
जल सर्वेक्षण के अंतर्गत जल निकायों और उनकी भौतिक विशेषताओं का मापन और विवरण तैयार किया जाता है। इसमें नदी या जल निकाय की तली की संरचना, पानी की गहराई, बहाव की दिशा और संभावित खतरों का पता लगाना शामिल है। इसका उद्देश्य नौवहन के साथ-साथ समुद्री गतिविधियों, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और पूर्वानुमान सेवाओं जैसी अन्य गतिविधियों में भी सहायता करना है। जल सर्वेक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य नौवहन संबंधी चार्ट और मानचित्र तैयार करना है, जिनसे सर्वेक्षण किए गए क्षेत्र की स्पष्ट, व्यापक और अद्यतन जानकारी मिल सके। जल निकायों की तली से तलछट हटाने की प्रक्रिया को ड्रेजिंग यानी गाद निकालना कहा जाता है। राष्ट्रीय जलमार्गों के विभिन्न हिस्सों में नौवहन को बेहतर बनाने के लिए ड्रेजिंग का काम किया जाता है।
थालवेग सर्वेक्षण से सबसे गहरे नौवहन मार्ग की पहचान
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) राष्ट्रीय जलमार्गों पर जल सर्वेक्षण करता है। इन सर्वेक्षणों के तहत नदी की गहराई, तल की बनावट, रेत के उथले टीले, जल प्रवाह की विशेषताओं और नौवहन को प्रभावित करने वाले नदी के स्वरूप में होने वाले बदलावों का मापन और विश्लेषण किया जाता है। इनमें थालवेग सर्वेक्षण भी शामिल हैं, जिनके माध्यम से नदी के किसी हिस्से में नौवहन के लिए उपलब्ध सबसे गहरे मार्ग की पहचान की जाती है और उस पर नजर रखी जाती है।
टर्मिनल और जेटी सर्वेक्षणों के तहत टर्मिनलों और जेटियों के आसपास पानी की गहराई तथा वहां तक पहुंचने की स्थितियों का आकलन किया जाता है। लगातार किए जाने वाले जल सर्वेक्षण से नौवहन मार्ग (फेयरवे) के विकास, नदी तल से गाद और अन्य सामग्री हटाने की योजनाएं बनाने, नौवहन सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा देशभर में अंतर्देशीय जल परिवहन (आईडब्ल्यूटी) के बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े निर्णय लेने में मदद मिलती है।
नियमित सर्वेक्षण से नदी की बदलती स्थिति पर नजर
नदी की स्थिति कुछ हिस्सों में तेजी से बदल सकती है। इसलिए सर्वेक्षण कितनी बार किया जाएगा, यह प्रत्येक जलमार्ग की आवश्यकता के अनुसार तय किया जाता है। सितंबर 2026 तक 22 राष्ट्रीय जलमार्गों पर नियमित थालवेग सर्वेक्षण किए जा रहे थे। संबंधित जलमार्ग की आवश्यकता के अनुसार ये सर्वेक्षण साप्ताहिक, हर पखवाड़े या मासिक आधार पर किए जाते हैं। इस निगरानी व्यवस्था में भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग का भारतीय हिस्सा भी शामिल था। यह अंतर्देशीय जल पारगमन नेटवर्क है, जो निर्धारित नदी मार्गों के माध्यम से भारत और बांग्लादेश के बीच माल की आवाजाही संभव बनाता है।
न्यूनतम उपलब्ध गहराई: नौवहन का महत्वपूर्ण मापदंड
जल सर्वेक्षण के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक न्यूनतम उपलब्ध गहराई (एलएडी) है। इससे आशय नौवहन मार्ग में उपलब्ध पानी की न्यूनतम गहराई से है। इसका आकलन किसी विशेष हिस्से और निश्चित अवधि के लिए किया जाता है। न्यूनतम उपलब्ध गहराई का जहाजों के संचालन और नौवहन की योजना पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह जहाज के लिए अनुमत अधिकतम ड्राफ्ट यानी पानी में जहाज के डूबे हुए हिस्से की गहराई निर्धारित करती है और माल ढोने की क्षमता को प्रभावित करती है। इससे मार्ग और समय-सारणी तय करने तथा मौसम के अनुसार नौवहन संबंधी निर्णय लेने में भी मदद मिलती है।
नौवहन सहायक प्रणालियां: जहाजों को सुरक्षित मार्ग दिखाने में मदद
सुरक्षित नौवहन के लिए ऐसी विश्वसनीय प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जो जहाजों को मार्गों, खतरों और बदलती परिस्थितियों की पहचान करने में मदद करें। समुद्री नौवहन सहायक अधिनियम, 2021 के तहत इन प्रणालियों को औपचारिक रूप से नौवहन सहायक प्रणालियों (एटीओएन) के रूप में मान्यता दी गई है। नौवहन सहायक प्रणाली ऐसा उपकरण, व्यवस्था या सेवा है, जो जहाजों से अलग होती है और जहाजों तथा जहाजों के यातायात के सुरक्षित और कुशल नौवहन को बढ़ावा देने के लिए तैयार और संचालित की जाती है। इनमें प्रकाशयुक्त तैरते संकेतक, रडार संकेतक, प्रकाशस्तंभ, नौवहन मार्ग के संकेतक और प्रकाशयुक्त पोत आदि शामिल हैं।
बोय: मार्ग और संभावित खतरों की पहचान
बोय ऐसे तैरते हुए पिंड होते हैं, जिन्हें किसी निश्चित स्थान पर बांधकर रखा जाता है। इनका उपयोग नाविकों को मार्ग दिखाने या खतरे के प्रति सचेत करने, पानी में डूबी वस्तुओं के स्थान को चिह्नित करने अथवा लंगर डालने के बजाय जहाजों को बांधकर रखने के लिए किया जाता है। बोय के प्रकारों में पार्श्व संकेतक, दिशासूचक संकेतक, अलग-अलग खतरे के संकेतक, सुरक्षित जल क्षेत्र के संकेतक, विशेष संकेतक और आपातकालीन मलबा-चिह्नांकन बोय शामिल हैं।
रडार संकेतक: खराब मौसम में भी नौवहन सहायता
रडार संकेतक (रेकॉन) एक अत्यधिक संवेदनशील उपकरण है, जिसका उपयोग बंदरगाह और पत्तन प्राधिकरण नाविकों को स्थिर या तैरती हुई नौवहन सहायक प्रणालियों की स्थिति आसानी से पहचानने में मदद करने के लिए करते हैं। यह उपकरण लगभग हर तरह के मौसम में संकेत प्रसारित करता है। कोहरे, खराब मौसम या समुद्र की प्रतिकूल परिस्थितियों का भी इस पर असर नहीं पड़ता।
नौवहन सहायक प्रणालियों के विकास में संस्थागत भूमिका
प्रकाशस्तंभ और प्रकाशपोत महानिदेशालय (डीजीएलएल) भारत के समुद्र तट के साथ सामान्य नौवहन सहायक प्रणालियों के विकास, रखरखाव और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। यह नौवहन सहायक प्रणालियों और पोत यातायात सेवाओं (वीटीएस) के प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में भी कार्य करता है। भारत समुद्र में जीवन की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (सोलास) का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके तहत संबंधित सरकारों के लिए उपयुक्त नौवहन सहायक प्रणालियों का विकास और संचालन करना आवश्यक है। भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री नौवहन सहायक प्रणालियों संगठन (आईएएलए) द्वारा जारी नौवहन सहायक प्रणालियों से संबंधित सिफारिशों और दिशा-निर्देशों का भी पालन करता है।
राष्ट्रीय जलमार्गों पर मजबूत नौवहन तंत्र
राष्ट्रीय जलमार्गों पर भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) नौवहन सहायक प्रणालियों का मजबूत तंत्र बनाए रखता है। नौवहन की आवश्यकताओं के आधार पर अलग-अलग जलमार्गों पर इन प्रणालियों के विभिन्न संयोजनों का उपयोग किया जाता है। राष्ट्रीय जलमार्ग-3 इस बुनियादी ढांचे का एक प्रमुख उदाहरण है। केरल में स्थित राष्ट्रीय जलमार्ग-3 देश के अंतर्देशीय जल परिवहन नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पश्चिमी तट नहर प्रणाली कोट्टापुरम को कोल्लम से जोड़ती है और चम्पक्करा तथा उद्योगमंडल नहरों तक फैली है। इस जलमार्ग के पूरे नौगम्य हिस्से में चौबीसों घंटे नौवहन में सहायता के लिए नौवहन सहायक प्रणालियां लगाई गई हैं। इस जलमार्ग पर कुल 312 सौर ऊर्जा से चलने वाली प्रकाशयुक्त एफआरपी (फाइबरग्लास प्रबलित प्लास्टिक) की प्लवमान संकेतक बोय और 17 प्रकाश संकेतक खंभे लगाए गए हैं।
नदी के प्रकाशस्तंभ: चौबीसों घंटे नौवहन में सहायता
मार्च 2026 में भारत की अंतर्देशीय नौवहन व्यवस्था ने एक नया मुकाम हासिल किया। भारत ने राष्ट्रीय जलमार्ग-2 के रूप में निर्धारित ब्रह्मपुत्र नदी पर देश के पहले चार नदी-आधारित प्रकाशस्तंभों की घोषणा की। यह पहल अंतर्देशीय जलमार्गों पर नौवहन सहायक प्रणालियों को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ये चार प्रकाशस्तंभ पांडु, बोगीबील, सिलघाट और बिश्वनाथ घाट में स्थापित किए जा रहे हैं। 74 करोड़ रुपए की इस परियोजना में नौवहन संबंधी मार्गदर्शन के साथ आधुनिक निगरानी सुविधाएं भी शामिल होंगी।
प्रकाशस्तंभों से बढ़ेगी नौवहन क्षमता
ये प्रकाशस्तंभ जमीन से 20 मीटर ऊपर होंगे और नौवहन के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु उपलब्ध कराएंगे। इनकी भौगोलिक रेंज 14 नॉटिकल मील तक होगी, जिससे नौवहन में अधिक दृश्यता मिलेगी। इनकी रोशनी की रेंज 8 से 10 नॉटिकल मील के बीच होगी, जिससे रात में जहाजों की आवाजाही में मदद मिलेगी। प्रकाशस्तंभ पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित होंगे, जिससे संचालन के लिए स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत उपलब्ध होगा। मौसम संबंधी सेंसर नौवहन और सुरक्षा से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध कराएंगे। परिसर में संग्रहालय, एम्फीथिएटर, कैफेटेरिया और लैंडस्केप वाली सार्वजनिक जगहें भी विकसित की जाएंगी। बच्चों के खेलने की जगहें और स्मृति-चिह्नों की दुकानें आम लोगों तथा पर्यटन से जुड़ी सुविधाओं को बढ़ाएंगी।
ब्रह्मपुत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल
यह पहल भारत के किसी अंतर्देशीय जलमार्ग पर पहली बार प्रकाशस्तंभ संबंधी बुनियादी ढांचे की स्थापना का प्रतीक है। इससे ऐसे नदी मार्ग पर नौवहन सुरक्षा की नई व्यवस्था उपलब्ध होगी, जहां परिवहन गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय जलमार्ग-2 असम में धुबरी से सदिया तक फैला है और इसकी नौगम्य लंबाई 891 किलोमीटर है। यह भारत के किसी भी जलमार्ग का सबसे लंबा नौगम्य हिस्सा है। यह जलमार्ग पूरे क्षेत्र में माल, यात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही में सहायता करता है। यह चाय, कोयला और उर्वरक से जुड़ी आपूर्ति शृंखलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय जलमार्ग-2 पर माल ढुलाई वित्त वर्ष 2024-25 में 9 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 12.9 लाख मीट्रिक टन हो गई। इससे इस जलमार्ग पर नौवहन संबंधी बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता स्पष्ट होती है। नए प्रकाशस्तंभ चौबीसों घंटे नौवहन में सहायता करेंगे। इस प्रकार यह परियोजना ब्रह्मपुत्र नदी पर नौवहन सुरक्षा, तकनीकी सहायता और पर्यटन विकास को एक साथ बढ़ावा देगी।
डिजिटल नौवहन से वास्तविक समय की जानकारी
तकनीक भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों पर जहाजों के संचालन के तरीके को बदल रही है। डिजिटल मंच जलमार्गों, जहाजों की आवाजाही, जल की गहराई, मौसम और यातायात से जुड़ी जानकारी को एक साथ उपलब्ध कराते हैं। इससे नाविकों और अधिकारियों को जरूरत के समय आवश्यक जानकारी मिल पाती है।
डिजिटल हाइड्रोग्राफिक चार्ट से नदी की जानकारी स्क्रीन पर
आधुनिक हाइड्रोग्राफिक चार्ट के जरिए नाविकों को अधिक सुरक्षित नौवहन के लिए डिजिटल रूप में जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। सितंबर 2026 तक 18 परिचालन और ज्वारीय जलमार्गों के लिए इलेक्ट्रॉनिक नौवहन चार्ट (ईएनसी) तैयार किए गए हैं। इन्हें पीएएनआई और आईडब्ल्यूएआई पोत ट्रैकर जैसे पोर्टल पर अपलोड किया जाता है। वर्ष 2014 से पहले यह सुविधा केवल राष्ट्रीय जलमार्ग-1 यानी हल्दिया और प्रयागराज के बीच गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली पर उपलब्ध थी। इसके विस्तार से डिजिटल रूप में उपलब्ध नौवहन संबंधी जानकारी में काफी वृद्धि हुई है। ये चार्ट नदी की जानकारी को नौवहन के अनुकूल प्रारूप में उपलब्ध कराकर भौतिक सर्वेक्षण का पूरक बनते हैं।
पीएएनआई और आईडब्ल्यूएआई पोत ट्रैकर से रीयल-टाइम जानकारी
नौवहन के लिए केवल जलमार्ग की गहराई की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है। पोर्टल फॉर एसेट एंड नेविगेशन इन्फॉर्मेशन (पीएएनआई) नदी में नौवहन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारी को एक ही मंच पर उपलब्ध कराता है। इस पोर्टल पर राष्ट्रीय जलमार्गों और उनसे जुड़ी परिसंपत्तियों का विवरण मिलता है। इनमें नौवहन मार्ग, बुनियादी ढांचे की सुविधाएं और नदी के आर-पार बने ढांचे शामिल हैं।
यह पोर्टल माल परिवहन को सुगम बनाने के लिए जेटियों तक पहुंच और आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध कराता है। आईडब्ल्यूएआई पोत ट्रैकर और पीएएनआई पोर्टल मिलकर वेब और मोबाइल आधारित ई-नौवहन प्रणाली बनाते हैं। इनके माध्यम से जहाजों की वास्तविक समय में स्थिति का पता लगाया जा सकता है। साथ ही नौवहन मार्गों और जल की गहराई से जुड़ी अद्यतन जानकारी भी मिलती है। ये सुविधाएं अंतर्देशीय जलमार्गों पर सुरक्षित और कुशल आवागमन में मदद करती हैं।
नौदर्शिका: एकीकृत नदी यातायात प्रबंधन की ओर कदम
नौदर्शिका, नेशनल रिवर ट्रैफिक एंड नेविगेशन सिस्टम, 2025 में सुरक्षित, कुशल और टिकाऊ जहाजों की आवाजाही के लिए शुरू किया गया। यह प्रणाली नौवहन को समर्थन देने के लिए वास्तविक समय की न्यूनतम उपलब्ध गहराई (एलएडी) की जानकारी उपलब्ध कराती है। पीएएनआई और एलएडीआईएस जैसे मौजूदा डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ नौदर्शिका नदी यातायात और नौवहन प्रबंधन के लिए एक समर्पित प्रणाली उपलब्ध कराता है।
नदी सूचना सेवाएं: यातायात सूचना का डिजिटल नेटवर्क
रिवर इन्फॉर्मेशन सर्विसेज (आरआईएस) डिजिटल नौवहन को एक कदम आगे ले जाती हैं। आरआईएस पोत ट्रैकिंग तकनीक, मौसम और जल सेंसर तथा सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियों को एक साथ जोड़ती है। यह पोत संचालकों और अधिकारियों को वास्तविक समय का डेटा उपलब्ध कराती है। यह पोत और नियंत्रण केंद्र के बीच संचार को भी समर्थन देती है। इससे यातायात प्रबंधन बेहतर होता है और परिचालन संबंधी निर्णय तेजी से लिए जा सकते हैं।
गंगा पर आरआईएस से रीयल-टाइम यातायात निगरानी
आरआईएस को राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (गंगा) के तीन हिस्सों में लागू किया गया है। ये हल्दिया-फरक्का, फरक्का-पटना और पटना-वाराणसी हैं। इस प्रणाली में 4 नियंत्रण स्टेशन और 13 बेस स्टेशन शामिल हैं। इसमें ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) उपकरण और वेरी हाई फ्रीक्वेंसी (वीएचएफ) संचार प्रणाली शामिल हैं। मौसम संबंधी सेंसर भी नेटवर्क का हिस्सा हैं। 30 विभागीय जहाजों पर आरआईएस कंसोल लगाए गए हैं। ये सभी घटक मिलकर राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर वास्तविक समय आधारित यातायात निगरानी प्रणाली तैयार करते हैं।
सुरक्षित नौवहन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण
भारत के जलमार्गों पर सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने के लिए नदी की स्थिति की लगातार जानकारी, विश्वसनीय बुनियादी ढांचा और समय पर सूचना उपलब्ध होना आवश्यक है। जल सर्वेक्षण से नदियों की बदलती परिस्थितियों को समझने में मदद मिलती है, जबकि नौवहन सहायक प्रणालियां जलमार्गों पर स्पष्ट संकेतों के माध्यम से दिशा दिखाती हैं। डिजिटल मंच वास्तविक समय में जल की गहराई, मार्गों, मौसम और यातायात की जानकारी उपलब्ध कराकर नौवहन को और सटीक बना रहे हैं। ये सभी प्रणालियां मिलकर अंतर्देशीय नौवहन को अधिक सुगम और परिस्थितियों के अनुरूप बना रही हैं। जलमार्गों पर यातायात बढ़ने के साथ यह एकीकृत दृष्टिकोण जहाजों की सुरक्षित, कुशल और चौबीसों घंटे आवाजाही के लिए मजबूत आधार तैयार करने में मदद कर रहा है। (इनपुट: पीआईबी)


