विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री व CSIR के उपाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र सिंह ने शुक्रवार को कहा कि आने वाले समय में तकनीकी संप्रभुता (Technology Sovereignty) किसी राष्ट्र की भूराजनीतिक ताकत (Geopolitical Power) तय करेगी।
CSIR के 84वें स्थापना दिवस के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने भारत के तकनीक-आधारित राष्ट्र में बदलने की प्रक्रिया पर जोर दिया और कहा कि उभरती तकनीकों में मजबूती पैदा करना जरूरी है ताकि भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बना रहे।
डॉ. सिंह ने कहा, “तकनीकी स्वराज्य भविष्य में भूराजनीतिक स्वराज्य का निर्धारण करेगा।” उन्होंने बताया कि CSIR के 37 शोध प्रयोगशालाएँ स्वास्थ्य, कृषि, सामग्री विज्ञान, रक्षा और औषधि जैसे कई क्षेत्रों में अहम योगदान दे रही हैं।
उन्होंने CSIR की स्थापना 1942 से लेकर आज तक की यात्रा याद करते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सर रामनाथ चोपड़ा जैसे नेताओं के योगदान को याद किया, जिन्होंने भारत में औषधि अनुसंधान की नींव रखी।
डॉ. सिंह ने हाल के कुछ महत्वपूर्ण सफलताओं का जिक्र किया, जैसे कि देश में विकसित किया गया एंटीबायोटिक नाफिथ्रोमाइसिन (Nafithromycin)। उन्होंने बताया कि यह सफलता CSIR और अन्य वैज्ञानिक विभागों के सहयोग का परिणाम है।
उन्होंने उद्योगों के साथ साझेदारी को भी जरूरी बताया, जिससे प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकें बाज़ार में पहुंच सकें। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर खेती और पालमपुर में ट्यूलिप नवाचार ने किसानों की आय बढ़ाई और समाज पर सकारात्मक असर डाला है।
डॉ. सिंह ने बताया कि CSIR विकसित तकनीकों का राष्ट्रीय सुरक्षा में भी योगदान रहा है, जैसे ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल होने वाले सेंसर।
आगे की चुनौतियों पर बात करते हुए उन्होंने विज्ञान को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाने के लिए तीन अहम स्तंभ – जागरूकता, किफ़ायत और पहुँच – अपनाने पर ज़ोर दिया।
उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे आधुनिक संचार साधनों और सोशल मीडिया का उपयोग करके आम जनता से जुड़ें और अपने शोध कार्य को प्रभावी रूप से प्रदर्शित करें।
-(इनपुट: एजेंसी)


