पीएम मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित- ‘स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है’ 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को एक संस्कृत सुभाषित साझा कर समृद्धि और सच्ची महानता का संदेश दिया है। उन्होंने ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ ग्रंथ से एक श्लोक पोस्ट किया, जिसमें सत्पुरुषों के जीवन की सार्थकता को रेखांकित किया गया है।

पीएम मोदी ने यह श्लोक साझा किया:

“स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। 
सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥”

इसका हिंदी भावार्थ है कि स्वाधीन (स्वतंत्र) समृद्धि ही वास्तविक वैभव है। दूसरों का आश्रय और आधार बनना ही सच्ची महानता है। जिस तरह मरुभूमि में छाया और जीवन दुर्लभ वरदान होते हैं, उसी तरह श्रेष्ठ पुरुष का जीवन परोपकार और लोक-कल्याण के लिए ही होना चाहिए।

कहां से लिया गया है यह श्लोक?

यह श्लोक ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ के ‘सामान्यप्रकरणम्’ खंड के 24वें अध्याय ‘सज्जनप्रशंसा’ का 133वां श्लोक है। इस विशाल संस्कृत संग्रह ग्रंथ का संकलन नारायण राम आचार्य (काव्यतीर्थ) ने किया था। इसमें विभिन्न कालखंडों के चुने हुए श्लोकों को एक जगह संकलित किया गया है।

मरुभूमि का रूपक क्या कहता है?

श्लोक में सत्पुरुष के गुणों को मरुभूमि (रेगिस्तान) के रूपक से समझाया गया है। इसमें तीन प्रमुख भाव उभरकर आते हैं:

– समृद्धि स्वाधीन होनी चाहिए
– व्यक्ति दूसरों के लिए उपयोगी बने
– ऊंचा उठकर दूसरों को छाया और आश्रय प्रदान करे

इस रूपक के जरिए यह संदेश दिया गया है कि सज्जन व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक होता है जब वह स्वावलंबी रहे और समाज के कल्याण के लिए समर्पित हो।प्रधानमंत्री द्वारा इस सुभाषित को साझा करना समाज में सत्पुरुषों की भूमिका और उनके गुणों की याद दिलाने वाला एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। (इनपुट-एजेंसी)