भारत को अपनी AI यात्रा खुद तय करनी चाहिए, न कि इसे अपने-आप तय होने दें: आरबीआई गवर्नर 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मंगलवार को कहा कि भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की अपनी यात्रा को खुद आकार देने की जरूरत है। तकनीक को वित्तीय क्षेत्र को अपने आप आकार देने नहीं देना चाहिए। एफआईबीएसी 2026 कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होंने जोर देते हुए कहा कि एआई अपनाने से जोखिम मूल्यांकन, ग्राहक सेवा, पूंजी की कीमत तय करने और संस्थानों के संचालन के तरीके में आमूलचूल बदलाव आएगा। 

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाकर वित्तीय क्षेत्र में बदलाव लाएं

उन्होंने आगे कहा, “बिजनेस करने, बैंकिंग करने आदि के लिए सोच में पूरी तरह बदलाव की जरूरत है। यह जोखिम का मूल्यांकन करने, ग्राहकों को सेवा देने, पूंजी की कीमत तय करने और संस्थानों को व्यवस्थित करने के तरीके में बदलाव है। यह जानकर खुशी हुई कि कई बैंक पहले से ही ऐसा कर रहे हैं। आप में से कुछ लोग ऐसा करने पर विचार कर रहे हैं।”

उन्होंने सवाल उठाया, “अब हमारे सामने एकमात्र सवाल यह है कि क्या आप एआई यात्रा को आकार देते हैं या आप इसे अपने आप आपको आकार देने देते हैं।”

मजबूत पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारत की ताकत

आरबीआई गवर्नर ने भारत की रणनीतिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश अपने मजबूत पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण एआई का लाभ उठाने के लिए अनोखी स्थिति में है। उन्होंने आधार, यूपीआई, डिजीलॉकर और ओएनडीसी का जिक्र करते हुए कहा, “हम भारत में एआई का लाभ उठाने के लिए एक अनोखी स्थिति में हैं। हमारे पास सबसे उन्नत पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर है।”

उन्होंने बताया कि यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस और अकाउंट एग्रीगेटर को बनाने, बेहतर बनाने और विस्तार करने की कोशिश चल रही है। ये पब्लिक गुड्स हैं, जिनके ऊपर प्राइवेट सेक्टर एआई बना सकता है। इसमें वित्तीय निर्णय लेने की वही क्षमता है, जो यूपीआई ने वित्तीय लेनदेन के लिए दी थी।

इंटेलिजेंस को कई गुना बढ़ाएगी एआई

पिछले तकनीकी बदलावों का जिक्र करते हुए मल्होत्रा ने कहा कि जहां ऐतिहासिक इनोवेशन ने शारीरिक शक्ति और कनेक्टिविटी को कई गुना बढ़ाया था, वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सीधे तौर पर इंटेलिजेंस को कई गुना बढ़ा देती है। कंप्यूटर कोडिंग जैसे काम, जिन्हें कभी जटिल माना जाता था, अब आम हो गए हैं क्योंकि ध्यान अब इंटेलिजेंस एप्लीकेशन की ओर बढ़ रहा है।

वित्तीय स्थिरता और रेगुलेटरी सुधारों पर प्रगति

पिछले साल की कॉन्फ्रेंस में बताई गई प्राथमिकताओं का जिक्र करते हुए गवर्नर ने वित्तीय स्थिरता, ग्राहक-केंद्रितता, आसानी से बिजनेस करने और मध्यस्थता लागत कम करने सहित प्रमुख रेगुलेटरी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने पुष्टि की कि बैंक अगले वित्तीय वर्ष की शुरुआत से लागू होने वाले बेसल III दिशानिर्देशों को निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार लागू करने की राह पर हैं। केंद्रीय बैंक ने क्रेडिट रिस्क कैपिटल, अपेक्षित क्रेडिट नुकसान, प्रोजेक्ट फाइनेंस, संबंधित पार्टी लेनदेन और डिविडेंड पॉलिसी के लिए फ्रेमवर्क को अंतिम रूप दे दिया है।

रेगुलेटरी बोझ कम करने के कदम

रेगुलेटरी बोझ घटाने के बारे में मल्होत्रा ने बताया कि ऑपरेशनल काम प्रबंधन को सौंप दिए गए और निर्देशों को आसान बनाया गया। आरबीआई ने 203 से ज्यादा तरह के एप्लीकेशन प्रोसेस को ऑटोमेट किया, 99.9 प्रतिशत सेवाएं तय समय में दीं, वर्किंग कैपिटल के नियमों को तर्कसंगत बनाया, बल्क डिपॉजिट की प्राइसिंग की समीक्षा की और विदेशी मुद्रा से जुड़ी कुछ मंजूरियां अधिकृत डीलरों को सौंप दीं।

बैंक क्रेडिट बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए गए, जिनमें एक्विजिशन फाइनेंस, प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग, प्रोजेक्ट फाइनेंस और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड से जुड़े नियम शामिल हैं। उन्होंने कहा, “निश्चित रूप से, इन सभी क्षेत्रों में एआई की बड़ी भूमिका है।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि बिचौलियों की लागत कम करना रेगुलेटर और बैंकिंग संस्थानों के बीच लगातार मिलकर की जाने वाली कोशिश है। (इनपुट-एजेंसी)

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