रेमिटेंस बना विकास की ताकत, परिवारों की आर्थिक सुरक्षा में अहम भूमिका

अंतर्राष्ट्रीय परिवार प्रेषण दिवस (इंटरनेशनल डे ऑफ फैमिली रेमिटेंसेज) हर वर्ष 16 जून को मनाया जाता है। यह दिन उन करोड़ों प्रवासी श्रमिकों के योगदान को सम्मान देने के लिए समर्पित है, जो अपने परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए घर से दूर रहकर काम करते हैं और अपनी कमाई का एक हिस्सा नियमित रूप से अपने घर भेजते हैं। संयुक्त राष्ट्र समर्थित इस दिवस का उद्देश्य परिवार प्रेषण यानी रेमिटेंस की सामाजिक और आर्थिक भूमिका को रेखांकित करना है। दुनिया के कई विकासशील देशों में परिवार प्रेषण न केवल लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और छोटे व्यवसायों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रवासी श्रमिकों के योगदान को सम्मान

अंतर्राष्ट्रीय परिवार प्रेषण दिवस की शुरुआत वर्ष 2015 में अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (आईएफएडी) की पहल पर की गई थी। इस दिन का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि विदेशों या अपने गृह क्षेत्र से दूर काम करने वाले श्रमिकों द्वारा भेजी गई धनराशि परिवारों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी इस पहल का समर्थन किया और इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता प्रदान की। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रवासी श्रमिक अक्सर कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपने परिवारों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से धन भेजते रहते हैं। यह राशि परिवारों को दैनिक जरूरतें पूरी करने, बच्चों की पढ़ाई जारी रखने और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने में मदद करती है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस की बढ़ती भूमिका

बीते वर्षों में परिवार प्रेषण वैश्विक वित्तीय प्रवाह का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों को हर वर्ष सैकड़ों अरब डॉलर की रेमिटेंस प्राप्त होती है। कई देशों के लिए यह राशि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विकास सहायता से भी अधिक महत्वपूर्ण साबित होती है। रेमिटेंस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्थिरता है। आर्थिक मंदी, प्राकृतिक आपदा या अन्य संकटों के दौरान भी प्रवासी श्रमिक अपने परिवारों को आर्थिक सहायता भेजना जारी रखते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी दुनिया के कई देशों में रेमिटेंस ने परिवारों को आर्थिक झटकों से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भारत बना हुआ है दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्तकर्ता

भारत लंबे समय से दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। खाड़ी देशों, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में कार्यरत भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह धनराशि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद करती है। रेमिटेंस के जरिए प्राप्त धन का उपयोग घर बनाने, शिक्षा पर खर्च करने, स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने और छोटे कारोबार शुरू करने में किया जाता है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है।

गरीबी उन्मूलन और सामाजिक विकास में योगदान

परिवार प्रेषण केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिलता है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि जिन परिवारों को नियमित रूप से रेमिटेंस प्राप्त होती है, उनमें बच्चों की स्कूल उपस्थिति बेहतर होती है और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अधिक होती है। रेमिटेंस से प्राप्त धन परिवारों को अप्रत्याशित आर्थिक संकटों से निपटने में भी मदद करता है। कृषि पर निर्भर परिवारों के लिए यह आय का एक अतिरिक्त और भरोसेमंद स्रोत बन जाता है। कई विकासशील देशों में रेमिटेंस ने गरीबी कम करने और सामाजिक असमानताओं को घटाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

डिजिटल भुगतान ने बनाया प्रक्रिया को आसान

तकनीकी प्रगति और डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार ने रेमिटेंस भेजने और प्राप्त करने की प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक आसान और तेज बना दिया है। मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल वॉलेट और ऑनलाइन मनी ट्रांसफर प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब धनराशि कुछ ही मिनटों में एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाई जा सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ अब भी रेमिटेंस लेनदेन की लागत को कम करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में भी अंतर्राष्ट्रीय धन प्रेषण की लागत को कम करने का लक्ष्य शामिल है ताकि अधिक धन सीधे परिवारों तक पहुंच सके।

चुनौतियां अब भी बरकरार

रेमिटेंस के महत्व के बावजूद कई चुनौतियां मौजूद हैं। दुनिया के अनेक हिस्सों में प्रवासी श्रमिकों को श्रम अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित रोजगार से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ मामलों में उच्च ट्रांसफर शुल्क भी परिवारों तक पहुंचने वाली वास्तविक राशि को कम कर देता है। इसके अलावा, वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को रेमिटेंस प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देकर और डिजिटल अवसंरचना को मजबूत बनाकर इन चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संदेश

अंतर्राष्ट्रीय परिवार प्रेषण दिवस यह याद दिलाता है कि प्रवासी श्रमिक केवल अपनी मेहनत से अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत नहीं बनाते, बल्कि वे लाखों परिवारों के सपनों और आकांक्षाओं को भी सहारा देते हैं। उनके द्वारा भेजी गई धनराशि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्यमिता और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण संसाधन का काम करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारें, वित्तीय संस्थान और अंतर्राष्ट्रीय संगठन मिलकर रेमिटेंस प्रणाली को अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफायती बनाएं, तो इसका लाभ करोड़ों परिवारों तक पहुंच सकता है। इसी संदेश के साथ अंतर्राष्ट्रीय परिवार प्रेषण दिवस दुनिया भर के प्रवासी श्रमिकों के योगदान को सम्मानित करने और उनके महत्व को स्वीकार करने का अवसर प्रदान करता है।

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