विदेश मंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात की और वर्तमान वैश्विक व्यवस्था, क्षेत्रीय टकरावों और बहुपक्षवाद की भूमिका पर चर्चा की।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से मुलाकात की जानकारी साझा करते हुए एस जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “आज न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मिलकर अच्छा लगा। वर्तमान वैश्विक व्यवस्था और बहुपक्षवाद पर इसके प्रभावों के उनके आकलन की सराहना की। विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण की भी सराहना की।
एस जयशंकर ने आगे कहा कि भारत के विकास और प्रगति के लिए स्पष्ट और निरंतर समर्थन के लिए उनका धन्यवाद। भारत में उनका स्वागत करने के लिए उत्सुक हूं।
यह बैठक जी-7 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान हुई, जिसमें कनाडा की अध्यक्षता के दौरान भारत आमंत्रित भागीदार के रूप में भाग ले रहा है। इससे पहले, जयशंकर ने ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों पर G7 आउटरीच सत्र में भाग लिया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत अपने वैश्विक साझेदारों के साथ रचनात्मक रूप से काम करने को तैयार है और आपूर्ति श्रृंखलाओं में निर्भरता कम करने और लचीलापन बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
भारतीय परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारत अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के साथ रचनात्मक रूप से काम करने के लिए तैयार है और इस बात पर जोर दिया कि अधिक सहयोग ही आगे का रास्ता है। कनाडा में उन्होंने अपने समकक्षों के साथ मुलाकात की।
वहीं, संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि ऑल इज नॉट वेल इन यूएन। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा था कि हमें यह मानना होगा कि संयुक्त राष्ट्र में सब कुछ ठीक नहीं है। उसके फैसले लेने का तरीका न तो उसके सभी सदस्य देशों की सही नुमाइंदगी करता है और न ही वह दुनिया की मुख्य जरूरतों पर ध्यान दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र में होने वाली बहसें अब बहुत ज्यादा बंटी हुई हैं और उसका कामकाज साफ तौर पर रुका हुआ दिख रहा है। आतंकवाद के प्रति इसकी प्रतिक्रिया विश्वसनीयता की कमियों को उजागर करती है, और वैश्विक दक्षिण में विकास धीमा पड़ रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि बहुत ही अफसोस की बात है कि आज के दौर में भी हम कई बड़े विवाद देख रहे हैं। यह केवल मानव जीवन पर ही प्रभाव नहीं डाल रहे हैं, बल्कि इसका असर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पर भी देखने को मिल रहा है। ग्लोबल साउथ ने इस पीड़ा को महसूस किया है। यूएन में बदलाव आज के समय में बड़ी चुनौती बन गया है। (इनपुट-एजेंसी)


