फिल्मों या किसी भी वीडियो में हर तबके लोगों को दिखाया जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म व विजुअल मीडिया में दिव्यांगों के फिल्मांकन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं ताकि इन माध्यमों में दिव्यांगों का मजाक ना उड़ाया जाए। 

संघर्ष के साथ सफलता, योग्यता और समाज में उनके योगदाना को दिखाएं

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सेंसर बोर्ड को इस तरह स्क्रीनिंग की अनुमति देने से पहले विशेषज्ञ की राय लेनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि फिल्म या डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं को इनका मजाक बनाने और इन्हें अपमानजनक तरीके से पेश करने या फिर लाचार दिखाने की बजाय उनकी उपलब्धियों को दिखाना चाहिए। विजुअल मीडिया के जरिये दिव्यांग लोगों के न केवल संघर्ष को सामने रखा जाना चाहिए, बल्कि उनकी सफलता व उनकी योग्यता और समाज में उनके योगदान को भी पेश किया जाना चाहिए। 

क्या है मामला

कोर्ट ने कहा कि हम विजुअल मीडिया पर दिव्यांगों को चित्रित करने के लिए एक रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। दरअसल, 2023 में रिलीज हुई फिल्म में अल्जाइमर पीड़ित एक पिता के लिए भुलक्कड़ बाप, मूक-बधिर के लिए साउंड प्रूफ सिस्टम, हकलाने वाले शख्स के लिए अटकी हुई कैसेट जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसको आधार बनाकर दिव्यांग वकील निपुण मल्होत्रा ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस फिल्म की निर्माता कंपनी सोनी पिक्चर को निर्देश देने की मांग की थी कि वह दिव्यांग लोगों द्वारा झेली जाने वाली परेशानियों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए शार्ट मूवी बनाए न कि उनका मजाक बनाने वाली फिल्में बनाए। दिल्ली हाई कोर्ट ने मल्होत्रा की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट से खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

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