भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने गुरुवार को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के लिए अंतिम फ्रेमवर्क जारी किया। इसके तहत इक्विटी कैश मार्केट में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के समय और संचालन से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया है। हालांकि, इंडेक्स और स्टॉक डेरिवेटिव्स के एक्सपायरी वाले दिन सेटलमेंट प्राइस तय करने के लिए 30 मिनट की वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) पद्धति को बरकरार रखा गया है।
SEBI की अधिसूचना के अनुसार, नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन सभी कारोबारी दिनों में दोपहर 3:30 बजे से 3:40 बजे तक चलेगा। यह फ्रेमवर्क 7 दिसंबर 2026 से लागू होगा। हालांकि, लगातार ट्रेडिंग सेशन में निष्पादित नहीं हुए लिमिट और आइसबर्ग ऑर्डर के ट्रांजिशन से जुड़े प्रावधान 8 फरवरी 2027 से लागू होंगे।
नए फ्रेमवर्क के तहत CAS में दोपहर 3:30 बजे से 3:31 बजे तक रेफरेंस प्राइस की गणना और ट्रांजिशन की प्रक्रिया होगी। इसके बाद 3:31 बजे से 3:36 बजे तक लिमिट और मार्केट, दोनों तरह के ऑर्डर दिए जा सकेंगे।
इसके बाद केवल लिमिट ऑर्डर की अनुमति होगी। इस चरण में मार्केट ऑर्डर को न तो बदला जा सकेगा और न ही रद्द किया जा सकेगा। सेशन का समापन रैंडम तरीके से 3:38 बजे से 3:40 बजे के बीच होगा। इसके बाद ऑर्डर मैचिंग की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
डेरिवेटिव्स कारोबार के समय में भी कुछ अंतर रहेगा। सामान्य कारोबारी दिनों में इंडेक्स डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग शाम 3:45 बजे तक जारी रहेगी, लेकिन एक्सपायरी वाले दिन एक्सपायर होने वाले इंडेक्स डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स में ट्रेडिंग दोपहर 3:30 बजे बंद हो जाएगी। वहीं, स्टॉक डेरिवेटिव्स में एक्सपायरी वाले दिन भी शाम 3:45 बजे तक कारोबार किया जा सकेगा।
इक्विटी कैश मार्केट का पोस्ट-क्लोज सेशन शाम 3:50 बजे से 4 बजे तक चलेगा। इस दौरान सौदे क्लोजिंग प्राइस पर निष्पादित होंगे।
SEBI ने CAS की समीक्षा के बाद एक्सपायरी की तारीख पर डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस को लेकर उठी चिंताओं पर विचार करने के लिए एक परामर्श पत्र भी जारी किया था। अंतिम फ्रेमवर्क में एक्सपायरी डे सेटलमेंट के लिए 30 मिनट की VWAP पद्धति को बनाए रखा गया है।
इसके अलावा, बाजार नियामक डिपॉजिटरी और उनके प्रतिभागियों से जुड़े नियमों की भी समीक्षा कर रहा है। इसका उद्देश्य नियमों को सरल बनाना और धोखाधड़ी रोकने के उपायों को मजबूत करना है।
ब्रोकरों के मामले में SEBI उनके कारोबार के आकार, ग्राहकों के प्रति जोखिम और तकनीक पर निर्भरता के आधार पर अलग-अलग स्तर की अनुपालन आवश्यकताएं तय करने पर भी विचार कर रहा है। वहीं, टेंडर ऑफर, शेयर बायबैक और ऑफर फॉर सेल (OFS) जैसे लेनदेन को इंटरऑपरेबिलिटी फ्रेमवर्क के दायरे में लाने से जुड़ी चिंताओं पर भी काम किया जा रहा है।
(इनपुट-आईएएनएस)


