भारत के त्योहार आस्था, परिवार और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े हैं। गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के दौरान अब स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को भी उत्सव का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जा रहा है। स्वच्छता ही सेवा 2026 अभियान के तहत इस साल ‘स्वच्छता में सहभागिता; स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ विषय के साथ स्वच्छ और हरित त्योहारों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
अभियान के तहत पूजा सामग्री का दोबारा इस्तेमाल, स्रोत पर कचरे का अलग-अलग संग्रह, कम इस्तेमाल, दोबारा इस्तेमाल और पुनर्चक्रण (3R), चक्रीय अर्थव्यवस्था और कचरे से उपयोगी वस्तुएं बनाने जैसी पहल को बढ़ावा दिया जा रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में फूलों से खाद और अगरबत्ती बनाने, गणेश प्रतिमाओं में मिट्टी और बांस के इस्तेमाल तथा छठ घाटों की सफाई जैसी पहलें सामने आई हैं।
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में रोजाना करीब 75,000 से 1 लाख श्रद्धालु आते हैं और हर दिन करीब 5 से 6 टन फूलों का कचरा निकलता है। ‘पुष्पांजलि इकोनिर्मित’ वाहनों के जरिए इन फूलों को एकत्र कर प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाया जाता है, जहां उनसे खाद, ईंधन के लिए ब्रिकेट और जैव ईंधन जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं।
‘शिव अर्पण’ स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने भी फूलों के कचरे को आजीविका का साधन बनाया है। 2024 में इस पहल के तहत फूलों के कचरे से 3 करोड़ से अधिक अगरबत्तियां और अन्य पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए गए। इससे कचरे का उपयोगी उत्पादों में बदलाव करने के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हुए।
गणेश चतुर्थी के दौरान भी पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2024 में नवी मुंबई में गणेश प्रतिमा विसर्जन के लिए 136 कृत्रिम तालाब बनाए गए। इन स्थानों की जानकारी सोशल मीडिया और WhatsApp के जरिए लोगों तक पहुंचाई गई, जिससे प्राकृतिक जलस्रोतों पर दबाव कम करने में मदद मिली।
बृहन्मुंबई नगर निगम ने मूर्तिकारों को करीब 500 टन मुफ्त मिट्टी उपलब्ध कराई। वहीं महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाओं और सजावट को बढ़ावा देने के लिए ‘Eco-Bappa’ मोबाइल ऐप शुरू किया। पिंपरी चिंचवड़ में छात्रों के लिए मिट्टी, कागज, प्राकृतिक रेशों और पुनर्चक्रित सामग्री से प्रतिमा बनाने की प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। ठाणे में करीब 500 छात्रों ने शाडू मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाना सीखा।
2023 में गणेश विसर्जन के बाद 900 से अधिक स्वच्छता स्वयंसेवकों, जिनमें 500 से अधिक छात्र शामिल थे, ने वर्सोवा बीच की सफाई की। अभियान के दौरान करीब 80,000 किलोग्राम कचरा हटाया गया और लगभग 7,400 प्लास्टर ऑफ पेरिस की गणेश प्रतिमाएं एकत्र की गईं।
असम के डिगबोई में 2023 की गणेश पूजा में बांस का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया। प्रतिमाओं, प्रवेश द्वारों और पारंपरिक सजावट में बांस के साथ जापी टोपी और खोराही टोकरियों का उपयोग किया गया। दिल्ली में नारियल की छाल और मिट्टी से ऐसी पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाएं बनाई गईं, जिनमें पौधों के बीज भी लगाए गए थे। विसर्जन के बाद प्रतिमाएं मिट्टी में घुलकर बीजों को अंकुरित होने का अवसर देती हैं।
दुर्गा पूजा में भी पर्यावरण अनुकूल सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया। 2023 में पंडालों के निर्माण में थर्मोकोल और प्लास्टिक की जगह बांस, लकड़ी, नारियल के खोल, कपड़े, जूट, नारियल रेशा, घास, पुआल, बेंत और कागज जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया। घुलनशील मिट्टी की दुर्गा प्रतिमाओं को भी प्रोत्साहित किया गया। पंडालों के आसपास कचरे के लिए अलग-अलग डिब्बे लगाए गए और रात में सफाई अभियान चलाए गए।
पूजा के बाद फूलों और अन्य जैविक सामग्री को खाद बनाने तथा दूसरे उपयोगी कार्यों में लगाया गया। प्रसाद और जलपान के लिए कागज की प्लेट, केले के पत्ते, पत्तलों और मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल किया गया।
दिवाली के दौरान ‘स्वच्छ दिवाली, शुभ दिवाली’ अभियान के जरिए कचरे को अलग करने, 3R अपनाने, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और स्वच्छ तरीके से त्योहार मनाने का संदेश दिया जा रहा है। महाराष्ट्र के मीरा भयंदर में दिवाली से पहले विशेष सफाई अभियान चलाया गया, जिसमें सार्वजनिक स्थानों की सफाई के साथ हरित क्षेत्रों की देखभाल की गई।
राजस्थान और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में लोगों को दिवाली की सफाई से निकलने वाले घरेलू कचरे को नजदीकी Reduce, Reuse and Recycle केंद्रों तक पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। दिल्ली में ‘Swap Before You Shop-Gift Revival Mela’ के जरिए लोगों ने इस्तेमाल न किए गए उपहारों की अदला-बदली भी की।
त्रिपुरा के मेलाघर में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने पर्यावरण अनुकूल दिवाली के लिए मिट्टी के दीये बनाए। दिल्ली के विभिन्न उत्सवों में कपड़े के बचे हुए टुकड़ों से सजावट, पुराने गत्ते से सेल्फी फ्रेम और आइसक्रीम की पुरानी लकड़ियों से सजावटी सामान तैयार किया गया।
दिवाली के बाद भी पूजा सामग्री के दोबारा उपयोग की पहल जारी रहती है। गुवाहाटी में दिवाली के दौरान इस्तेमाल किए गए केले के पत्तों को एकत्र कर हाथियों के चारे के रूप में इस्तेमाल किया गया। राजस्थान के झालरापाटन में ‘निर्माल्य वाहन’ मंदिरों से फूल और अन्य पूजा सामग्री एकत्र कर उन्हें खाद में बदलते हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर में त्योहार के बाद सुबह 4 बजे से सफाई अभियान शुरू किया गया और ‘Clean Up to Clean Air’ पहल के तहत पेड़-पौधों पर पानी का छिड़काव किया गया।
छठ पूजा में भी स्वच्छता को धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। पटना में नगर निगम निर्धारित घाटों पर कचरा-मुक्त छठ पूजा के लिए अलग-अलग कूड़ेदान और कचरा संग्रहण वाहनों की व्यवस्था करता है। गीले कचरे से जैविक खाद बनाई जाती है और प्लास्टिक पर रोक लागू की जाती है। पूजा से करीब एक महीने पहले जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है।
इन पहलों का उद्देश्य त्योहारों की परंपरा और आस्था को बनाए रखते हुए उनके पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। स्वच्छ और हरित उत्सवों के जरिए फूलों का कचरा खाद और अन्य उत्पादों में बदल सकता है, मिट्टी की प्रतिमाओं से जलस्रोतों पर दबाव कम हो सकता है और इस्तेमाल की गई सामग्री का दोबारा उपयोग किया जा सकता है।
स्वच्छता ही सेवा 2026 के जरिए संदेश दिया जा रहा है कि त्योहार की खुशी केवल उत्सव खत्म होने तक सीमित न रहे, बल्कि उसके बाद भी स्वच्छ वातावरण, बेहतर जलस्रोत, पुनर्चक्रित सामग्री, नए पौधे और स्थानीय आजीविका के रूप में सकारात्मक प्रभाव छोड़े।
-(इनपुटः PIB)


